कृपया भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा को कमीशनखोरी का जरिया न बनायें!
नेपाल में 25 अप्रैल को दिन की दुपहरी में 11.56 मिनट पर गोरखा जिले के बरपाक को केंद्र बनाकर आये 7.9 रिक्टर स्केल के भूकम्प ने हमारे पडोसी देश में व्यापक जन धन की क्षति पहुंचाई है. नेपाल सरकार के अनुसार मृतकों की संख्या 10,000 के आस पास हो सकती है. इत्तेफाक से 25 अप्रैल का दिन नेपाल में सार्वजानिक अवकाश का दिन होता है, इसलिए बहुत बड़ी संख्या में लोग घरों से बाहर सड़कों और बाजारों में थे. इसलिए इतनी मानवीय क्षति नहीं हुई. यदि कहीं भूकम्प के झटके रात में आये होते, तो मानवीय क्षति बहुत ब्यापक हुई होती. इस भूकंप का केंद्र बिंदु नेपाल का मध्य-पश्चिम जिला लम्जुंग, गोरखा और काठमांडू थे. 25 अप्रैल के बाद से लेकर इस लेख के लिखने तक करीबन 106 झटके आ चुके हैं, जिनमें अधिकांश 2, 4 और 6 रिक्टर स्केल के आस पास के थे. इन झटकों से व्यापक मानवीय क्षति देश की राजधानी काठमांडू और उससे सटे हुए दर्जनों जिलों में हुई है, मसलन सिन्धुपाल्चोक, गोरखा, लम्जुंग, नुवाकोट, धादिंग, तनहूँ, कास्की, रसुवा. साथ ही साथ करीबन मध्य और उत्तर पश्चिम नेपाल के दर्जनों जिलों में भी व्यापक असर है.
इस भूकम्प के बाद होने वाले राहत कार्य पर देश की शासन ब्यवस्था केंद्रीकृत एकात्मक प्रणाली की भी छाप गहन तौर पर महसूस की जा रही है. इसका असर भूकम्प के बाद के राज्य द्वारा चलाये जा रहे मानवीय प्रयासों में भी बडे पैमाने पर महसूस की जा रही है. इस लेख के लिखने तक यानि 4 दिन बीत जाने के बाद भी काठमांडू के बाहर राज्यसत्ता और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी सहायता एजेंसियाँ के कहीं चिन्ह नजर नहीं आ रहे हैं. जैसे देश का मतलब मात्र राजधानी काठमांडू ही हो. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राहत के लिए पहुंची सहायता पहुंची खाद्यान्न सामग्री, औषधि, खुले मैदान में बिछाने के लिए टेंट और त्रिपाल इत्यादि जैसे सब कुछ काठमांडू के लिए ही चाहिए. काठमांडू के अलावा और प्रभावित जिले जैसे देश के हिस्से ही न हों. दुकानदार और व्यापारी लोगों की जैसे चांदी हो गयी है, वे एक का सामान सौ में बेच रहे हैं. शाब्दिक अर्थों में कहें तो वे पहले से लुटी पिटी जनता को लूट रहे हैं और ऐसे में सरकार का जैसे तो आस्तित्व ही नहीं है. ऐसे में प्रसिद्ध नेपाली कथाकार खंगेंद्र संगरौला के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल को काठमांडू में राहत और बचाव कार्य को सुगम बनाने के लिए ‘सरकार खोजने’ जाना महंगा पड़ा। प्रधानमंत्री कोइराला की पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज किया.
एक तरफ नेपाल में महामारी फैलने का खतरा मंडरा रहा है, और दूसरी तरफ सरकार का नामो निशान नहीं है, दूकानदार सरेआम लूट पाट में लगे हैं. काठमांडू के बाहर के इलाकों में अभी राहत सामग्री नहीं पहुँच पायी है. और वहां अब सरकार बिरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.
ऐसे में ब्याक्तिगत स्तर पर बहुत सारे नेपाली नागरिक, राहत और बचाव कार्य में लगे होना थोडा संतोष की साँस देता है. डॉ. दिनेश परसाई और विवेकशील नेपाली समूह जैसे लोगों का समूह का लेखा जोखा सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर मिल जाएगा.
दिनेश जैसे बहुत सारे और मित्र नेपाल में और बहुत सारे होंगे जो विपदा की इस घड़ी में खाद्य सामग्री लेकर गोरखा जिले के दुर्गम बरपाक क्षेत्र के अलावा (भूकम्प के केंद्र बिंदु में से एक) में गए होंगे, पैदल नहीं, चार पहिया जीप लेकर, जैसा कि मीडिया में संसार भर में प्रचारित किया जा रहा है, कि काठमांडू को जोड़ने वाले सभी जिले सड़क मार्ग से कट गए हैं. क्या भूकम्प जैसी प्राकृतिक त्रासदी से नेपाल का सत्ताधारी कुलीन वर्ग कुछ सीख ले सकेगा, कि देश को संघीय गणतंत्र की महती जरुरत क्यूँ है. जबकि त्रासदी के लिए सब कुछ काठमांडू में ही न केन्द्रित हो देश की स्थिति अस्त-व्यस्त हो जाय। 4 दिन बीत जाने के बाद भी कुलीन वर्ग और गैर सरकारी संगठनों को काठमांडू के अलावा और कहीं राहत कार्य और घायलों को बचाने की जिम्मेवारी का अहसास होता हो, क्यूंकि आखिर वे तो निरीह किसान ही हैं?
नेपाली प्रधानमंत्री के अनुसार, इस भूकम्प से मरने वाले लोगों कि संख्या 10,000 से ज्यादा पहुँच सकती है. राष्ट्र संघ के अनुसार, इस भूकम्प से करीबन 80 लाख लोग प्रभावित हुए हैं. इस को मद्देनजर रख कर नेपाल सरकार ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है. बचाव और राहत कार्य के लिए कई देशों ने मदद का हाथ बढ़ाया है. कई देशों ने करोड़ों डालर की अनुदान का पैकेज, खाद्य सामग्री, औषधियां भेजने के साथ-साथ घायलों के उपचार के लिए मेडिकल दल के साथ प्राकृतिक आपदा के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित अपनी सेना की विशेष टुकड़ियां भेजीं हैं. लेकिन नेपाल के लिए संकट की इस घडी में मदद का जिसने तत्काल हाथ बढ़ाया, वह दो पडोसी मुल्क भारत और चीन ही हैं. यह अलग बात है कि भारतीय समाचार पत्र और टीवी चैनल केवल भारतीय सेना के राहत कार्य की कवर स्टोरी और बड़ी-बड़ी तस्वीरें छाप रहे हैं, चीन की नहीं. (अलबत्ता पाकिस्तान ने भक्तपुर जिलें में पाकिस्तान आर्मी का एक फिल्ड मोबाइल अस्पताल स्थापित किया है, उसकी कवर स्टोरी तो हम जैसे सोच ही नहीं सकते). दक्षिण एशिया के अन्य पड़ोसी मुल्कों यथा भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि सभी ने मदद का हाथ बढ़ाया है.
लेकिन इस संकट के समय अभी कल तक नेपाल में राजनितिक और सामाजिक परिवर्तन की हुंकार भर रहे तमाम सत्ता धारी और विपक्षी दलों का अता पता नहीं चल रहा है. इस दारुण और राष्ट्रीय संकट की घड़ी में सभी जाने किस बिल में समां गए हैं. देश के प्रधानमंत्री ही इतने गैर जिम्मेवार और नाकारा साबित हुए कि जब नेपाल में भूकम्प आया, उस समय हालाँकि वे व्देश दौरे में इंडोनेशिया में थे, पर तत्काल वापस लौटने के बजाय वे दो दिन बाद देश वापस लौटे, शायद बांडुंग शिखरवार्ता के समय वे भूकम्प के जरिये कुछ तत्काल अनुदान राशि पाने की एवज में अपना व्यक्तिगत कमीशन सुरक्षित कर लेना चाहते हों. माननीय राष्ट्रपति महोदय राम बरन यादव इस बात पर खफा हैं कि बिना उनकी सलाह और मुहर लिए ‘किसने’ देश में राहत कार्य के लिए विदेशी राष्ट्रों की सेना को बुलाया और देश में 1 महीने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की. नेपाल के राष्ट्र प्रमुख होने के नाते इस राष्ट्रीय महत्व के विषय में निश्चित रूप में उनका यह अधिकार बनता है, कि उनकी सहमति ली जाय. और विपक्ष के भूतपूर्व प्रधानमंत्रीगण, जिसमे करीबन दर्जन भर कम्युनिस्ट और माओवादी प्रधानमंत्री शामिल हैं, वे जैसे अपने बिलों में घुसे हुए थे, कि कहीं भूकम्प में वही न सबसे पहले ‘शहीद’ हो जाएँ. कम्युनिस्ट प्रधानमंत्रियों मसलन माकुने <असल में इनका नाम माधव कुमार नेपाल है, लेकिन नेपाल जनता इन्हें इनके बिशेष गुणों यथा (दलाली आदि) प्यार से माकुने बुलाती है> अपनी पार्टी के ही सत्ताधारी गृहमंत्री बामदेव गौतम पर व्यंग्यबाण चला रहे थे, ‘कि भूकम्प के बाद दो दिनों से उन्होंने गौतम जी को नहीं देखा’. और वे गृहमंत्री को इसलिए कोस रहे थे, कि उन्हें उनकी ही पार्टी के गृहमंत्री ने इतने बड़े फैसले से अनभिज्ञ रखा. इधर एक भूतपूर्व माओवादी प्रधानमंत्री (जिनकी पार्टी आम जनता में कैश माओवादी के रूप में कुख्यात है, क्यूंकि उन्होंने प्रचंड माओवाद के नेतृत्व में सात पीढ़ी अक न ख़त्म होने के लिए अथाह संपत्ति कमाई है) से एक बाबुराम भट्टराई ने ‘क्रांति’ के पुराने दिनों की याद ताजा करते हुए चार्टर हवाई जहाज में एक पत्रकार और नेताओं की टोली लेकर भूकम्प से प्रभावित अपने संसदीय क्षेत्र गोरखा की यात्रा संपन्न की. फोटो की चकाचौंध में उन्होंने खुले में टेंट लगाकर बैठी जनता को फिरी में खाद्य सामग्री भेजने का आश्वासन दिया. अब अगले कुछ दिनों में पूरा हो जाए, जब सरकार और सहायता एजेंसी वहां तक पहुंचे. वो इतने ज्यादा भले मानुस निकले कि भूकम्प से प्रभावित जनता के लिए हवाई जहाज से कुछ खाने की सामग्री और औषधि ले जाते, लेकिन ऐसे में होश कहाँ रहता है. हाँ उन्हें होश इस बात का जरूर था कि काठमांडू में अपने बिल में वापस आते समय एक नजर अपने ससुराल के तबाह कोठी में फोटो सेशन कराने जरूर गए.
इससे यह सिद्ध होता है, कि नेपाल की वर्तमान एकात्मक राजसत्ता भूकम्प जैसी आपदा से निपटने में कितनी अक्षम साबित हो रही है. राहत सामग्री के साथ देश विदेश से आये सैकड़ों सुरक्षा और मेडिकल दल नेपाली नौकरशाहों के आदेश के इन्तजार में राजधानी में बैठे हैं और (नेपाली कांग्रेसी) वित्त मंत्री रामशरण महत और (कम्युनिस्ट एमाले) के गृह मंत्री बामदेव गौतम के बीच में भूकम्प पीड़ितों के लिए आई करोड़ों डॉलर की अनुदान राशि को गपकने और कमीशन बनाने को लेकर चल रही तनातनी को असह्य रूप में देख रहे हैं. असल में नेपाल ही नहीं (भारत का भी) का यही यथार्थ है, कि जितनी बड़ी त्रासदी, नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों का उतना बड़ा मुनाफा.
नेपाल की जनता की दुख की इस घड़ी में जरूरत है कि सभी राजनीतिक दल एक साथ खड़े हों. भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा के बाद पैदा होने वाले सवालों से एकजुटता से टकरायें. काठमांडू और काठमांडू के बाहर के दर्जनों जिलों में द्रुत गति से राहत और बचाव कार्य के लिए विदेशों से आई टीमों के साथ देश में सुरक्षा बलों और सहायता समूहों के साथ उचित समन्वय करते हुए जन जीवन को सामान्य बनाएं, देश में महामारी फैलने से रोकें और कमीशनखोरी से बाज आयें.
पवन पटेल
पवन पटेल, लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र बिभाग में पीएचडी हैं और आजकल वे ‘थबांग में माओवादी आन्दोलन’ नाम से एक किताब पर काम कर रहे हैं; वे भारत-नेपाल जन एकता मंच के पूर्व महा सचिव भी रह चुके हैं।

भूकम्प पीड़ितों के लिए राहत सामग्री के साथ दिनेश (दायें से); फोटो के बैकग्राउंड में एक टूटा घर