आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर-जैसे वे मुझे लगे
आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर-जैसे वे मुझे लगे
गुरु जी का सम्मोहन ही आर्ट आफ लिविंग है...
व्यक्ति का आचरन धर्म या संस्था को गरिमा प्रदान करता है। कोई भी संस्था या धर्म किसी व्यक्ति को गरिमा प्रदान नहीं करता...
मार्केटिंग, कार्पोरेट ब्रेन्ड का अनिवार्य तत्त्व है। गुरु जी मार्केटिंग में किसी से कम नहीं...
सर्वधर्म सम भाव वाला रविशंकर, “वह जो कभी बड़ा नहीं हुआ, बच्चा ही रह गया।”
तारा चंद्र त्रिपाठी
सांवला रंग। कद सबवन्त 5 फीट 2 इंच से अधिक नहीं। घुँघराली लटें। उन्हें जटाजूट तो कहा ही नहीं जा सकता। जटाओं का सा उलझापन न केशों में है और न व्यवहार में।
इंगुंदी से बंटे जूते सी रुक्मता और जटिलता का दूर-दूर तक कोई संदर्भ नहीं। जटिल तो वे हैं ही नहीं। न देखने में और न विचारों में ही। घने काले बाल और आवक्ष दाढ़ी। इस परिधान को वे अपनी वर्दी कहते हैं। एक उसी तरह जैसे कई सरकारी महकमों की एक वर्दी होती है।
लटकें-झटकें और भंगिमाएं कुछ-कुछ ऐसी मिसीह से मिलती-जुलती हैं। मुँह पर मुस्कान। मीठी वाणी। अंग्रेजी और हिंदी पर समान अधिकार। तमिल और कन्नड़ तो उनकी मातृभाषाएँ हैं। भक्तों के बीच प्रफुल्लित, गुरुत्व की गुरुता से मुक्ति, जैसे उनका बाल सखा हो। सहज और स्वच्छंद।
सनातन हिंदू संस्कार परिभाषा में जन्मा, पलायन, सर्वधर्म सम भाव वाला रविशंकर, “वह जो कभी बड़ा नहीं हुआ, बच्चा ही रह गया।”
अडडीयल इतना कि आप उसे अपना मानें या न मानें वह आपको अपना मानने से पीछे हटने वाला नहीं।


