उम्मीद पर कायम है "शासक वर्ग" की दुनिया
उम्मीद पर कायम है "शासक वर्ग" की दुनिया
उम्मीद पर कायम है "शासक वर्ग" की दुनिया
'उम्मीद पर दुनिया कायम है', हम अक्सर इस पंक्ति को सुनते रहते हैं. लेकिन जब हमारे जीवन के अंतिम क्षण में भी कोई इस पंक्ति को कह जाता है तो आँखें नम हो जाती हैं, गला भर आता है, मन में सवाल उमड़ आते हैं कि अब भी कोई 'उम्मीद' बची है.
एक व्यक्ति एक जमीन के टुकड़े पर अपना आशियाना बनाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काट कर बूढ़ा हो जाता है। उसके सारे सपने टूट कर बिखर जाते हैं। अपने परिवार को खुले आसमान में सोते देखकर विचलित हो जाता है। फिर भी हम उसे सहसा कह देते हैं कि 'उम्मीद' रखिये.
उसे इस शब्द से, आपकी इस पंक्ति से झुंझलाहट होती है.
एक किसान अपने परिवार का भरण पोषण तक नहीं कर पाता और आत्महत्या को मजबूर हो जाता है. हम उसके आत्महत्या का तरह-तरह से विश्लेषण करते रहते हैं. आपस में चाय पर चर्चा के दौरान कहते रहते हैं कि उसे आत्महत्या नहीं करना चाहिए था, 'उम्मीद' रखनी चाहिए थी.
सही बात है, आत्महत्या नहीं करना चाहिए लेकिन क्या 'उम्मीद' भी रखनी चाहिए थी?
जब हर रोज आपकी 'उम्मीद' टूटे, जब हर हमेशा निराश कर दिए जाएँ तो 'उम्मीद' के सिद्धांत पर विश्लेषण जरूरी हो जाता है.
इस पंक्ति के उद्भव और इसके पीछे छुपी 'शासकीय राजनैतिक षड़यंत्र' को समझना आवश्यक हो जाता है. सवाल उठाने जरूरी हो जाते हैं.
ऐसा प्रतीत होने लगता है कि शासक वर्ग ने ही इस उम्मीद की संकल्पना बनाई और इससे ही वो अपने सारे कुकृत्यों पर पर्दा डाला है। उम्मीद को ही उन्होंने ढाल बनाया है.
शासक वर्ग के द्वारा, हर तरह की उपेक्षा एवं शोषण के बाद भी सब कुछ अच्छा होने की 'उम्मीद' बची रह जाती है.
ऐसा लगता है कि परिवर्तन के सिद्धांत ने उम्मीद की नींव रखी है. परिवर्तन प्रकृति का अकाट्य नियम है. सब कुछ बदला है या बदल रहा है और बदलेगा भी, बस आने वाले कल की उम्मीद. आप जिन्दा रहें, कठिन परिश्रम करें. यह कर्म-भूमि है. कर्म करें, फल की इच्छामात्र हीं दुःख का कारण है.
ऐसा तो "गीता" में भी कहा गया है. लेकिन ये सिद्धांत 'प्राकृतिक राज्य' के हैं और हम 'आधुनिक राज्य में रहते हैं.
कितनी आसानी से गीता का उदाहरण आधुनिक राज्य के शासक वर्ग दे दिया करते हैं. मतलब श्रमिक श्रम करें परन्तु मजदूरी की अपेक्षा नहीं रखे, उसकी मजदूरी भी शासक वर्ग की दया पर निर्भर करे.
प्लेटो अपनी किताब 'रिपब्लिक' में कहते हैं कि अगर किसी ने काम किया है तो कर्मफल उसका अधिकार है. लेकिन यहाँ तो इस मजदूर को अपने अधिकार मांगने की भी छूट नहीं हैं.
आप हर पांच साल पर सरकार चुनें लेकिन उससे कोई भी उम्मीद नहीं रखें, उनसे कोई सवाल न पूछें, सब कुछ आप बस उनकी उदारता के ऊपर छोड़ दें. अगर वो उदार न हुए तो अगले उदार ह्रदय की खोज करें और फिर उनसे एक नई उम्मीद.
ऐसा ही हम पिछले कई दशकों से कर रहें हैं. हमारी उम्मीदें बनती हैं और फिर टूटती हैं, बस पूरी कभी नहीं होती.
यह विचारणीय है कि यहाँ ज्यादातर लोग कहते हैं कि इस देश का कुछ नहीं होने वाला, यहाँ कुछ नहीं बदलने वाला फिर भी हम लोगों को उम्मीद देते हीं रहते हैं. सब किसी न किसी वजह से निराश अथवा हताश हैं.
बड़ा सवाल यह है कि ऐसा क्यूँ हैं?
बिहार का एक विधान सभा क्षेत्र, पटना से महज तीस किलोमीटर की दूरी पर है पर बीच में गंगा नदी होने के कारण यह मुख्य-धारा से हजारों साल पीछे हो जाता है. इस विधान-सभा ने बिहार को दो मुख्यमंत्री एवं एक उप-मुख्यमंत्री दिया है, लेकिन तब भी मुख्यमंत्री नाव पर गंगा पार कर उस क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए जाते थे और आज भी उप-मुख्यमंत्री नाव पर ही जाते हैं. यहाँ के लोगों की एक ही इच्छा कि गंगा पर पुल बन जाये लेकिन पुल आज तक नहीं बना, अगर बनी तो बस उम्मीद.
शासक वर्ग इतना बेशर्म हो चुका है कि ये अगली बार भी नाव पर नदी पार कर वहाँ एक नई उम्मीद देने चले जायेंगे.
एक व्यक्ति इस उम्मीद में कि पुल बनेगा और उसकी उगाई हुई सब्जियां, उसके भैंसों के दूध इत्यादी पटना में अच्छी कीमतों पर बिकेंगे, सोचते सोचते मर जाता है लेकिन शासक वर्ग उनके बच्चों को फिर वही उम्मीद दे जाता है.
जब एक मजदूर-किसान अपने बिखरे हुए सपने, टट्टी हुई उम्मीदों और जर्जर जिन्दगी के कारण को ढूंढने की कोशिश करता है, इस पर सोचने लगता है, सवाल उठाने लगता है तो उसे शासक-वर्ग बरबस कहता है कि आप सोचते बहुत हैं, परिश्रम कीजिये, सोचने से काम नहीं चलता.
आप जरा सोचिये कि वह मजदूर किसान परिश्रम ही तो कर रहा था, वह भी घंटों में नहीं बल्कि पहर में, दिन और रात में, पर उसे मिला क्या? शायद सब कुछ अच्छा हो जाने की उम्मीद!
कठिन परिश्रम के वावजूद वह किसान से मजदूर बन गया.
वह खुद शिक्षित था लेकिन उसके बच्चे अशिक्षित हो गए. वह शिक्षित था तो सोच भी रहा था, बच्चे शायद सोच भी न सके.
प्रसिद्ध दार्शनिक इमानुएल कान्त ने कहा की "डेयर टू थिंक" मतलब सोचने की हिम्मत करो, सोचने से ही तो ज्ञान प्राप्त होता है. लेकिन आधुनिक राज्य के शासक-वर्ग आपको सोचने की इजाजत नहीं देता क्यूंकि उसे इस बात का डर है कि अगर शोषित वर्ग सोचने लगा या फिर अपने "फाल्स-कांसिस्नेस" से बाहर आ गया तो वह अभिजात्य वर्ग को उखाड़ फेकेंगा, उसके खिलाफ खड़ा हो जायेगा.
बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान बनाने वक्त इस बात की उम्मीद थी कि कुछेक सालों में इस देश में संविधान का राज होगा, देश में हाशिये पर रह रहे लोगों को प्राथमिकता के तौर पर मुख्य-धारा में जोड़ जायेगा. सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रजातंत्र कायम हो जायेगा.
परन्तु बाबा साहेब की उम्मीद भी तार-तार हो गयी, उनकी उम्मीदों का पुल ध्वस्त हो गया.
दलित-पिछड़े आज तक मुख्य-धारा से मीलों दूर हैं। दलितों का दमन आम सी बात हो गयी. दशकों गुजर गए, एक व्यक्ति ने कितने संवैधानिक संशोधन देखे लेकिन उसका जीवन-स्तर में कोई संशोधन नहीं हुआ. आज भी शोषित समाज, संविधान के राज की उम्मीद लगाये बैठा है.
आज से चार दशक पहले इस देश में "गरीबी हटाओ" का ऐलान किया गया।
टूटती उम्मीद फिर से स्फूर्त हो गयी थी. गरीबी तो नहीं हटी लेकिन गरीब और गरीब जरूर हो गए.
अब तो इस देश को गरीबी दिखती भी नहीं, हर जगह तरक्की ही तरक्की दिखती है. गरीबी महज अब मानसिक स्थिति है.
यह मजाक बस शासक-वर्ग ही कर सकता है.
गरीबी को कम दिखाने के लिए आँकड़े बदल दिए जाते हैं, मानक परिवर्तित हो जाता है और "हमारा देश आगे बढ़ रहा है" के नारे पाट दिए जाते हैं.
हमारा देश बदल रहा है, के होर्डिंग्स आपको दुखी करते रहते हैं. प्रजातंत्र को राजनीति के पिता कहे जाने वाले अरस्तु ने बेहतरीन शासन-तंत्र नहीं माना था.
बहरहाल बुद्धिजीवी वर्ग ने "सच्चे प्रजातंत्र" को सुविधाजनक तंत्र माना है. लेकिन प्रजातंत्र तो शासक वर्गों के हाथ का खिलौना बन गया है. चुनावी राजनीति और सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या ने हम सबको महज "संख्या" में तब्दील कर दिया है.
शासक वर्ग आगे बढ़ गए हैं और देश पीछे छूट गया है.
व्यवस्था चरमरा गयी है, विश्वास टूट गया है फिर भी उम्मीद बची है. आम जन पर अत्याचार हो रहा है, जनता ने कई जगह हथियार उठा लिया है, हर तरफ वैचारिक घमासान मचा है लेकिन हास्यास्पद है कि अभी भी उम्मीद बची है.
शासक वर्ग तरह-तरह के प्रपंचों से लोगों को सदियों से अँधेरे में रख रहा है. इन्हीं प्रपंचों में पुनर्जन्म का सिद्धांत भी आया.
आपसे सहसा पूछ लिया जाता है कि आप सब कुछ इसी जीवन क्यों चाहते हैं. जो इस जीवन में न मिला वो अगले जीवन में मिलेगा. बस कर्म करते जाइये और जन्म लेते जाइये. इस जन्म का अगले जन्म में और अगले जन्म का उसके अगले वाले जन्म में.
यह एक निरंतर प्रक्रिया है.
लेकिन सोचिये इस भ्रम में जीने से फायदा किसका हो रहा है? आप दिन रात शासक वर्ग के लिए काम करते रहते हैं. वो आपके कठिन परिश्रम से अमीर होते जा रहे हैं और आप मेहनतकश गरीब होते जा रहे हैं.
अगर कोई शासक से कह दे कि उनको भी जो इस जन्म में ना मिला वो अगले जन्म मिलेगा तो प्रतिक्रया देखने लायक होगी.
फिर शासक वर्ग "मेरिट" की बात करने लगते हैं. शासक वर्ग के पास अगर मेरिट होता तो भारत विश्व के अग्रणी देशों में होता.
देखते ही देखते भारत दो भाग में बदल गया, शासक वर्ग का भारत और शोषित वर्ग का भारत.
अंततः सारे प्रपंचों की आधारशिला "उम्मीद" ही है.
हमारी सरकारें उम्मीद बनाती रहती है, बाटती रहती है क्यूंकि उम्मीद नहीं रही तो इनकी दुनिया भी नहीं रहेगी.
इस उम्मीद के भ्रम ने ही तो क्रांति के रास्ते बंद कर दिए हैं. अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ा होना ही, इस उम्मीदों के भ्रमजाल से निकलना है.
डॉ. लोहिया ने कहा था कि जिन्दा कौम पांच साल का इन्तेजार नहीं करती. शोषण के खिलाफ संघर्ष करना ही तो बाबा साहेब का सपना था. असल में 'उम्मीद पर दुनिया नहीं कायम है' बल्कि "उम्मीद के भ्रमजाल पर तो शासक वर्ग की दुनिया कायम है".
दीपक भास्कर, असिस्टेंट प्रोफेसर, दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में राजनैतिक दर्शन पढ़ाते हैं.


