मुद्दा
हम महाभारत के पक्षधर तो कतई नहीं हैं, लेकिन यह झीना पर्दा तो हटे कि आखिर अंग्रेजी की हैसियत हिंदुस्तान में है क्या...?
एक नहीं, अनेक दृष्टांत बार बार सामने आते हैं जो द्वन्द रचते हुए यह प्रश्न याद करा जाते हैं. भारत की अपनी आज़ादी के बाद देश की स्वतंत्र रूप से बनती छवि में अंग्रेजी का रंग बाकायदा घना था और उम्मीद की जा रही थी कि सांस्कृतिक आधिपत्य नुमा यह दाग, जाते जाते ही जाएगा और देशवासियों के समूचे चाल-चलन में भारतीयता लौटेगी. भारतीयता की संकल्पना में यह कभी नहीं था कि अंग्रेजी को एक भाषा के रूप में भी रहने नहीं दिया जाएगा, बल्कि यह था कि भाषा के रूप में अंग्रेजी अपना यथोचित स्थान बनाएगी और स्वतंत्रता की सूचक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ अंग्रेजी के सामने सिर नवाए नहीं बल्कि साफा बंधे तन कर खड़ी होंगी. आज़ादी के पहले या बाद, हमें यह जानने की ज़रूरत नहीं थी कि भाषा साहित्य की वाहक होती है और साहित्य जन जीवन को धारण कर के जीवंत होता है.
यह संज्ञान भारत को बहुत पहले से था, इसलिए देश की संकल्पना में सभी भाषाओं के साथ अंग्रेजी का भी भाषा सम्मत मान था, बस उम्मीद यह थी, अंग्रेजी के सापेक्ष हिंदी तथा भारतीय भाषाएँ चेरी जैसी नहीं गिनी जाएंगी. इसी उम्मीद की नित नई छीछालेदर मन में यह सवाल खड़ा करती है कि अंग्रेजी एक भाषा है या अलग सम्प्रदाय. अगर अंग्रेजी एक अलग सम्प्रदाय है तो फिर इसके सापेक्ष हिंदी और भारतीय भाषाओं को किसी फर्क रणनीति के सहारे सांप्रदायिक होना ही होगा, क्योंकि चेरी बन कर रहना तो भारतीय भाषाओं को मंजूर नहीं होगा.
भाषा के संवाहक के रूप में किताबों से पहले अखबारों की अपनी सशक्त भूमिका है. देश में सभी भाषाओं के अखबार, कमोबेश सभी राज्यों से प्रकाशित हो रहे हैं. यह भी एक सच्ची तस्वीर है, जिस से मुंह चुराने का कोई औचित्य नहीं, कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के अखबार संबंधित भाषा के पाठकों के हाथ जाते हैं, जब कि अंग्रेजी का अखबार करीब-करीब हर भारतीय भाषा का पाठक पढ़ता है. मैं इसे किसी चिंतनीय प्रसंग की तरह ग्रहण नहीं करता. लेकिन इस से अंग्रेजी अखबारों का यह दायित्य तो सामने आता ही है कि वह अपनी कुल सामग्री में, भारतीय भाषाओँ और साहित्य का स्पंदन दर्शाते रहें.
अगर अंग्रेजी अखबार ऐसा करने से परहेज़ करते हैं तो निश्चित रूप से इसे एक साम्प्रदायिक दुर्व्यवहार जैसी अपसंस्कृति के रूप में देखा जाएगा.
प्रसंग यह है कि हिंदी के जाने-माने लेखक अरुण प्रकाश का देहांत 18 जून, सोंमवार को दोपहर एक बज कर पन्द्रह मिनट पर दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में हो गया. वह काफी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे. हिंदी में अपने लेखकीय योगदान के अतिरिक्त अरुण प्रकाश ने अंग्रेजी की अनेक पुस्तकों का अनुवाद भी किया है और वह देश की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक भी रहे हैं. यह दुखद समाचार एन डी टी वी के माध्यम से मुझ तक शाम को पहुंचा. अगले ही दिन, मंगलवार की सुबह जनसत्ता ने इस समाचार को समुचित स्थान देते हुए अपने पाठकों तक पहुंचाया. जनसत्ता कुल बारह पन्नों का अखबार है. इसके बरअक्स, अंग्रेजी के 24 + 10 ( डेल्ही टाइम्स ) वाले ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ ने इस बाबत अपना मुहं ही फेर लिया. इस में अनुराग कश्यप ने अपनी पहली कार खरीदी, इस खबर को उनकी तस्वीर सहित करीब छः वर्ग इंच जमीन प्रदान की गई, लेकिन अरुण प्रकाश के नाम पर सन्नाटा रहा. बहादुर शाह ज़फर का रोना तो दो गज ज़मीन का था, यहाँ का अंग्रेजी दुर्योधन तो सूई की नोक बराबर भी देने के लिये महाभारत मांगता है.
हम महाभारत के पक्षधर तो कतई नहीं हैं, लेकिन यह झीना पर्दा तो हटे कि आखिर अंग्रेजी की हैसियत हिंदुस्तान में है क्या...?

अशोक गुप्ता
अशोक गुप्ता दुनिया देखने के लिए सारे झरोखे खोल कर रखने वाले इंसान हैं, क्योंकि अपनी दुनिया में भरपूर जीना है। पेशे से इंजीनियर रहे और अब अवकाशप्राप्त अशोक गुप्ता की कलम, कैमरा और आवाज़, के सहारे हस्ती बुलंद है और कई साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं। “Hate the sin but not the sinner. Dont take offence, dont give offence.” उनकी पसंदीदा उक्ति है।.