जीएसटी : एक क्रांति है या प्रतिक्रांति?
जीएसटी : एक क्रांति है या प्रतिक्रांति?
आशुतोष कुमार
वसेक यानी जीएसटी को सबसे बड़ा सुधार बताया जा रहा है। यह एक क्रांति है या प्रतिक्रांति?
आपमें से अधिकतर लोगों की तरह मैं भी अर्थशास्त्र में निल बटे सन्नाटा हूँ, लेकिन कुछ बुनियादी बातें आप भी समझते हैं और मैं भी।
कर दो तरह के होते हैं। सीधे और टेढ़े। सीधे कर आमदनी पर लगाए जाते हैं। जिसकी जितनी आमदनी, उतना कर। टेढ़े कर वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए जाते हैं। ये गरीब से गरीब और अमीर से अमीर आदमी पर बराबर लगते हैं। यानी रोटी और शिक्षा पर कर जिस दर से कलावती देवी देंगी, उसी दर से ही अनिल अंबानी देंगे।
गरीब जो कमाता है, वह लगभग समूचा रोटी और शिक्षा पर खर्च कर देता है। फिर भी कम पड़ जाता है तो कर्ज़ा लेता है। अमीर आदमी के लिए ये खर्चे हाथ के मैल सरीखे होते हैं।
भली सरकारों का काम है अमीरों की फालतू आमदनी का कुछ हिस्सा कर के बतौर वसूल कर के गरीबों के लिए रोटी पानी का इंतज़ाम करना। ऐसा करने से सबका भला होता है, क्योंकि गरीब आदमी ज़िंदा रहेगा तभी अमीर आदमी के व्यापार का विस्तार होगा। यह काम सीधे करों से होता है, इसलिए सीधे कर अच्छे माने जाते हैं।
भली सरकारें ज़्यादा से ज़्यादा सीधे करों से वसूलना चाहती हैं और कम से कम टेढ़े करों से।
वसेक एक टेढ़ा कर है।
कहने को यह एक देश एक कर के सिद्धांत पर आधारित है। लेकिन यह सिद्धांत हकीक़त में एक जुमला है। वसेक के तहत एक नहीं, कर की कुल पांच दरें हैं।
शून्य, पांच, बारह, अठारह और अट्ठाइस।
ऊपर से विशेष छूट, सेस,सरचार्ज वगैरह का भी चक्कर है, लेकिन इसे फिलहाल छोड़िए।
पहले यह देखिए कि दूसरे देशों की तुलना में हमारा जीएसटी कितना कम या ज़्यादा है।
कुछ देशों की अधिकतम दरें ये हैं।
चीन 17
यूनान 24
यूके 20
कनाडा 15
जापान 08
ऑस्ट्रेलिया 10
दक्षिण कोरिया 10
इंडोनेशिया 15
सिंगापुर 07
स्विट्ज़रलैंड 08
बांग्लादेश 15
श्रीलंका 15
पाकिस्तान 17
नेपाल 13
इसे झांकी समझिए। तफ़सील में जाएंगे तो पता चलेगा कि बुनियादी जरूरतों यानी रोटी पानी स्वास्थ्य शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हमारी तुलना में दीगर देशों में कर की दरें हैरतअंगेज़ तरीके से कम हैं।
लब्बोलुबाब ये कि टेढ़े करों के मामले में हम दुनिया में हम लगभग टॉप पर आ रहे हैं।
ये तो उपभोक्ता की बात हुई। व्यापारी भाइयों पर जीएसटी का क्या असर होगा।
नुक्कड़ का बनिया कुछ टैक्स चुराता होगा, लेकिन चीजें सस्ती मुहैया करता था। उधार भी चला लेता था।
अब जब ग्रेट इंडिया मॉल और नुक्कड़ के पंसारी के यहाँ एक ही भाव होगा तो मॉल से आपकी खरीदारी बढ़ जाएगी। बिना ब्रांड की चीजों की जगह आप भी ब्रांडेड खरीदेंगे। मॉल का व्यापार दस गुना बढ़ जाएगा। नुक्कड़ वाला अपनी दुकान बढ़ा कर घर जाएगा।
सरकार की वसूली बढ़ जाएगी, लेकिन वो बढ़त जाएगी आपकी ही जेब से। लौट कर कितनी आपके पास आएगी, यह तो वक़्त बताएगा। लेकिन नुक्कड़ वाला तो शहीद हो ही जाएगा।
आपको ये बातें गलत लग रही हों तो बता दीजिएगा।
मैंने तो पहले ही कह दिया था कि मैं अर्थशास्त्र में निल बटे सन्नाटा हूँ।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।


