पांच हजार साल से भारत पर काबिज विदेशी आर्यों के एकाधिकार को चुनौती देने वाली आरक्षण व्यवस्था को राष्ट्रहित में तुरन्त समाप्त किया जाये!
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया है कि—राष्ट्रहित में आरक्षण समाप्त किया जाये, बल्कि कोई आरक्षण होना ही नहीं चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आजादी के 68 वर्षों बाद भी कुछ विशेषाधिकार (आरक्षण संबंधी) नहीं बदले हैं।
देश की सबसे बड़ी अदालत के दो आर्य-ब्राह्मण न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा और श्री पीसी पंत की पीठ ने कहा है कि राष्ट्र के हित में यह आवश्यक हो गया है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं को सभी तरह के आरक्षण से दूर रखा जाए। केन्द्र सरकार से यह भी कहा कि वह इस संबंध में निष्पक्षतापूर्वक ‘सकारात्मक’ प्रभावशाली कदम उठाए। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जाए और उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर देश के लोगों की मदद की जाए।
दो आर्य जजों द्वारा 10 फीसदी आर्यों के हित को, राष्ट्रहित घोषित करते हुए सुनाये गये इस निर्णय का अत्यधिक सतर्कता, बारीकी और गम्भीरता से विश्लेषण किया जाना बेहद जरूरी है, क्योंकि इस निर्णय की भावना और भाषा सीधे-सीधे आरएसएस की भाषा से मेल खाती है।
1. राष्ट्र और राष्ट्रहित क्या है? सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि राष्ट्रहित में कोई आरक्षण होना ही नहीं चाहिये। संघ भी यही भाषा बोलता है। अत: वर्तमान हालात में देश के भविष्य के लिये सबसे बड़ा, ज्वलन्त और विचारणीय सवाल तो यही है कि आखिर संघ और सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्र और राष्ट्रहित क्या है?
(1) येन-कैन प्रकारेण केवल 10 फीसदी मेरिटधारी आर्यों को बढावा देना ही राष्ट्र और राष्ट्रहित है? यदि मेरिटधारी आर्यों को बढावा देना ही वास्तव में राष्ट्र और राष्ट्रहित है तो फिर मेरिटधारी विदेशी आर्यों से भी मेरिट में कई गुना श्रृेष्ठ और निष्पक्ष अंग्रेजों से देश को मुक्त करवाने की क्या जरूरत थी?
(2) हजारों सालों से सभी संसाधनों और व्यवस्था पर बलात काबिज आर्यों को आगे बढाने में ही राष्ट्रहित है या आर्यों द्वारा हजारों सालों से शोषित 90 फीसदी अनार्य फीसदी आबादी को संविधान के अनुसार शासन, प्रशासन में प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय संसाधानों में सामान भागीदारी प्रदान करने के लिये संविधानसभा द्वारा उपबन्धित संवैधानिक प्रावधानों को लागू करना राष्ट्रहित है?
(3) संविधान के अनुसार लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना और सामाजिक न्याय की स्थापना करना राष्ट्रहित है या आर्य-मनुवादी-सामन्तशाही और धंधेबाज-कार्पोरेट घरानों के हाथों देश को बेचने में राष्ट्रहित है?
(4) भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शहीदों में शामिल लोगों की लिस्ट देखकर आसानी से पता लगाया जा सकता है कि मेरीटधारी आर्य-राष्ट्रहित में कितने समर्पित रहे हैं!
2. निष्पक्षता क्या है? सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि केन्द्र सरकार आरक्षण को समाप्त करने के लिये निष्पक्षतापूर्वक ‘सकारात्मक’ प्रभावशाली कदम उठाए। इस बात को भी समझने की जरूरत है :-
(1) कितनी हास्यास्पद बात है कि पक्षपातपूर्ण निर्णय सुनाने वाले आर्य-जज निष्पक्षता की बात करते हैं! क्या गिने-चुने परिवारों के वर्चस्ववाली आर्यों का पक्ष पोषण करने वाली न्यायपालिका को निष्पक्षता की बात करने का कोई हक है? क्या इसी को निष्पक्षता कहते हैं?
(2) जिस सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के लिये योग्य वकीलों को लिखित परीक्षा पास करना अनिवार्य हो उसी सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के कोई मानदण्ड निर्धारित नहीं हों। क्या इसी को निष्पक्षता कहते हैं?
(3) जिस सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति करने के लिये संविधान में वर्णित और निर्वाचित जन प्रतिनिधि​यों की संसद द्वारा बनाये गये कानून अमल में नहीं लायें जाते हों और अपने ही रिश्तेदारों को जज नियुक्त किये करने वाले जज निष्पक्षता की बात करते हैं। क्या इसी को निष्पक्षता कहते हैं?
(4) जिस न्यायपालिका में 90 फीसदी अनार्य आबादी को प्रतिनिधित्व प्रदान किये बिना निष्पक्षता की बात कही जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को आत्मालोचन करना होगा कि हकीकत में निष्पक्षता कहते किसे हैं?
3. 68 वर्ष बाद भी विशेषाधिकार नहीं बदले हैं : सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि आजादी के 68 वर्ष बाद भी आरक्षण रूपी विशेषाधिकार नहीं बदला है। आश्चर्य होता है, इस प्रकार की टिप्पणियों को पढ़कर! सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बारे में कुछ तथ्य विचारणीय हैं :—
(1) सुप्रीम कोर्ट केवल 68 वर्षों की बात करता है, जबकि पांच हजार साल से एक जाति विशेष पर गंदे नालों और संडासों की सफाई करने के लिये के थोपा गया विशेषाधिकार सुप्रीम कोर्ट को गत 68 वर्षों दिखाई नहीं दे रहा है।
(2) आजादी से पहले भारत की कड़ाके की गर्मी में काम नहीं कर पाने के कारण गोरे अंग्रेज जज गर्मियों की छुट्टियां मनाने अपने शीत प्रधान देश ब्रिटेन चले जाया करते थे। इस विशेषाधिकार को भारत के जजों ने भी ज्यों का त्यों अपना लिया। वर्तमान में जबकि सभी जज जून के महीने में भी वातानुकूलित कक्षों में सर्दी से ठिठुरते रहते हैं, लेकिन गर्मियों के अवकाश के विशेषाधिकार को छोड़ना शायद उनको याद नहीं रहा?
(3) हजारों सालों से मन्दिरों में केवल आर्य-ब्राह्मण ही पूजा-अर्चना करने के विशेषाधिकार का उपयोग और उपभोग (देवदासी काया के उपभोग सहित) करते रहे हैं, लेकिन यह विशेषाधिकार सुप्रीम कोर्ट को शायद दिखाई नहीं देता है, आखिर क्यों? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में ​भी तो आर्यों का विशेषाधिकार है!
4. मेरिट/गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता : संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि देश हित में मेरिट/गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता। इसलिये गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली आरक्षण व्यवस्था को समाप्त किया जाये। इस सम्बन्ध में संघ और सुप्रीम कोर्ट से सीधे सवाल—
(1) सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट जजों की गुणवत्ता का प्रमाण है, लाखों मामलों का दशकों से अनिर्णीत और लम्बित पड़े रहना।
(2) मेरिट/गुणवत्ता के आधार पर चयनित होकर देश के नीति-नियन्ता 95 फीसदी से अधिक प्रशासकीय और शासकीय पदों पर कथित बौद्धिकता के धनि आर्यों के काबिज होते हुए देशभर में लगातार-भुखमरी, वैश्यावृत्ति, नाइंसाफी, कुटिल-भेदभाव, भ्रष्टाचार, छुआछूत, चोरी, डकैती, अत्याचार, शोषण, कालाबाजारी, उत्पीड़न, करचोरी, कामचोरी, बलात्कार, कमीशनखोरी, कन्याभ्रूण हत्या, दलितों और मुसलमानों को ज़िंदा जलाना, आदिवासियों से अमानुषिक व्यवहार जैसे अनेकानेक विधि-विरुद्ध कुकृत्य दिन-प्रतिदिन क्यों बढते जा रहे हैं?
(3) संघ और सुप्रीम कोर्ट पर काबिज विदेशी-आर्य-नेतृत्व मेरिट/गुणवत्ता को बढावा देने के पक्ष में हैं। गुणवत्ता के बहाने देश की 90 फीसदी अनार्य आबादी को नीति-नियन्ता-निर्णायक पदों पर देखना नहीं चाहता है। मेरा सीधा सवाल है कि आर्य और अंग्रेज दोनों नस्ल विदेशी हैं। जब मेरिट/गुणवत्ता ही श्रेष्ठता/योग्यता और ​निष्पक्षता का पैमाना है तो फिर अंग्रेजों को भगाने की क्या जरूरत थी? अंग्रेज संसार की श्रेष्ठतम मेरिटधारी नस्ल है। अभी भी अंग्रेजों को जज, डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाये तो अधिक निष्पक्ष और सुसंगत न्याय करेंगे। ऐसे में आर्यों को मेरिट की बात करना शोभा नहीं देता है।
(4) यदि मेरिट/गुणवत्ता में वास्तव में आर्य ही सर्वश्रेष्ठ रहे हैं तो भारत के संविधान के निर्माण के समय आर्यों की बौद्धिक श्रेष्ठता को क्यों सांप सूंघ गया था? क्यों बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी को संविधान निर्माण जैसा बौद्धिक कार्य सौंपा गया?
उक्त विवेचन से सुस्पष्ट है कि संघ के नेतृत्व में विदेशी-आर्य-नस्ल राष्ट्रहित, निष्पक्षता और बौद्धिक श्रेष्ठता के बहाने इस देश को आर्यों का गुलाम बनाने के लिये कृतसंकल्पित है। जिसकी शुरूआत स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी जी के समय से संघ द्वारा की जा चुकी है। जिसका प्रमाण स्वर्ण-मन्दिर में सिक्खों का कत्लेआम, फिर इन्दिरा गांधी की हत्या तथा हत्या के बाद फिर से सिखों का संहार। इसी बीच संघ के इशारे पर संघ प्रमुख के चयन की अलोकतांत्रिक प्रणाली की भांति सुप्रीम कोर्ट में आर्य जजों द्वारा खुद ही आर्य जजों को चयनित करने के लिये मनमानी कोलेजियम प्रणाली ईजाद की गयी। जिससे संघ के विचारों के समर्थक आर्य-जजों का न्यायपालिका में सम्पूर्ण वर्चस्व कायम हो गया। राजीव गांधी जी के शासनकाल में संघ का कांग्रेस के सर्वोच्च थिंक टैंक पर कब्जा शुरू हो चुका था, जिसके चलते अयोध्या में पूजा ​शुरू करवायी गयी और अंतत: नरसिम्हारावजी के शासनकाल में बाबरी मस्जिद को शहीद करवा दिया गया। डॉ. मनमोहन सिंह जी का शासन तो पूरी तरह से संघ के एजेंट कांग्रेसियों के इशारों पर इस प्रकार की नीतियों/कुनीतियों से संचालित किया गया कि कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर दिया गया और देश पर आर्य संचालित संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा का पूर्व बहुमत के साथ कब्जा हो गया। जिसमें कांग्रेस के शासनकाल में ईवीएम को लागू करवाने में संघ की महत्वूपर्ण भूमिका रही है। संघ की आन्तरिक शक्तियों के मार्फत संचालित कांग्रेस की कुनीतियों और ईवीएम का ही कमाल है जो वर्तमान में भाजपा को प्रचंण्ड बहुत मिला हुआ है।
इन हालातों में जबकि सभी प्रमुख राजनैतिक दल आर्यों के कब्जे में हैं। अजा एवं अजजा के सांसद और विधायक अपने-अपने दलों के आर्य-प्रमुखों के गुलामों से कम नहीं। राज्यसभा में आर्यों का सम्पूर्ण कब्जा है। कार्यपालिका और न्यायपालिक पर संघ नीति के प्रशासकों, शासकों और जजों का एकाधिकार है। मीडिया आर्यों का व्यवसाय है। ऊल-जुलूल धर्मग्रन्थों से भ्रमित आम अनार्य खुद को आर्यों का वंशज मानकर मनुवादी अमानवीय व्यवस्था के पोषण, अनुसरण और संरक्षण में तल्लीन होकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। ऐसे में भारत के बहुसंख्यक (MOST=Minority+OBC+SC+Tribals) अनार्यों को संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण का समाप्त किया जाना चार दशक पहले निर्धारित की गयी संघ की रणनीति का परिणाम है।
आये दिन होने वाली हत्या और बलात्कारों के बावजूद भी दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक क्या सिर्फ बाबा अम्बेडकर, बुद्ध और बिरसा का गुणगान ही करते रहेंगे या अपने बल पर भी कुछ करेंगे? संघ द्वारा पिछड़े वर्गों को राजनैतिक और प्रशासकीय भागीदारी से वनवास पहले ही तय किया जा चुका है। इन हालातों में संघ द्वारा आरक्षण और लोकतंत्र को समाप्त करने की सशक्त और क्रूरतम शुरूआत की जा चुकी है। ऐसा लगता है कि भाजपा की सरकार सीधे-सीधे कुछ नहीं करेगी, बल्कि न्यायपालिका के दरवाजे से सामाजिक न्याय और लोकतंत्र को तहत-नहस किया जायेगा। न्यायिक चयन आयोग-गठन कानून का निर्माण और कोलेजियम का विरोध केवल सरकारी नाटक था। जिसका पटाक्षेप हो चुका है। अब ऐसा लगाता है-भाजपा की केन्द्र सरकार राष्ट्रहित के नाम पर अनुशासित आज्ञाकारी विद्यार्थी की भांति न्यायिक आज्ञाओं का पालन करती रहेगी।
यदि हालात ऐसे ही रहे तो हम जैसे कुछ चुनिन्दा अनार्य लेखकों को बहुत जल्द सींखचों में बंद कर दिया जायेगा और जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था कि देश को सामन्तशाही-आपात काल को झेलने की तैयारी कर लेनी चाहिये। क्या अभी भी और इन विकट हालातो में भी 90 फीसदी अनार्य आबादी केवल सोशल मीडिया पर विधवा विलाप करती रहेगी या आर्यों की गुलामी से मुक्ति के लिये एकजुट होने का साहस जुटा पायेगी? आज सभी विभेदों को भुलाकर देश की बहुसंख्यक (MOST=Minority+OBC+SC+Tribals) अनार्य वंचित आबादी को एकजुट होकर अपने हकों का आर्यों की कुनीतियों के साहसिक विरोध में जान की बाजी लगाने का अंतिम वक्त आ चुका है!
- डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' -राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान