जाति माथे पर नहीं लिखी होती पर जब लिखी जाती है तो माथे पर ही लिखी जाती है।
जाति माथे पर नहीं लिखी होती पर जब लिखी जाती है तो माथे पर ही लिखी जाती है।
जाति माथे पर नहीं लिखी होती पर जब लिखी जाती है तो माथे पर ही लिखी जाती है। सदियों से लिखी है, पढ़ने वाले पढ़ते हैं और तय करते हैं कि नाक भौंह सिंकोड़ी जाएं या होठों पर मुस्कुराहट लाकर स्वागत किया जाए।
जाति कभी नहीं जाती ...मरने के बाद भी नहीं। छटपटाते हुए, सिर धुनते हुए भी सिर पर सवार हो लेती है, दो चार कदम आगे जो चलती है हमारे। बिटिया रानी के इस सवाल का जवाब नहीं है हमारे पास कि ये चमारिया क्या होता है, और जो भी होता है तो मुझे नहीं बनना ये चमारिया ... प्रगति और विज्ञान के सारे दावे छोटे पड़ जाते हैं इस छोटे से सवाल के सामने। हमारे पास उसे चमारिया बनने से रोकने का कोई उपाय नहीं आज भी । क्यों नहीं है ? जाति का बम हमारे सिर पर फटा है विचार के बचने की गुंजाइश ही कहां रही होगी .... !
सभ्यता के दावों को चुनौती देती, मानवता के जाति में सिमटते चले जाने की अन्तर्कथा है यह, आपको कविता लगे तो कविता समझिये भले .... ! कुछ कहेंगे आप इस पर ? क्या कहेंगे आप ?
" तुममें और ईश्वर मे एक समानता है, ना तुम कुछ कहते हो न वह ... ना तुम कुछ करते हो, न वह ... ! "
युद्ध अभी जारी है / कविता संग्रह/ अरविन्द भारती/ पहला पेपरबैक संस्करण 2017/ पृष्ठ 96/ मूल्य : 100.00 / आवरण चित्र : निशा कुलश्रेष्ठ/ बोधि प्रकाशन, जयपुर


