जहां लहू का सुराग़ और असली क़ातिलों के निशान हैंहमें अपनी ताक़त संगठित कर एक हाथ से निरंकुश पुरुष सत्ता की गर्दन मरोड़नी होगी तो दूसरे हाथ से इस मौजूदा व्यवस्था की, जो स्त्रियों की दोयम दर्जे की स्थिति को क़ायम रखती है!

साथियो,

28 अगस्त को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बीटेक तृतीय वर्ष की छात्रा को बैंक रोड पर सरेआम जला देने की नृशंस कोशिश की गई। इस घटना को जिसने भी जाना, सुना और जिसमें ज़रा भी मानवीय संवेदना रही होगी, उसका कलेजा एक क्षण के लिए पथरा गया होगा व दिमाग़ सुन्न पड़ गया होगा और बेहिसाब ग़ुस्सा सीने में उबल रहा होगा। अभी कुछ समय पहले ऐसी ही एक घटना जेएनयू परिसर (जहाँ का माहौल अन्य कैम्पसों की तुलना में अधिक लोकतान्त्रिक रहा है) में घटित हुई थी।

ये घटनाएं बताती हैं कि पुरूष वर्चस्ववादी कातिलों के ख़ूनी पंजे हर जगह मौजूद हैं और विश्वविद्यालय, कॉलेजों के परिसर, महिला छात्रावासों के गेट तो जैसे लम्पटों के अड्डों में तब्दील हो गये हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर व इसके महिला छात्रावास के सामने लम्पटों की भीड़ सुबह से देर रात तक बड़ी आसानी से देखी जा सकती है।

निश्चित तौर पर इस घटना के अपराधी को सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए और विश्वविद्यालय कैम्पस व महिला छात्रावास के सामने अधिक संख्या में व महिला सुरक्षा बल तैनात करने की मांग विश्वविद्यालय व जि़ला प्रशासन के समक्ष रखनी चाहिए।

लेकिन, इस तरह की घटनाएं इन कानूनी उपचारों से नहीं रोकी जा सकती हैं। इसलिए हमें अपनी उंगली वहां रखनी चाहिए, जहां लहू का सुराग़ है और जहां असली क़ातिलों के निशान हैं। क्योंकि इस तरह की घटना पुरानी भी नहीं पड़ती, हमारा ग़ुस्सा शान्त भी नहीं हो पाता कि दूसरी घटना सामने आ जाती है। हमारा सारा ग़ुस्सा व हमारी सारी गतिविधियां विरोध प्रदर्शन व अपराधी को सज़ा दिलाने के तात्कालिक कार्यभारों में उलझकर रह जाती हैं। इसलिए ज़रूरत है कि अपने ग़ुस्से को सही दिशा दी जाय और अपनी ऊर्जा को उचित स्थान पर लगाया जाय।

तात्कालिकता के प्रवाह में हो सकता है कि हमारी आगे की बातें कम प्रासंगिक लगें; लेकिन हम इस बात पर बहुत दृढ़ हैं कि बिना लूट व अन्याय पर टिके इस राजनीतिक­आर्थिक­सामाजिक ढांचे को बदले स्त्रियों के हर तरह के उत्पीड़न को पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता। क्योंकि स्त्रियों की सदियों से चली आ रही दोयम दर्जे की स्थिति को यह व्यवस्था न केवल क़ायम रखती है, बल्कि लगातार स्त्रियों की ग़ुलामी व शोषण के नए­नए उपकरण रचती रहती है। भूमण्डलीकरण के दौर में उदारीकरण­निजीकरण की नीतियों को अपनाने के बाद सारी दुनिया मन्दी, बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। हमारा देश भी आर्थिक संकट के भंवर में चक्कर खा रहा है। आर्थिक संकट और निरंकुशता के बीच समानुपातिक सम्बन्ध होता है। जैसे­जैसे आर्थिक संकट बढ़ता है निरंकुशता, धार्मिक कट्टरपंथ, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और स्त्रियों का उत्पीड़न भी बढ़ता जाता है। हमारे देश की जनता भी बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भुखमरी से त्रस्त है। चुनावी पार्टियां इन समस्याओं का समाधान करने में पूरी तरह विफल रही हैं और उनका मकसद भी जनता की तकलीफ़ों को दूर करना नहीं है। इसी वजह से ये पार्टियां जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाकर जाति­धर्म, मन्दिर­मस्जि़द, हिन्दू­मुस्लिम, आरक्षण आदि के झगड़ों में उलझा देती हैं। जनता को अन्धविश्वास, अतार्किकता, रीति­रिवाज़ आदि में फंसाकर रखने वाले बाबाओं, मौलवियों की बाढ़ आ गई है। स्त्रियों के उत्पीड़न के किसी भी घटना के सामने आते ही नेताओं, प्रशासकों, अफसरों, बाबाओं, मौलवियों, कट्टरपंथी हिन्दू व मुस्लिम संगठनों द्वारा स्त्रियों को ही दोषी ठहराने व इसी बहाने स्त्रियों को प्राप्त थोडी­बहुत आज़ादी को भी छीनकर मध्ययुगीन रीति­रिवाज़ों व परम्पराओं की बेडि़यों में जकड़ देने के घृणित प्रयास को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।

इसी तरह कला, साहित्य, संगीत व मनोरंजन आदि के क्षेत्र में निरंकुशता को बढ़ावा दिया जा रहा है। टीवी चैनल, अख़बार, रेडियो, इण्टरनेट हर जगह अंधविश्वास, अश्लीलता, कामुकता, फूहड़ता अंधाधुन्ध परोसी जा रही है। उपभोक्ता सामग्री की बिक्री के लिए स्त्रियों को ही उपभोग की सामग्री बना दिया जाता है। स्त्रियों को ‘मज़े’ की चीज़ के रूप में हर रोज़ प्रोजेक्ट किया जा रहा है। सामान बेचने की गलाकाटू होड़ में सारे मानवीय मूल्यों व नैतिकता की हर क्षण धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ‘भोग’ की पाशविक मानसिकता बच्चों तक के ज़ेहन में बचपन से ही भरी जा रही है। इस निरंकुश माहौल में पहले से ही स्त्रियों को ‘कमज़ोर’ तथा ‘पैरों की जूती’ समझने वाले पुरूष के लिए किसी स्त्री की इच्छा, सहमति­असहमति का क्या मतलब हो सकता है। मुंबइया फिल्मों के गानों से भी इस प्रक्रिया को समझा जा सकता है। 1970 के दशक में जो पुरुष वर्चस्ववाद­ ‘तू मुझे न चाहे तो कोई बात नहीं, पर किसी ग़ैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी’ जैसे गानो में थोड़ी बहुत विनम्रता का लबादा ओढ़कर आता था। वह 2000 तक आते आते ‘तू हां कर या ना कर, तू है मेरी किरन’ जैसे गानों में अपनी नग्न निरंकुशता का डंका पीटने लगा और 2013 तक आते­आते हनी सिंह जैसे घृणित गायकों के ‘मै बलात्कारी हूं’ जैसे गानों में अपने बलात्कारी दरिन्दे पौरुष के रूप में सामने आता है। इलाहाबाद की इस घटना में भी आरोपी का पुलिस हिरासत में ऐसा ही घृणित बयान था कि ‘मै उसे चाहता हूं, अगर वो मेरी नहीं हो सकती तो मै उसे मार दूंगा।’

इसलिए साथियों अब उठना ही होगा। सड़कों पर उतरना ही होगा। एक हाथ से निरंकुश पुरुष सत्ता की गर्दन मरोड़नी होगी तो दूसरे हाथ से इस व्यवस्था की; जो स्त्रियों की दोयम दर्जे की स्थिति को बनाए रखती है और लगातार इसे खाद ­पानी देने का काम करती रहती है।
स्त्री मुक्ति लीग़
सम्पर्कः 8303889357, 8115491369