बसपा और सपा के बीच हुए सियासी गठबंधन ने जहाँ देश की सियासत में भूकम्प ला दिया है। मोदी की भाजपा को इस सर्दी में भी पसीने-पसीने कर दिया हो, जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीट जीतने में कामयाबी हासिल की थी उसको अपनी सियासी ज़मीन बचाने का मौक़ा भी नहीं मिल रहा है तो कांग्रेस को गठबंधन में न लेकर उसको भी मजबूर किया कि वह बिना बसपा व सपा के सीधे चुनाव लड़े, तो वहीं इस गठबंधन में सपा को भी एक बेचारी और असहाय की हालत में लाकर खड़ा कर दिया है। गठबंधन में उसकी कोई हैसियत नहीं लग रही है। इस गठबंधन में जिस तरह बसपा सुप्रीमो जो चाह रही हैं, वही हो रहा है। वह एक शेरनी की तरह दहाड़ रही हैं।
हमारे सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सपा को ज़्यादातर ऐसी सीटें दी जा रही हैं जहाँ सपा या गठबंधन ज़्यादा असरंदाज नहीं माना जा रहा। अब तक बसपा ने गठबंधनों से जो अनुभव किए हैं, वह उनका लाभ ले रही है। वह ऐसी सीटों को बसपा के खाते में ले रही जहाँ गठबंधन के जीतने के ज़्यादा चांस लग रहे हैं।
यूपी में बसपा-सपा के गठबंधन के बाद मोदी की भाजपा के सपने जहाँ चकनाचूर होते दिख रहे हैं, वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती की बड़ी ही चतुराई से सपा को जो 38 सीटें देने की बात सामने आ रही उनमें ज़्यादातर महानगरों की हैं और बसपा के लिए हमेशा यह कमज़ोर रही हैं।
माना जा रहा है कि मायावती ने रणनीति के तहत ऐसी सीटें ज़्यादा अपने पास रखी हैं, जहाँ यादव कम है और दलित-मुस्लिम ज़्यादा हैं। मायावती और बसपा को लगता है कि गठबंधन से हमें ज़्यादा फ़ायदा नहीं होता है, जैसा उन्होंने साझा प्रेस कांफ्रेस में कहा
हमारे भरोसे के सूत्रों के मुताबिक बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी सियासी शतरंज की चाल से सपा के बबुआ को जो 38 सीटें दी हैं वे इस प्रकार हो सकती है 1 गोंडा 2 श्रावस्ती 3 बहराइच 4 कैसरगंज 5 फैज़ाबाद 6 बाराबंकी 7 लखनऊ 8 उन्नाव 9 कानपुर नगर 10 कन्नौज 11 फर्रुखाबाद 12 इटावा 13 एटा 14 मैनपुरी 15 फिरोजाबाद 16 फतेहपुर सीकरी 17 अलीगढ़ 18 कैराना 19 रामपुर 20 अमरोहा 21 मुरादाबाद 22 सम्भल 23 बदायूं 24 बरेली 25 आंवला 26 पीलीभीत 27 धौरहरा 28 मिश्रिख 29 झांसी 30 इलाहाबाद 31 कौशाम्बी 32 प्रतापगढ़ 33 बनारस 34 गाजीपुर 35 गोरखपुर 36 देवरिया 37 आज़मगढ़ 38 सोनभद्र को माना जा रहा है।
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अगर हम उपरोक्त सीटों की सियासी पृष्ठभूमि को देखे तो इनमें 12 सीटें तो पहले ही ऐसी मानी जा रही है जहाँ सपा के बबुआ अखिलेश यादव चुनाव शुरू होने से पहले ही चुनाव हारते दिख रहे हैं। सियासी पण्डितों का मानना है कि सपा को जो सीटें मिलने की सूत्र ख़बरें बता रहे हैं उनमें 26 सीटों पर सपा संघर्ष करेगी और लगभग बीस सीटें ऐसी होंगी वह निकालने में कामयाब हो सकती है। जबकि बसपा को जो सीटें मिलने की चर्चा हो रही है उनमें बसपा 38 में से 30 से लेकर 35 सीट जीतने की संभावना लग रही है। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस सियासी आँकड़ो में सियासी पण्डित जीतते हैं या नेताओं की सियासी कसरत, लेकिन फिलहाल जो बसपा और सपा के सियासी झरनों से ख़बरें छनकर आ रही हैं इनसे तो यही संकेत प्राप्त हो रहे हैं कि इस गठबंधन में बसपा सुप्रीमो मायावती शेरनी की भूमिका में है और सपा के बबुआ अखिलेश यादव एक बेचारे की भूमिका में हैं अब यह बात अलग है चुनाव में उँट किस करवट बैठता है किसका पलढा भारी होता और किसका हल्का यह तो 2019 के चुनाव के परिणाम ही तय करेंगे, लेकिन मायावती की रणनीति कामयाब होती दिख रही है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि सब कुछ बसपा सुप्रीमो मायावती तय कर रही हैं और सपा के बबुआ जो मुसलमानों के वोटबैंक पर सियासत करते हैं वह बिलकुल कमज़ोर और असहाय लग रहे हैं। सियासी जानकार यही मान रहे हैं।
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