गुलामी से मुक्ति की ओर एक कदम
१. आदिवासी कौन हैं?
जो जंगलों में रहते हैं
२. वो जीने के लिए क्या करते हैं?
खेती करते हैं। अपने पूर्वजों की जमीन पर फल सब्जियां और जंगली औषधियां उगाते हैं। खानाबदोश जीवन बिताते हैं या तो जंगल की वनस्पति से अपना पेट भरते हैं।
३. आदिवासियों के लिए स्टेट मशीनरी किस तरह काम करती है?
स्टेट मशीनरी सार्वजनिक संपदा और संपत्ति को सरकारी सम्पत्ति घोषित कर उसे निजी कंपनियों के मालिकों को बेचने की तरकीबें ईजाद करती है।
४. तो क्या आदिवासियों के खिलाफ स्टेट मशीनरी काम करती है?
बिलकुल। ताकि वनों पर आदिवासियों का कब्ज़ा खत्म किया जा सके और उसे स्टेट अपने हाथों में लेकर राज्य और सत्ता के मुनाफे के लिए उपयोग कर सके।
५. मगर स्टेट ऐसा क्यों करना चाहता है?
वो इसलिए कि सरकार कारपोरेट के पैसे से अपने हितों को साधने में लगी हुई है।
६. स्टेट के हित क्या हैं?
दरअसल स्टेट यानी राज्य अपने अधिकार कानून और नीतियों के बल पर पूरे भारत को सरकार का गुलाम बनाना चाहती है।
७. गुलाम बनाने से क्या नुकसान होंगे आदिवासियों को?
सरकार नदियाँ बेचना चाहती है ताकि उसका पानी मिनिरल वाटर (बोतलों में बंद पानी) के रूप में बेचने के लिए कारपोरेट को सौंप सके। ताकि कम्पनियां इस नेचुरल रिसोर्सेज को बाज़ार में बेच सकें। ताकि बिना कुछ लगाए भी कम्पनियां अकूत धन कमा सकें। निजी कम्पनियां और राज्य मिलकर पहाड़ का सौदा करना चाहते हैं ताकि बड़े कारोबारी इससे अपनी मनचाही मुरादें और सपने पूरे कर सकें। पहाड़ों की संपदा नष्ट करके वहां होटल रेस्टोरेंट खोल सकें। पहाड़ को कृत्रिम तरीके से पर्यटन क्षेत्र बनाया जा सके। जंगलों की कटान करके जंगल की वनस्पतियों से चीड़, देवदार, चंदन, आदि को बेचकर मुनाफ़ा कमाया जा सके।
८. आदिवासी प्राकृतिक सम्पदा को बेचने के खिलाफ क्यों हैं?
आदिवासी इस संपदा को अपने पूर्वजो की और अपने पवित्र देवताओं की भेंट मानते हैं अगर इस धरती से ये संपदा नष्ट की गई तो प्रकृति और जीव के बीच पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाएगा। भारी तबाही आएगी। और सरकार चाहकर भी इस प्राक्रतिक आपदा से इंसान को बचा न पाएगी। वो अपने भाषणों से ऎसी आपदा के लिए राह्त्कोश बनाने का दावा करेगी। मुआवजे की रकम तय करेगी मगर इससे असली नुक्सान की भरपाई कभी नहीं की जा सकती। आदिवासी इन कारणों को जानते हैं इसलिए वे इसे बेचने के पक्ष में कतई नहीं हैं।
९. आदिवासियों के पास क्या है जिसे आदिवासियों से छीनकर राज्य दुनिया का सबसे अमीर मुल्क बनने का सपना देख रहा है?
आदिवासियों के पास कोयला है, लोहा है, अभ्रक है, नदियाँ हैं, झरने हैं, पहाड़ हैं, बहुमूल्य वनस्पतियाँ हैं, नेचुरल रिसोर्सेज़ का भरा पूरा खजाना है। जिससे लाखों बरसों तक इंसान अपने जीने की जरूरतें और प्राकृतिक संतुलन बनाए रख सकता है। जबकि सरकार हर चीज को राज्य के अधीन लेना चाहती है। ताकि उसका इस्तेमाल करने की आज़ादी वह बड़े साहूकारों को दे सके।
१०. ये बड़े साहूकार किसलिए इन प्राकृतिक चीजों को हथियाने की फिराक में हैं?
ताकि इस प्राकृतिक संपदा से भौतिक संपदा को बढ़ावा मिल सके। उन्हें मनमुआफिक मूल्य पर बेचा जा सके। यह नेचुरल संपदा ऐसी छिजों का संग्रहण है जिससे बेशुमार दौलत पैदा की जा सकती है।
११. राज्य जंगलों में सडकें, बिजली, ईंट और सीमेंट के मकान, स्कूल, थाना, क्यों बनाना चाहती है। क्या आदिवासियों ने कभी इन चीजों की मांग सरकार से की है ?
ताकि बड़े ठेकेदारों को जो भूमाफिया हैं, जो अपराधी हैं, जो आदिवासी इलाकों को उजाड़कर जंगल को राज्य के अधीन इस तरह नंगा खड़ा करना चाहते हैं जिससे हर आदिवासी सरकार के आगे हाथ फैलाकर अप्पने जरूरत की चीजें मांगे। उसे जंगल से मुफ्त में मिलने वाली हर सुविधा पर राज्य रोक लगाना चाहता है। राज्य चाहता है कि बिजली, पानी, सड़क, और स्कूल, आवास का टैक्स आदिवासी देने को मजबूर हों। वे एक ही व्यवस्था में बिना राज्य की मदद के कैसे स्वतंत्र जिन्दगी जी सकते हैं। यह तो राज्य की संरचना और कल्पना के बाहर है।
१२. राज्य को हासिल क्या होगा अगर आदिवासी उनके तरीके से जीने लगें?
दरअसल राज्य आदिवासियों को अपना गुलाम बनाकर उनसे जीने की आज़ादी छीन लेना चाहता है। राज्य उन्हें कोयले की खदानों और अन्य माध्यमों के लिए मजदूर बनाकर बंधुआ मजूरी कराना चाहता है। ताकि बड़े कारोबारियों को ज्यादा से ज्यादा सहूलियतें और मुनाफा दिया जा सके।
१३. राज्य को इससे क्या फायदा होगा?
राज्य आदिवासियों के लिए नयी नयी योजनायें, आयोग, और राजकीय ढाँचे का अनुशासन जबरिया लादना चाहता है। जिससे खुले और मनमाफिक जिन्दगी बसर करने वाले आदिवासी राज्य के तौर तरीके सीख सकें और उसके अधीन या आदेश पर राज्य के गुलामी और हुकूमत वाले ढाँचे को मजबूत करने में अपना जीवन कुर्बान कर सकें।
१४. राज्य हर नेचुरल रिसोर्सेज़ को आदिवासियों के हाथ से लेकर क्या मुल्क को तरक्की के रास्ते पर ले जा सकेगा?
नहीं हरगिज़ ऐसा नहीं है। मुल्क को तरक्की इस कीमत पर नहीं चाहिए जिसमें इंसान राज्य का गुलाम बनकर जिए। इंसान का अपना एक स्वतंत्र जीवन है उस जीवन की अपनी सृजनात्मकता और ताकत है जिससे मुल्क में समाज के भीतर के अन्तर्विरोध और असमानता को खत्म किया जा सकता है।
१५. असमानता या गैरबराबरी कैसे पैदा हुई?
जब- जब राज्य ने किसी एक तबके को जरूरत से ज्यादा सहूलियतें दीं और दूसरे तबके को कमजोर करने के लिए बुनियादी व जरूरी चीजें लेने के लिए तमाम तरह की पाबंदियां और शर्तें लागू कीं तब से असमानता बढती चली गई। राज्य अपने आप में एक क्रूर संस्था है।
१६ राज्य किस तरह से आम नागरिकों आदिवासियों और ताकतवर कारोबारी तबके तनावपूर्ण सम्बन्ध कायम रखने में अनुशासन का सहारा लेती है? गैरबराबरी को बनाए रखने में सहयोग करती है?
इसे ऐसे समझना होगा। आपने पहाड़ों के स्रोत यानी पानी के सोते फूटते देखे होंगे। राज्य ने इन स्रोतों की जगह पानी की पाईपलाइन बिछा दी है, जिससे मुफ्त में मिलने वाले जल को राज्य अपने कब्जे में ले सके। यहाँ तक तो ठीक था। मगर इसमें भी हद ये है कि इसी स्रोत को राज्य ने बड़ी कंपनियों को मिनिरल वाटर बनाने के लिए बेच दिया। पहाड़ों पर नेचुरल पानी की धाराएं न फूट सकें इसके लिए जंगलों में आग लगवाने के लिए गाँव के गरीब लोगों का उपयोग राज्य करता है। ताकि अधिक से अधिक संख्या में जंगल की कीमती वनस्पति जलकर खत्म हो सके। और पहाड़ों से पानी की धारा का फूटना बंद हो सके। जब जल की मात्रा में कमी हुई तब राज्य ने जल संरक्षण के नाम पर छोटे-छोटे स्रोत सरकारी संरक्षण में खुलवाये। जहां बारिश का पानी इकट्ठा हो सके मगर वनस्पतियों के अत्यधिक मात्रा में नुक्सान की वजह से इन स्रोतों में भी जल का प्रबंध नहीं हो सका। जंगलों से जानवर भागकर आस-पास के इलाकों में घुसने लगे तब सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए वन-विभाग के कर्मचारियों का साथ लिया और उन्हें एक अलग जगह पर रहने के लिए असुविधाजनक बाड़े खोले। जहां हर जानवर के लिहाज से जगह न तो सुरक्षित और वनस्पतियों के लिहाज से पूरी तरह ठीक थी, न ही उनके संरक्षण के लिए विशेष प्रबंध किये गये।
१७. मतलब आप अजायबघर की बात कर रहे हैं?
जी हाँ, वही अजायबघर जहां पशु-पक्षियों की प्रजातियों को बेहद गैरजिम्मेदारी के साथ केवल ज़िंदा रखा जाता है। ताकि पर्यटक आयें और इन्हें देखकर आनंदित हो सकें। इसमें भी पशु-संरक्षण और वन्य चारागाह के लिए राज्य धन की व्यवस्था करने की नीतियाँ बनाता है। ताकि इस धन से संरक्षण में लगे अधिकारियों समेत हिफाजत देने वाली कमिटी को इस धन से सुरक्षा मिल सके। गनीमत अभी इतनी ही है कि आदिवासियों की प्रजाति इस बाड़े में नहीं रखी गई है। हो सकता है भविष्य में शेष बची हुई जनजातियों को इसी तरह से पर्यटकों को खुश करने के लिए राज्य के दड़बों में ठूँसकर रखा जाय। हालांकि आदिवासियों को एक क्षेत्र विशेष में अनुबंधित तो कर ही दिया गया है।
१८. आदिवासी किसलिए राज्य के खिलाफ लड़ रहे हैं ?
ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण है दरअसल राज्य ने अपनी जरूरतों के लिए इन आदिवासी इलाकों में सेना तैनात की है आदिवासी इलाकों की सीमा क्षेत्रों के भीतर पुलिस बल को लगाया गया है। ताकि राज्य जब भी कोई प्राकृतिक संपदा किसी कारोबारी को बेचे तो उस इलाके के लोग हंगामा न कर सकें। और निश्चित दायरे से बाहर न आ सकें। अगर कोई आदिवासी इस पुलिस बल के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए पुलिस के जबरिया घुसपैठ के बावजूद दायरे से बाहर आना चाहता है तो उसे नक्सली या माओवादी कहकर पुलिस बल उसकी हत्या कर देता है। इन आदिवासियों की महिलायें पुलिस बल और सेना के जवानों का शिकार होती हैं। जिसे सोशल मीडिया अक्सर सामने लाता रहा है।
१९. तो क्या हमें इन आदिवासियों के लिए कुछ करना नहीं चाहिए?
हाँ, बिलकुल करना चाहिए। आप जो कुछ कर सकते हैं वह अवश्य करिये। आप उनकी मदद कर सकते हैं। उनकी जिन्दगी बचा सकते हैं। उन्हें ठीक तरीके से जीने के लिए राज्य के दांचे में बदलाव की बात कर सकते हैं। राज्य को अपनी सलाह दे सकते हैं। आखिर नेचुरल रिसोर्सेज़ और आदिवासियों को बचाकर ही हम बेहतर इंसान होने का सबूत तो दे ही सकते हैं। आदिवासियों की जान इस वक्त खतरे में है उसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
अनिल पुष्कर
अनिल पुष्कर कवीन्द्र, प्रधान संपादक अरगला (इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)