वरिष्ठ लेखक, पत्रकार, रेडियो उद्घोषक, अनुवादक, विचारक और वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता का. राधेश्याम दुबे (91 वर्ष) आज सुबह नहीं रहे। उन्हें सोमवार 27 अक्टूबर की सुबह आखिरी विदाई दी जाएगी और उनकी देह एम्स, दिल्ली को सौंपी जाएगी। अभी उनका शव 1091, सेक्टर-9 , वसुंधरा, गाज़ियाबाद में भतीजे श्री मुकुल दुबे के निवास पर रखा गया है। दुबे जी की बेटी भारती जी कल देर रात मास्को से यहाँ पहुंचेंगी। इस समय उनकी मुंहबोली बेटियां श्रीमती अचला यासीन और श्रीमती वंदना शर्मा उनके पास हैं।

मूल रूप से इटावा (उ.प्र.) के निवासी दुबे जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए.और एल.एल.बी. की पढ़ाई की और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े। 1940 के दशक के मध्य में वह बम्बई में पार्टी के मुख्यालय पहुँच कर हिंदी साप्ताहिक के सम्पादकीय विभाग में काम करने लगे। 1955 में उन्होंने मास्को रेडियो के हिंदी उद्घोषक की ज़िम्मेदारी संभाली और लगभग तीन दशक तक यहाँ कार्य करने के बाद भारत आ गये।

दुबे जी ने रूसी कृतियों का हिंदी अनुवाद किया। 'दिनमान', 'रविवार' अदि पत्र-पत्रिकाओं के लिए उन्होंने सामयिक लेख, संस्मरण लिखे। लोक प्रकाशन गृह, दिल्ली ने उनके लेखों के दो संग्रह प्रकाशित किये हैं- "कहानी एक मजमून की" और "बदलती तस्वीरें"।

मेरे जैसे कई लोगों के वह आदरणीय गुरु और प्रिय दोस्त थे। बहुत अच्छे इंसान! फिलहाल इतना ही....

(जितेंद्र रघुवंशी की फेसबुक वॉल से साभार )