रति सक्सेना

यदि वैचारिकता को एक खास जामे में नाप कर देखा जाए, और नाप में फिट ना उतरने पर उतार कर रख दिया जाए, तो उस भीड़ के लिए सहज हो जाता है जो हमेशा नकल करने की आदी रही है। यह नाप हर काल में किसी भी स्थान पर अलग अलग तरीके से तय किया जाता है, वो बात अलग है कि उसके शब्द बदल जाये, लेकिन भीतरी राग, और तंन्त्र एक ही होता है। जैसे कि आज के वक्त हम नफरत को केन्द्र मं देख सकते हैं, मुझे तुम्हारी भाषा, तुम्हारी त्वचा का रंग पसन्द नहीं है, मतलब मुझे तुमसे नफरत करने का अधिकार है, इस जामे को गोटा मलमल लगाने का काम करता है धर्म। हालांकि धर्म को भी मालूम नहीं कि वह किसके खिलाफ खड़ा है, ईरान इराक में शिया सुन्नी के बीच, तो अमेरिका और मैक्सिकों के बीच अमीर गरीब का धर्म है. सीरिया से भागने वालों को यह मालूम ही नहीं कि उन्हें किसने सताया?

हमारे देश में जरा आसान है, हम आसानी से किसी एक को पकड़ कर कह सकते हैं कि हम तुमसे नफरत करते है। लेकिन यदि देखा जाये तो पूरा विश्व एक ही तरीके की समस्या से जूझ रहा है, और वह है नफरत।

रति सक्सेनाजब अमेरिका में एक भारतीय मार दिया जाता है तो वह हिन्दू समझ कर नहीं मारा जाता, बल्कि वह नफरत के कारण मार दिया जाता है।

इसी तरह से जब उत्तर प्रदेश में एक मुसलमान मारा जाता है, तो भी यहाँ ना गाय प्रधान है, ना धर्म, यहाँ प्रधान है नफरत।

नफरत को हवा देने में हाँ हां वाद काम करता है, जब किसी भी मानसिकता के साथ हां हां खड़ा हो जाये तो वह उस काल की संस्कृति बन जाती है, जो किसी और काल्पनिक संस्कृति की आड़ में खेल खेलती है। यह काल्पनिक संस्कृति देखने में मधुर गुड़ में पगी सी लगती है, लेकिन दुधारी तलवार सी घातक होती है, इसके चलते किसी को भी खत्म किया जाया जा सकता है। जैसे कि गोत्र प्यार, या अन्य धर्म से प्रेम या शादी, यह संस्कृति कब बनी, कैसे बनी, शायद किसी को मालूम नहीं, लेकिन उसका पालन होता है। खान पीन व्यवहार की बात ही छोड़ दें... हमारे यहाँ तो पूरी को रोटी से परहेज है।

अब मैं मुद्दे पर आती हूँ,,, पहले विश्व युद्ध के दौरान भी कुछ ऐसा हीं शुद्ध संस्कृतिवाद व्याप्त हुआ था। जाति धर्म , संस्कृति, रक्त और कला सबमें जो शुद्धता का दौर आया उसने युवा कलाकारों में जो विद्रोह भरा, उसका परिणाम हुआ डाडा वाद? हालांकि कि ये नाम यूँ ही किसी डिक्शनरी की मदद से चुना गया जैसा कि Richard Huelsenbeck (1892-1927), ने लिखा है।

डाडा का रूसी भाषा में अर्थ होता है हाँ हाँ, ( yes- yes) इसका सही उद्देश्य क्या रहा, या यह भी देखा सुनी में पसरा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन जो मूल भाव केन्द्र में था कि सौन्दर्य या अच्छाई के काल्पनिक केन्द्र में आधात किया जाये।

क्यों कि संस्कृति के नाम भी खूबसूरत वाक्य होते हैं, अच्छे लगने वाले जुमले होते हैं। जैसे कि हम अपने देश में देखते हैं, सत, चित्त, आनन्द, या फिर सत्यम शिवम सुन्दरम, या फिर आत्म परमात्म इत्यादि।

कुरूपता की कठोर ठोकर देखने वाले को सोचने के लिए प्रेरित कर सकती है, हो सकते हैं कि विचलित भी कर दे, और हो सकता है उत्तेजित भी कर दे।

उद्देश्य यह भी है कि जिसे हम कुरूप मान कर ढ़ांक रहे हैं, उसे खोलना जरूरी है, और फिर उसे सही तरीके से खत्म होने देना है, जो हम सुन्दर मान रहे हैं, वह उसकी तरह के भीतर क्या है, यह जानना है।

दरअसल इस तरह के विवादित काल में ना कुछ सुन्दर होता है, ना असुन्दर , हर किसी के पीछे वैचारिकता होती है। और वैचारिकता जगाना बहुत कठिन है।

अब मैं फिर सोच रही हूँ इस काल में कलाकार या कवि, कौन सा वाद लेकर आयें,जो एक तरह से उफान ला दे। क्यों कि यहाँ नफरत को ना नफरत से काटा जा सकता है, और ना ही प्रेम की गुझिया खिलाई जा सकती है,,,, आग से भागने वाले को समन्दर में डुबोने वाले इस काल में सिर्फ नफरत है, जो गहरे रग से लिखी जा रही है, इसलिए कला को कुछ और रास्ता निकालना होगा, लेकिन कौन सा, यह अभी कहा नहीं जा सकता।

या यह भी हो सकता है कि कला और साहित्य स्वयं अपना रास्ता निकाल लें,,, जैसा कि अक्सर होता है।