सुधीर सुमन
हिंदी कहानी में स्त्री-दलित-अल्पसंख्यक विमर्श का एक दौर पूरा हो चुका है। पिछले दो दशकों में जबकि इन विमर्शों का खासा जोर रहा, उसी दौरान हुआ यह कि धीरे धीरे आम मेहनतकश स्त्री, दलित, मुसलमान कहानी से गायब होते चले गए और उनकी जगह मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग का जीवन या उसका नजरिया हावी होता चला गया। जाहिर था जो आम लोग थे उनका बड़ा हिस्सा अभी भी गांवों या कस्बों में था, इस कारण जब आमलोग हिंदी कहानी से गायब होने लगे तो गांव भी गायब होने लगे। लेकिन इसी बीच विमर्शों की उत्तेजक सनसनियों से थोड़ी सचेत दूरी बरतते हुए एक नये कहानीकार ने किस्सागोई और व्यंग्य की खास ताकत के साथ गांवों के सामाजिक यथार्थं और गांवों से रोजगार की तलाश में कस्बे और शहरों की ओर जाने के लिए मजबूर लोगों के जीवन संदर्भों को लेकर कहानियों की रचना की है, इनका नाम है हरिओम। जिनका पहला कहानी संग्रह ‘अमेरिका मेरी जान’ हाल में प्रकाशित हुआ है।

इस संग्रह में दस कहानियां हैं जिनमें पांच कहानियां आम भारतीय मुसलमानों के जीवन के सच को सामने लाने और बेहद संवेदनशील तरीके से उनकी चेतना पर छाये खौफ और गहरी तकलीफ को समझने की कोशिश करती हैं। इन कहानियों का परिवेश अलग-अलग है। लेकिन सारे मुस्लिम पात्र एक सा दर्द झेल रहे हैं, परायेपन और घृणा का दर्द। मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाने वालों और सेकुलरिज्म के दावेदारों- दोनों को ये कहानियां आईना दिखाती हैं। विमर्शकारों को शायद इन कहानियों का यह तथ्य भी चौंकाए कि रहमत (मियां) पेशे से तेली हैं और बब्बू (जय हिंद) पेशे से चर्मकार। ये मेहनतकश वर्ग के चरित्र हैं, जिनकी मौजूदा व्यवस्था में लगातार दुर्दशा हो रही है। ये देश या किसी धर्म के लिए खतरा नहीं हैं, जैसा कि इन कहानियों में साधु वेशधारियों का प्रचार है, जैसा कि अमेरिका का पूरी दुनिया में प्रचार है। ‘अमरीका मेरी जान’ कहानी में जो शहर है वह आजमगढ़ भी हो सकता है और देश का कोई वैसा शहर जहां सिर्फ मुसलमान होना ही किसी के लिए गुनाह बना दिया गया है। जिस तरह अमरीका पूरी दुनिया में मुस्लिम विरोधी घृणा के प्रचार में लगा है, भारत का शासन-प्रशासन भी उसी तर्ज पर काम करता है। इस कहानी में सब्जियां बेचने वाले आफताब मियां सोचते हैं कि अमरीका कौन है और उनके बेटों से उसकी क्या दुश्मनी है! दरअसल इस कहानी का शीर्षक अमेरिका किसकी जान या अमेरिका कौन होता तो ज़्यादा सटीक होता।

हरिओम की कहानियां अपने समय के ज्वलंत सवालों से जुड़ी हुई हैं और अपनी बुनावट में कई दूसरे गंभीर सवाल भी पैदा करती हैं। एक कहानी है- ये धुंआ धुंआ अंधेरा, जो छात्र राजनीति और एक आजादख्याल मुस्लिम नवयुवती नसीम के जीवन प्रश्नों से शुरू होती है, लेकिन सांप्रदायिक कत्लेआम की पृष्ठभूमि में एक पराजयबोध में इसका अंत होता है। नायक जयराज जो कि गांव से जेएनयू आया एक हिंदू नवयुवक है, जो नसीम के प्रति आकर्षित है और वह भी उसे पसंद करती है। नसीम उसके साथ स्त्री की आजादी को लेकर बहसें भी करती है। लेकिन कैंपस के राजनैतिक संघर्षों और स्त्री की वैयक्तिक आजादी के लिए जद्दोजहद से भी बड़ा सवाल बन जाता है भारतीय मुसलमानों की सुरक्षा का। क्योंकि जिस इल्जाम, खौफ, पिछड़ेपन और परायेपन के अहसास में वह समुदाय है उसे मिटाए बगैर तो शायद भारतीय मुस्लिम स्त्रियों की आजादी की जो लड़ाई है वह भी मुकम्मल नहीं हो सकती। दो कामरेड जो एक दूसरे को चाहते हैं, उनके बीच भी एक अजीब सी दूरी है कि जब मुस्लिम धर्मावलंबियों का कत्लेआम होता है, उनकी बस्तियां जलाई जाती हैं, औरतों के साथ बलात्कार होता है, और खुद नसीम की बस्ती भी इससे नहीं बच पाती, तब दोनों अपनी अपनी जिंदगियों में अकेले रह जाते हैं। उस दर्दनाक खबर के बाद नायिका तो खैर अपने घर के लिए रवाना होती है, लेकिन उसके बाद उसका कोई पता नहीं चलता और नायक जिंदगी भर उससे लगी सिगरेट की लत को छोड़ नहीं पाता।

प्रेम कहानी या स्त्री-पुरुष संबंधों के लिहाज से ही देखा जाए तो ‘जगधर की प्रेमकथा’, जो कि एक तरह से अंधे जगधर की व्यामोहकथा है, अद्भुत कहानी है, जिसे स्त्री विमर्शों के लिए चर्चित एक पत्रिका ने प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था। जगधर जमीन मालिक है और महतिन, जिसका पति परदेश में कमाने गया है, अपनी घरेलू जरूरतों के तहत उसके खेतों में काम करती है। जगधर के कई रिश्तेदार संपत्ति की लालच में उसकी देखरेख करके जा चुके थे, लेकिन उसे लगता है कि महतिन अपनी जरूरत के कारण उसके साथ रह जाएगी। वह अपना खेत-बाग उसके बच्चों के नाम से कर देता है। मगर तब भी वह स्त्री अपने बच्चों के पिता से अलग नहीं होती। जगधर एक दिन भावावेश में उससे कहता है- ‘‘मालकिन भरोसा करो...। मेरे जीवन पर तुम्हारा राज होगा।’ लेकिन उसे जगधर के शब्दों पर यकीन नहीं होता। यह गौर करने लायक बात है कि कहानी जगधर के प्रति करुणा के साथ खत्म होती है, लेकिन एक अनपढ़ देहाती स्त्री ने जो चुनाव किया है, उस पर पाठक की उंगली नहीं उठ पाती। उसमें ऐसी तर्कशीलता नहीं है कि अपने बच्चे के पिता को छोड़कर वह जगधर के साथ रहने लगती और अपने कान्शियंस को यूं समझा लेती कि उसने तो एक अंधे व्यक्ति का उद्धार किया या फिर अपने पति पर लानतें भेजते हुए उससे अलग हो जाती कि उसने परदेश जाकर उसकी कोई सुध नहीं ली, तो वह क्या करती। मगर सनसनी चाहने वाले विमर्शकारियों को शायद इसीलिए यह कहानी पसंद नहीं आई होगी, क्योंकि नायिका स्त्री विमर्श के उनके सनसनीखेज बाजारू खांचे में नहीं आती। जहां तक जगधर की त्रासदी है उसकी जड़ तो उसके सामंती संबंधों के भीतर ही है। हालांकि जितनी आसानी से वह अपनी जमीन महतिन के बच्चों के नाम लिखता है, वह हकीकत में इतना आसान नहीं है।

हरिओम विभिन्न सामाजिक-वर्गीय पृष्ठभूमि के और विभिन्न परिस्थितियों में मौजूद पात्रों की मनःस्थिति को बारीकी से समझते हैं। इसे हीनताबोध से ग्रस्त पुरुष ‘भैयाराम’ में देखा जा सकता है और गाली और झगड़े के लिए मशहूर स्त्री ‘लबड्डा’ में भी। ये थोड़े असामान्य पात्र हैं, जिनकी असामान्यता की वजहें समाज और पारिवारिक संबंधों में मौजूद हैं, लेकिन इनकी नियति और इनका संघर्ष खास का नहीं बल्कि आम का ही है। इन्हें कहानीकार की सहानुभूति भी हासिल है। ‘जयहिंद’ के बन्ने भी ऐसे ही चरित्र हैं- बेहद सीधे-साधे, भोले-भाले, किसी को नुकसान न पहुंचाने वाले, किसी का कोई भी काम करने को तैयार रहने वाले, लेकिन जो सिर्फ इस कारण मार दिए जाते हैं कि वे मुसलमान हैं। अन्याय, भेदभाव और वंचना से पीड़ित चरित्रों के प्रति ऐसी ही संवेदना ‘आम कसम’ और ‘रास्ता किधर है’ में भी दिखाई देती है। ‘रास्ता किधर है’ में मोचियों और पासियों के मुहल्ले तक पहुंचने वाले पक्के रास्ते की योजना को लागू करने के क्रम में जो कहानी कही गई है, वह इस विचार को सामने लाती है कि सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से कटे हुए विकास की कोई परिकल्पना कभी सफल नहीं हो सकती। वैसे इस संग्रह की सारी कहानियां रास्ते की तलाश की ही कोशिश लगती हैं। यहां तक कि ‘मुंहनोचवा’ जैसी तात्कालिक सनसनी के रहस्य की पड़ताल भी उसके राजनैतिक-सांस्कृतिक संदर्भों के साथ करने की कोशिश कहानीकार ने की है। इस कहानी में एक परंपरावादी पितृसत्तामक नजरिए वाला पुरुष आधुनिक नजरिए वाली अपनी पुत्रवधु की हत्या के लिए मुंहनोचवा के अफवाहों का सहारा लेता है। वैसे इन कहानियों में कई जगह एकाध पंक्तियों में ऐसे संदर्भ आते हैं जो आम मेहनतकश ग्रामीण स्त्रियों की अमानवीय जीवन स्थितियों की ओर संकेत करते हैं। स्त्रियों के साथ दलितों और अल्पसंख्यकों की भी जो तस्वीर है वह काफी बेचैन करने वाली है और पाठक को इस दिशा में सोचने को बाध्य करती है कि इस समाज को कैसे बदला जाए। अपने नजरिए को व्यक्त करने के प्रवाह में कहानियों के विस्तार का मोह और कहीं कहीं कुछ सरलीकरण की प्रवृत्ति भी हरिओम में दिखाई पड़ती है। लेकिन जो किस्सागोई है और जो फिक्र है इन कहानियों में, वही इनकी ताक़त है।
साभार कारवाँ