उर्दू ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत ही अहम भूमिका अदा की थी
उर्दू ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत ही अहम भूमिका अदा की थी
उर्दू की हिफ़ाज़त और फ़रोग़ के लिए
जनवादी लेखक संघ उर्दू की हिफ़ाज़त और फ़रोग़ को देश में जम्हूरियत की हिफ़ाज़त और उसके फ़रोग़ से जोड़ कर देखता है। उर्दू को ख़त्म करने की जो साजि़श सामराजियों ने रची, वह आज़ादी के बाद भी चलती रही क्योंकि उर्दू ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत ही अहम भूमिका अदा की थी। आज़ादी के तराने जन जन तक उसी ज़ुबान में पहुंचते थे। इसलिए भारत में जनवाद की रक्षा और विकास का सवाल उर्दू की रक्षा और विकास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसी समझ के तहत जनवादी लेखक संघ ने उन तमाम राज्यों में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने के लिए जद्दोजहद की जिनमें उर्दूभाषी अवाम की तादाद काफी ज़्यादा है, जिसके फलस्वरूप बिहार, झारखंड, दिल्ली आदि राज्यों में उसे वह दर्जा मिला है। यह अफ़सोसनाक है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में, जहां उर्दूभाषी आबादी ख़ासी बड़ी है, इस जुबान की उन्नति के लिए जो क़दम उठाये जाने चाहिए थे, वे नहीं उठाये गये।
जनवादी लेखक संघ ऐसे सभी राज्यों की सरकारों से, जहां काफी तादाद में उर्दूभाषी अवाम रहते हैं, यह मांग करता है कि वे अपने राज्यों में उर्दू को दूसरी राजभाषा बनायें और उसकी पढ़ाई लिखाई आदि की सहूलियत मुहैया करायें। जलेस उर्दू के हक़ में संघर्ष करने के लिए सभी लेखकों का आह्वान करता है।
प्रस्ताव: चंचल चौहान अनुमोदन: षुभा
जनवादी लेखक संघ के आठवें राष्ट्रीय सम्मेलन (14-15 फरवरी, इलाहाबाद) में पारित प्रस्ताव


