जो गुणगान कर रहे हैं वो बदनाम भी कर रहे हैं ?
गुणगान और बदनामी एक साथ

विक्की कुमार

आज मैं पैसा निकालने बैंक गया। अपने खाते से नहीं, अपने किरायेदार आंटी के खाते से।

आंटी भी साथ आईं थीं क्योंकि उन्हें बैंक के रूल - रेगुलेशन की उतनी जानकारी नहीं थी। सो उनके साथ जाना पड़ा।

मैं जैसे ही बैंक परिसर में घुसा, अचंभित रह गया क्योंकि पूरे बैंक परिसर में मुश्किल से 20-25 लोग ही थे।

8 नवंबर के नोटबंदी के बाद ऐसे तो मैं कई बार बैंक जा चुका हूँ, लेकिन इतने कम लोग नोटबंदी के बाद आज मैंने पहली बार देखा।

देखकर अच्छा लगा। चलो अब धीरे - धीरे बैंक में पहले की तरह ही समान्य भीड़ नजर आने लगी है।

लेकिन यह सोच आश्चर्य में भी हूँ कि भले ही बैंक में भीड़ समान्य होने लगी है किंतु बाजार में रौनक अब भी समान्य नहीं हो पाई है।
सारे दुकानदार अब भी यही कह रहे हैं कि भाई बिक्री घट गई है। कपड़ा से लेकर मिठाई दुकान वाले तक सब यही कहते नजर आ रहे हैं।
आभूषण वाले तो मानो इक्का - दुक्का ग्राहक को छोड़ दें तो सारे सुबह में दुकान खोलते हैं और शाम में बंद करते हैं। वैसे भी आभूषण सेकेंडरी चीज है।

मतलब इस नोटबंदी में खाने से पैसा बचेगा तब न शौक पूरे किये जाएंगे।

आभूषण वाले दुकान में भीड़ न रहने का दूसरा कारण यह भी है कि खेतों में कटनी (धान की फसल) शुरू हो गई है।

खैर जो भी हो इस पर बात कभी और कर ली जाएगी।

अब बात करते हैं अहम मुद्दे की।

बैंक के लंच टाइम में परिसर में लगे कुर्सी पर मैंने आंटी को बैठाया और मैं भी दूसरी कुर्सी पर बैठा।

मेरे अगल- बगल दो लोग बैठे थे, जो मेरी तरह ही बैंक के लंच टाइम ख़त्म होने का इन्तजार कर रहे थे।

मैं भला इस लंच टाइम को शांति से कैसे गुजार सकता था? और वैसे भी मेरे अंदर की कुलबुलाहट मुझे शांत बैठने कहां देती है।
मैंने भी अपनी कुलबुलाहट को शांत करने के लिए बगल में बैठे व्यक्ति से बात करनी शुरू की।
मैंने कहा लगता है अब जा कर बैंक परिसर में शांति हुई है जब से नोटबंदी का फैसला आया है।

बगल में बैठे सज्जन ने भी हामी भर कर कहा हाँ भाई अब जाकर शांति हो गई है।

मैंने पुनः दूसरा सवाल उनपे दागा, कहा मोदी जी ने नोटबंदी का फैसला सही लिया है या गलत ?

उन्होंने फाटक से उत्तर दिया , भाई मोदी जी ने सही - सही फैसला लिया है। अब कलाधन वापस आ जाएगा।

मैंने भी उनसे कहा जी शायद ऐसा ही हो।

बात आगे बढ़ती कि तब तक बैंक का का लंच टाइम खत्म हो गया और वे अपने काम के लिए काउंटर के तरफ चल दिए।
मैं भी आंटी के साथ काउंटर की तरफ चल दिया और आंटी को पैसा निकासी फॉर्म के साथ काउंटर के लाइन में लगा दिया।
काउंटर पर दो -तीन ही महिलाएं थी और पुरुष करीब 20-25 थे।

तो काउंटर पर पहले दो-तीन पुरुष का काम पूरा किया जाता उसके बाद एक महिला का।

इत्तेफाक से मैं आंटी के साथ जिस काउंटर पर था उसी काउंटर पर मेरे बगल में बैठे वही सज्जन थे, जिनसे मैंने लंच टाइम में सवाल-जवाब किया था। काउंटर पर उनका नम्बर आंटी से पहले आ गया।

उन्होंने अपने निकासी फॉर्म को बैंक कर्मचारी को दिया।

बैंक कर्मचारी ने कुछ जाँच पड़ताल कर उनके निकासी फॉर्म को वापस उन्हें लौटा दिया, क्योंकि उनका खाता जनधन खाता था और आरबीआई के दिशा - निर्देश के अनुसार जनधन खाते से एक महीने में सिर्फ 10 हजार तक की निकासी की जा सकती है।

उन्होंने पुनः बैंक कर्मचारी से पूछा सर इस खाते से लास्ट निकासी कब की गई है ? यह तो बता दीजिए।
बैंक कर्मचारी ने कहा जनाब आप पूछ-ताछ काउंटर के पास पता कर लें।
वैसे बैंक परिसर में कही भी पूछ-ताछ काउंटर नजर नहीं आया।

उस व्यक्ति ने पुनः कहा, सर बहुत जरूरी काम से पैसों की सख्त जरूरत है। किंतु बैंक में उसकी किसी भी प्रकार की मदद नहीं हो सकी और वो बाहर निकलते वक़्त यही कहता निकाला, साला ई बैंक का रोज-रोज नियमें बदल रहा है।

अब भला इन्हें कौन बताये ये नियम बदलना इनके बस में नहीं है। यह रोज - रोज का बदलाव केंद्र सरकार के मंत्रालय के दिशा - निर्देश द्वारा किया जा रहा है।

वैसे मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि यह वही सज्जन थे, जिन्होंने बैंक के लंच टाइम में मोदी जी के इस योजना का गुणगान किया था और इसे सही ठहराया था।

वैसे वे तो खाली हाथ वापस लौट गए और मुझे भी खाली हाथ ही लौटना पड़ा क्योंकि आंटी का खाता भी जनधन का ही था और उनकी लास्ट निकासी के एक महीना नहीं पुरे हुए थे।

लेकिन एक बात मैं आपसे कहूं, मैं तब से लेकर अब तक यही सोच रहा हूँ कि क्या जो लोग गुणगान कर रहे हैं वो बदनाम भी कर रहे हैं ?