आम भारतीय फिर वही होरी या गोबर या धनिया है जिसकी मुनाफा लूटने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं
आम भारतीय फिर वही होरी या गोबर या धनिया है जिसकी मुनाफा लूटने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं
दरअसल आम भारतीय फिर वही होरी या गोबर या धनिया है, जिसकी टाटा बिड़ला अंबानी अडानी जिंदल मित्तल बनकर मुनाफा लूटने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही है
जबसे नकद भुगतान बंद है, चेक से भी वेतन नहीं मिलता है और शून्यजमा खाते में वेतन कंपनियों और सरकारों की ओर से जमा किया जाता है, तब से जमाखाता के साथ फ्री में डीमैट खाता भी उसी बैंक में उसी नाम के साथ खोलने का रिवाज चला है। लेकिन बड़े पैमाने पर चिड़िया फंसाने में बाजार नाकाम रहा है। हर सेकंड बाजार के उछल कूद में जो लाखों, करोड़ों और अरबों का दांव लगता है, आम भारतीय उस दुश्चक्र से बचने की हर संभव कोशिश करता रहा है।
शेयर सूचकांक से भारतीय रोजमर्रे की जिंदगी का नाभि नाल जुड़ाव बनाने का समावेशी विकास करने में डा.मनमोहनसिंह का विकलांग अर्थशास्त्र रिसते हुए ख्वाबों के बावजूद, सामाजिक योजनाओं के जरिये सरकारी खर्च बढ़ाकर बाजार में भारी पैमाने पर कैश बहाने के बावजूद नाकाम रहा है।
दरअसल आम भारतीय फिर वही होरी या गोबर या धनिया है, जिसकी टाटा बिड़ला अंबानी अडानी जिंदल मित्तल बनकर मुनाफा लूटने की कोई महत्वाकांक्षा नही रही है और नउसे बाजार और अर्थशास्त्र की इतनी समझ है कि वह जोखिम उठाकर धनपैदा करने वाली मशीनरी का पुर्जा स्वेच्छा से बन जाये।
यही वजह है कि शेयरसूचकांक से जुड़ी अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को जब 2008 की महामंदी की मार झेलनी पड़ी और महाबलि अमेरिका की मूषक दशा हो गयी तो भी बिना बुनियादी आधार में किसी तब्दीली के, बिना उत्पादन प्रणाली में बदलाव के , बिना किसी आंतरिक शक्ति के वह महामंदी भारतीय अर्थव्यस्था डालर से जुड़े होने के बावजूद झेल गयी। सिर्फ शेयरबाजार से लिंक न होने के कारण। क्योंकि मध्यवर्ग में जो सबसे नियमित आय वाले लोग हैं, कर्मचारी विभिन्न स्तरों के हैं, वे बाजार के लपलपाते प्रोलोभन के बावजूद डीमैट खाते के जरिए बाजार में दांव लगाने से हिचकिचाते रहे।
इस परिदृश्य को म्युचअल फंड और यूनिट लिंक बीमा से बदलने की कवायद हुई और इस कवायद में विनिवेश के लिए फंड देने के लिए मजबूर भारतीयजीवन बीमा निगम का कंकाल निकल आया।
बीमा एजंट अब सबसे नापसंद किये जाने वाले मनहूस लोग हो गये हैं, जो यूनिट बीमा के जरिये पांच दस गुणा ज्यादा कमाने का सब्जबाग दिखाकर अपना कमीशन निकालकर चुपचाप बैठ गये और ग्राहकों को प्रीमियम तक वापस नहीं मिला। अकेले जीवन बीमा निगम के ऐसे लुटे पिटे ग्राहक करोड़ों हैं।
अब हो क्या रहा है, इसे समझ लीजिये।
हम अब तक कर्मचारियों और गैर हिंदीभाषी जनता को संबोधित करने के लिए अंग्रेजी में इस विषय पर सिलसिलेवार लिखते रहे हैं। लेकिन अंग्रेजी से उनका इतना ज्यादा सशक्तीकरण हो गया है कि जड़ों से उनका कोई नाता है नहीं और चमचमाते उपभोक्ता बाजार में सबसे ज्यादा पैसा इन्हीं को चाहिए। इनकी यूनियनें भी इस बेहतर आमदनी की जरुरत के मद्देनजर उन्हें वेतन और भत्तो और सवेतन अवकाश जैसे मुद्दों में खपाती रही है। उन्हें हम पिछले तेइस सालों की लगातार कोशिशों के बावजूद समझा नहीं सके हैं।
अब भी राज्यसभा में सरकार को हराने का बाद वाम आवाम बल्ले बल्ले हैं और न वे अर्थव्यवस्था पर कुछ ज्यादा बोल रहे हैं और न राज्यतंत्र को बदलने की बात कर रहे हैं।
जनांदोलन और सत्याग्रह का जिम्मा उनने भी आप और अन्ना ब्रिगेड पर छोड़ रखा है। जबकि संसदीय सहमति अस्थाई सरकारों और लघुमत सरकारों के जमाने में भी कारपोरेट लाबिइंग और कारपोरेटफंडिंग की वजह से लोकतंत्र का स्थाई भाव बना हुआ है।
विपक्ष अगर इतना एकजुट है, इतना जनप्रतिबद्ध है तो राज्यसभा में तो नमूना पेश हो ही चुका है कि अगर हमारे मिलियनर बिलियलर राजनीति जमात के लोग चाहें तो कभी भी कहीं भी अश्वमेधी घोडो़ं की नकेल और बुलरन के सांढ़ों की सींग थाम सकते हैं।
पिछले तेइस सालों से ऐसा लेकिन हुआ नहीं है। न आगे होने की संभावना है।
पलाश विश्वास


