आखिरकार किसानों को चाहिए क्या
आखिरकार किसानों को चाहिए क्या
आशीष वशिष्ठ
सरकार और किसानों के बीच जमीन से जुड़े मामलों में जिस रफ्तार से बढ़ात्तरी हो रही, वो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। सिंगुर से भट्टा पारसौल तक किसान लड़ते-भिड़ते, लाठी-डंडे और गोली खाने को मजबूर हैं और सरकार मदमस्त हाथी की भांति अपने भारी-भरकम कदमों से खेती की जमीने नापे जा रही है। पुलिस-प्रशासन और सरकारी आदेशों के सामने बेबस किसान चुपचाप अपनी जमीन छिनते देखने को विवश हैं। जमीन अधिग्रहण से जुड़े कई ताजे मामले उत्तर प्रदेश के हैं। सरकार और किसानों के बीच जारी संघर्ष, खींचातान और कानूनी लड़ाई में आखिरकर किसानों की जीत हुयी। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को किसानों को उनकी जमीन वापिस करने का आदेश दिया। शाहबेरी गांव के किसानों को 156 हेक्टेयर जमीन वापिस मिलने के आदेश से उत्साहित दर्जनों अन्य गांवों के किसानों ने भी कोर्ट का रुख किया है। लेकिन सरकार और किसानों के बीच जारी संघर्ष के बीच कुछ सवाल उभरते हैं। सबसे अहम् सवाल यह है कि आखिरकर किसानों को चाहिए क्या? किसानों को अपनी जमीन वापिस चाहिए या अधिक मुआवजा? मोटे तौर पर एक बात समझ आती है कि अधिक मुआवजे, नौकरी की चाहत, रातों-रात लखपति और करोड़पति बनने की चाहत और खेती किसानी में बढ़ते घाटे और कम मुनाफे से घबराए किसान आज खुद ही ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिरकार उन्हें चाहिए क्या? आखिरकार किसान, सरकार से नाराज क्यों है? क्या किसानों को लगता है कि उनके हिस्से का मुनाफा और पैसा सरकारी अमला खा रहा है या फिर किसान जमीन देने को तो तैयार हैंै बस उन्हें मनमुताबिक और मुंहमांगा रेट मिलना चाहिए।
देश भर में विकास के नाम पर लाखों एकड़ खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण आजादी के बाद से अब तक किया गया है और लगभग हर जगह सरकारी मशीनरी को किसानों और भू-स्वामियों का कड़ा विरोध झेलना पड़ा। लेकिन सरकारी लाव-लशकर के सामने बेबस किसान चुपचाप अपनी जमीनें नपती देखते रहे। अशिक्षा, कानून की जानकारी न होने और अपने अधिकारों से अनजान किसानों के साथ आजादी के बाद से ही जमीन अधिग्रहण के नाम पर जुल्म और अन्याय हो रहा है। किसान नेतृत्व की कमी और किसी बड़े मंच के समर्थन के अभाव में किसानों की आवाज जोर-शोर से नहीं उठ पाई फलस्वरूप किसानों का शोषण और जमीन हड़पने की कार्रवाई बदस्तूर जारी रही। आंकड़ांे के हिसाब से जिस तथाकथित विकास के नाम पर सरकार ने जमीन अधिग्रहीत की, उस जमीन का उपयोग कांक्रीट के जंगल बसाने और दूसरे कामों में ही अधिक हुआ। पिछले दो दशकों में कारपोरेट ने रियल एस्टेट के बिजनेस से चोखा मुनाफा कमाया है। कारपोरेट की वजह से जमीन सीधे तौर पर निवेश का जरिया बन गयी। रातों-रात देश भर में रियल एस्टेट कंपनियों की एक बाढ़ सी आ गयी। असल में देखा जाए तो रियल एस्टेट का बिजनेस सौ फीसदी कमीशनखोरी से जुड़ा हुआ है। सरकार, कारपोरेट और बिल्डर की तिगड़ी मिलकर मोटी मलाई कमाती है। पहले सरकार विकास के नाम पर सोना उगलती जमीन किसानों से औने-पौने दामों में अधिग्रहीत करने का नाटक करती है। फिर उसी जमीन को सरकार तथाकथित विकास के नाम पर जमीन बिल्डरों और कारपोरेट को ऊंचे दामों में बेचती है। बिल्डर खरीद कीमत में अपना मोटा मुनाफा जोड़कर फ्लैट, माॅल और व्यावसायिक काॅम्पलेक्स ग्राहकों को बेचते हैं। इस पूरी कवायद में सरकार, कारपोरेट और बिल्डर मोटी कमाई काटते हैं, ठगे केवल किसान जाते हैं। बरसों-बरस अंधेरे में रहे किसानों को अब शायद सरकारी नीति, नीयत और तथाकथित विकास की असलियत समझ आने लगी है, नतीजन आए दिन किसानों और सरकार के बीच संघर्ष की खबरें सुनाई देती हैं।
किसी जमाने में भारत गांवों और खेती-किसानी वाला देश माना जाता था। लेकिन औद्योगिक विकास और विस्तार ने खेती पर निर्भरता को एक हद तक कम तो किया है लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज भी खेती हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कई हरित क्रांतियों के बावजूद किसान खेती-बाड़ी से मुंह फेर रहे हैं। असल में मल्टीनेशनल कंपनियों की दखलंदाजी, सरकार की खेती विरोधी नीतियों, यूरिया, बीज, बिजली और खेती के यंत्रों के दामों में हुई बेतहाशा वृद्वि ने खेती को मुनाफे की बजाय घाटे का ध्ंाधा बना डाला। व्यावसायिक खेती ने पारंपरिक खेती का नाश तो किया ही वहीं किसानों को कर्ज के बोझ तले दबा डाला। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। ये कड़वी हकीकत है कि किसान दिल से खेती करना नहीं चाहते हैं। वहीं नयी पीढ़ी को नौकरी और दूसरे ध्ंाधों में अधिक आराम और सुविधा दिखाई देती है ऐसे में खेती किसानी वाले घरों में खेती की बागडोर संभालने वालों का अनुपात कम से कमतर हो रहा है। दिनों दिन मंहगी होती खेती और कम मुनाफे से घबराये किसान जमीन अधिग्रहण का विरोध कर तो रहे हैं लेकिन बुझे दिल और दबी आवाज में। क्योंकि किसान खुद ये समझते हैं कि अगर सरकार ने जमीन वापिस लौटा भी दी तो वो खेती-किसानी से घर-परिवार का खर्चा और लालन-पालन नहीं कर पाएंगे। देश में छोटे काश्तकारों की संख्या अधिक है। छोटेे खेतों में खेती अधिक मेहनत और पैसे का सौदा होती है। हकीकत यह है कि आज खेती का असली मुनाफा आढ़ती और वायदा कारोबरी ले जाते हैं किसान के पास साल भर खाने के अनाज ही बच जाए तो गनीमत समझिए। खेती विरोधी सरकारी नीतियों और कम मुनाफे की वजह से किसानों का खेती-किसानी से मोह भंग हो चुका है। खेती किसानी से ऊबे और ऊकताए किसानों को आज शायद इसलिए ऊंचे दामों में जमीन बेचना अधिक मुफीद सौदा लग रहा है। आज औसतन हर दूसरे किसान की राय यही है कि वो कोई दूसरा ध्ंाधा या रोजगार करके अपना परिवार को ठीक से पाल सकते हैं खेती-किसानी से नहीं।
लेकिन ये कड़वी हकीकत है कि जमीन के बदले किसानों को जो मुआवजा राशि मिली है, वो उसका सदुपयोग नहीं कर पाये। नोएडा और एनसीआर क्षेत्र में अपनी जमीन खो चुके और लाखों का मुआवजा पाये किसान बदहाल जिंदगी और छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हैं। विकास परियोजनाओं से होने वाले विकास की स्टडी करने वाले वाल्टर फर्नाडिस के अनुसार आजादी के बाद से 3 करोड़ से अधिक लोग विभिन्न परियोजनाओं के कारण कृषि भूमि से विस्थापित हुए हैं और अफसोसजनक पहलू यह है कि उनमें से मात्र 25 फीसदी का ही पुनर्वास हो पाया है। बाकी विस्थापित आज भी समुचित पुनर्वास और रोजगार के लिए आंदोलन कर रहे हैं। भूमि अधिग्रहण संबंधित टकराव के निदान की कोशिश के बतौर, केन्द्र सरकार ‘भू अधिग्रहण (संशोधन) बिल’ और पुनर्वास और पुनस्र्थापन’ संसद में आगामी सत्र में पास कराना चाहती है, जिसकी संभावना कम ही दिखाई देती है।
अगर किसान कम मुआवजे को लेकर आंदोलित और परेशाान है तो फिर समस्या हल होने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। क्योंकि लाखों-करोड़ों का हेर-फेर करने वाले कारपोरेट मुसीबत टालने के लिए मुआवजे की बढ़ी राशि दे देंगे। अदालत के निर्णय फिलहाल किसानें के पक्ष में हैं। लेकिन मुकदमों की बढ़ती संख्या और पेचीदगियों के चलते कोई बीच का रास्ता निकलने के आसार हैं। गौरतलब है कि किसानों के हक मंे जो आंदोलन और आवाज उठ रही है उसकी सारी कोशिश अधिक से अधिक मुआवजा दिलवाना ही है। असल में किसान खुद भी दुविधा और असमंजस की स्थिति में है। एक ओर कर्ज और नुकसान वाली खेती है तो दूसरी ओर नोटों की मोटी गड्डियां। आज किसान आंदोलन जिस रास्ते पर है, उसका अंतिम पड़ाव नोटों का ढेर ही है और अंदर ही अंदर शायद किसान भी यही चाहते हंै।


