कोई शक?
खेल उतना छुपा भी नहीं है, जितना भोले लोग समझते हैं!
सबके अपने अलग कारण भी हैं, पर एक साझा उत्प्रेरक भी तो है ही।
सांप्रदायिकता को ज़िंदा रखना है, तो एक दूसरे को बल भी तो देना होगा!
ओवैसी और मुलायम ने ‪#‎सुपारी क़बूल कर ली है!
देखना बस यही है कि जनता इनके मंसूबों के पीछे के खेल को समझ पाती है या नहीं।
अंधेरे और रौशनी के बीच विभाजक रेखा बहुत पतली (और कभी-कभी बहुत धुंधली) होती है।
देश रामायण-महाभारत काल में चला जाएगा या आधुनिक युग में रहना पसंद करेगा, यह बहुत हद तक बिहार-चुनाव-नतीजों पर निर्भर करेगा!
बच्चों के कोमल मन पर छाप लगाने की कोशिशें तो शुरू हो ही गई हैं, तमाम भाजपा-शासित राज्यों में पाठ्यक्रम में छेड़-छाड़ के ज़रिए!
मोहन श्रोत्रिय

मोहन श्रोत्रिय, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। आपने 70 के दशक में चर्चित त्रैमासिक ‘क्‍यों’ का संपादन किया और राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में आपकी अग्रणी भूमिका रही। आप 1980-84 के बीच राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव तथा अखिल भारतीय विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के राष्‍ट्रीय सचिव रहे