क्या हम नायक-विहीन दौर में जी रहे हैं ?
क्या हम नायक-विहीन दौर में जी रहे हैं ?
आज 18 जून को देश भर के पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ते जा रहे खतरों के खिलाफ 'काला दिवस' मनाने की घोषणा की है। एक तरफ मीडिया का ध्रुवीकरण होता जा रहा और दूसरी तरफ जनताओं की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों का दमन, यह लोकतंत्र के धंनता में बदलते जाने का सबूत है। किसी की वह बात याद आती है कि इस देश में आप तब तक सुरक्षित हैं जब तक कोई आपको मारना नहीं चाहता।
वंदना शुक्ला का यह लेख इस पूरी प्रकिया की गहन छानबीन करता है।
क्या हम नायक-विहीन दौर में जी रहे हैं?
11 जून को मीडिया के वरिष्ठ पत्रकारों के हाथों में सीमटा जाना और दूसरी तरफ जनताओं की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों का दमन, यह लोकतंत्र के धंनता में बदलते जाने का सबूत है। किसी की वह बात याद आती है कि इस देश में आप तब तक सुरक्षित हैं जब तक कोई आपको मारना नहीं चाहता।
हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक राष्ट्र का एक हिस्सा हैं, जहां यह भी जाता है, कि यहां हमको अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है! आप बीच चौरा पर खड़े होकर अपने पडौसी, ऑफिस, विरोधी दल, दुकानदार किसी को भी बेदखल कर सकते हैं! कल, जुबान, नारेबाजी किसी भी माध्यम का इस्तेमाल कर सकते हैं!
परिवार समाज से शिकायात है? न्यायालय उपलब्ध है! व्यवस्था से कुछ शिकवां? चुनाव प्राणाली है, पिछले नेता हटाओ, नया नेता चुन लो!
तत्कालीन सरकार को प्रति धकेल ‘नाई’ सरकार को लगाम सौंप दो! यह एक औसत सेमिनार की भाँति है जिसमें कुछ सवाल दिये जाते हैं।


