लोकतांत्रिक राजनीति में विपक्ष को दुश्मन नहीं माना जाता है, लेकिन संघियों के इशारे पर चलने वाली सरकार यही कर रही है
सुयश सुप्रभ
कन्हैया की वाहवाही करके देश में बदलाव की प्रक्रिया का भागीदार बनने की ख़ुशी पाना बहुत आसान है। एक पोस्ट या वीडियो पसंद करने में समय ही कितना लगता है। मुश्किल है कन्हैया की कुछ बातों को अपनी ज़िदगी में लागू करना या उन बातों के प्रचार-प्रसार के लिए समय निकालना। हमें इस मुश्किल रास्ते पर ही चलने की कोशिश करनी चाहिए। कल कन्हैया ने जो कुछ कहा उनमें से ये तीन बातें मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगीं :
1. अभी हमें रोहित वेमुला के आंदोलन को आगे ले जाना है। जेल में लाल और नीले रंग की कटोरियों को देखकर उन्होंने वामपंथियों और आंबेडकरवादियों की एकता के बारे में सोचा और इसकी ज़रूरत पर उन्होंने ख़ास तौर पर ज़ोर दिया। अभी हमें सरकार को रोहित के मसले पर घेरना है। यह एकता संघियों और ग़ैर-संघी शोषकों के मन में डर पैदा करती है क्योंकि इससे उन्हें सदियों से चली आ रही मानवद्रोही व्यवस्था के टूटने और अपने वर्चस्व को खोने का डर सताने लगता है।
2. कन्हैया ने विपक्षी और दुश्मन के बीच के अंतर को बहुत अच्छी तरह स्पष्ट किया। लोकतांत्रिक राजनीति में विपक्ष को दुश्मन नहीं माना जाता है, लेकिन संघियों के इशारे पर चलने वाली सरकार यही कर रही है। असहमति को अपराध बनाने वाले लोग लोकतंत्र की हत्या करना चाहते हैं। कैंपस में एबीवीपी को अपना दुश्मन नहीं बल्कि विपक्ष कहकर कन्हैया ने यह साबित कर दिया कि जनवादी राजनीति की जैसी भाषा वे रच रहे हैं उसमें तमाम मसलों पर सार्थक विमर्श छेड़ने की क्षमता है।
3. कन्हैया ने जेएनयू के संदर्भ में आत्मालोचना करते हुए यह कहा कि इस कैंपस के लोग जनता के बारे में सोचते तो बहुत हैं लेकिन उनकी भाषा इतनी जटिल होती है कि जनता के सिर के ऊपर से निकल जाती है। व्हाट्सऐप के संदेशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने जनता के हितों से जुड़ी बातो को जनता की ही भाषा में सामने रखने के महत्व के बारे में बताया। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन वामपंथियों ने भाषा के मामले में बहुत लापरवाही दिखाई है। उन्हें कन्हैया की इस सलाह की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। जेएनयू में राष्ट्रवाद पर जितने भाषण हुए हैं उन्हें जनता की भाषाओं में सामने लाने की ज़िम्मेदारी भी जनवादी संगठनों की ही है। तमाम भारतीय भाषाओं में उनका अनुवाद होना चाहिए।
कन्हैया को एक और नायक बनाकर हम उनके विचारों की हत्या कर देंगे। भारत में यही होता आया है।

कन्हैया की बातों को ध्यान से सुनिए और उन पर अमल करने की कोशिश कीजिए।
कन्हैया भी यही चाहते हैं।
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