शेष नारायण सिंह

सुकमा के जंगलों में काँग्रेसी नेताओं की हत्या के मामले में देश की राजनीति में तरह तरह के सवाल उठना शुरू हो गये हैं। केन्द्र सरकार के एक खेमे में तो इस हत्याकाण्ड को इस बात का सबसे बड़ा बहाना माना जा रहा है कि अब मौक़ा है कि माओवादियों को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाये। माओवादी इलाकों में सरकारी दमनतन्त्र के ज़रिये कब्जा करने वालों को इस बात की परवाह नहीं है कि माओवादियों का सफाया करने के चक्कर में पूरे इलाके में रहने वाले आदिवासियों का सर्वनाश हो जायेगा। लगता है कि सरकारी दमनतन्त्र को इस्तेमाल करने वालों को इस बात का भी अंदाज़ नहीं है कि इसी नीति का पालन करके सलवा जुडूम ने सब कुछ बर्बाद कर दिया था। जल जंगल और ज़मीन के लिये आदिवासियों की जो लड़ाई शुरू हुयी थी, उसको माओवादी विचारधारा वालों ने नेतृत्व प्रदान किया और आज वही आदिवासी उन योजनाओं को भी एक शिकंजा मानते हैं जो उनके कल्याण के लिये सरकार की तरफ से चलाई जाती हैं। छत्तीसगढ़, बिहार और उड़ीसा में ऐसी सरकारें हैं जो किसी भी वामपन्थी आन्दोलन को कम्युनिस्ट कहकर उन पर हमला बोलने के लिये आमादा रहती हैं। दरअसल भाजपा या उसकी विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले नेता और उनकी पार्टियाँ उस तैयारी में जुटी हुयी हैं जिस तैयारी में 1933 में जर्मनी की सत्ताधारी पार्टी जुट गयी थी। उस वक़्त की सरकार ने हर उस व्यक्ति को जो उनसे अलग राय रखता था, कम्युनिस्ट नाम दे दिया था और उसे मार डाला था। दिल्ली के सत्ता के गलियारों में मौजूद वे नेता भी उसी मानसिक सोच के हैं जो सरकारी सत्ता का इस्तेमाल करके विरोधी को तबाह कर देने की बात के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकते। केन्द्र सरकार ने यह तय किया था कि माओवादी आतंक से प्रभावित इलाकों में आदिवासियों के विकास को मुख्य एजेण्डा में लाया जायेगा। सोनिया गाँधी के दो सिपहसालार इस काम पर लगा भी दिये गये थे और काम ढर्रे पर चल भी रहा था। जयराम रमेश को ग्रामीण विकास और किशोर चन्द्र देव को आदिवासी कल्याण का मन्त्रिमण्डल देकर यह मान लिया गया था कि सब ठीक हो जायेगा लेकिन जब 26 मई को रविवार होने के बावजूद जयराम रमेश ने अपने दफ्तर में कुछ पत्रकारों को बुलवाकर बात की तो साफ़ लग रहा था कि इस आदमी के हाथ के तोते उड़ गये हों, जयराम रमेश की बात से उस मजबूर आदमी की आवाज़ निकल रही थी जिसका घर अभी-अभी आग के हवाले कर दिया गया हो। जब उनसे पूछा गया कि बातचीत का रास्ता क्या अभी भी खुला है तो उन्होंने साफ़ कहा कि हालाँकि बातचीत की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता लेकिन अभी तो बातचीत का माहौल नहीं है। उन्होंने इस बात पर ताज्जुब जताया कि नन्द कुमार पटेल को क्यों मार डाला गया जबकि उन्होंने हमेशा आदिवासियों के दमन के खिलाफ आवाज़ उठायी थी। इसी तरह का पछतावा आदिवासी कल्याण के मन्त्री किशोर चन्द्र देव की आवाज़ में भी था जब वे किसी टी वी चैनल से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम को बढ़ावा देना बिलकुल गलत नीति थी। उन्होंने कहा कि इस नीति के चलते आदिवासी समाज में जो दरारें पड़ी हैं उनको ठीक कर पाना बहुत मुश्किल होगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि काँग्रेसी नेताओं की परिवर्तन यात्रा पर हुये हमले में कुछ नेताओं और कॉरपोरेट घरानों की साज़िश भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम क्या था। इस योजना में कुछ आदिवासियों को उनके घरों से निकाल कर रिफ्यूजी कैम्प में रख दिया गया। बाकी लोगों को माओवादियों ने अपने साथ ले लिया उसके बाद आदिवासी नौजवानों को अपने ही भाई बन्दों के खिलाफ इस्तेमाल करके हत्याएं की गयीं, इस से बुरा क्या हो सकता था। उन्होंने कहा कि माओवादियों को कुछ नेता अपने स्वार्थ के लिये इस्तेमाल करते हैं। इस बात की भी जाँच की जानी चाहिये कि आतंकवादियों और कॉरपोरे