मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद क़स्बे में बस स्टैंड के पास भीड भरे स्थान पर रहवासी और व्यावसायिक क्षेत्र के एक मकान में अवैध रूप से रखे विस्फोटक जिलेटिन के भंडार में शनिवार विस्फोट हो गया। विस्फोट से 90 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हैं, जिनमें से कई की हालत गंभीर है,जिन्हें इंदौर, दाहोद आदि जगह भेजा गया।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रविवार को घटनास्थल का दौरा किया और सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि सरकार हाईकोर्ट के किसी जज से इसकी न्यायिक जाँच करवायेगी। दोषियों को दंडित किया जायेगा। मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों के इलाज का सारा खर्च सरकार करेगी और पीड़ित परिवारों के रोजगार पर भी सरकार ध्यान देगी।
✔️ 'व्यापमं' प्रदेश के मुख्यमंत्री जब ये घोषणायें कर रहे थे तो उनके पास खड़े उनके दल के लोग उनकी 'भामाशाही' घोषणाओं पर बार-बार तालियाँ बजा कर स्वागत कर रहे थे। सामने दुखी और पीड़ितों का विरोध करता हुजूम था।
✔️ इस 'झाबुआ विस्फोट' से सीधे प्रश्न उठते हैं। मघ्य प्रदेश कोई सीमावर्ती राज्य नहीं है जहाँ कोई आतंकवादी आ गया और मुठभेड़ हुई और मकान में रखे विस्फोटक सुलग उठे। ना ऐसी आतंकवादी घटना है जिसमें आतंकवादी बाजार/घर / ट्रेन/बस में बम प्लांट कर देते हैं और रिमोट से या आत्मघाती तरीके से विस्फोट कर देते हैं। ऐसा कुछ नहीं था।
यहां के जैन समुदाय का एक व्यापारी (आतंकवादी की कोई जाति या धर्म नही होता, ऐसा ही लिखते हैं ना ?) जो भाजपा के स्थानीय व्यापारिक प्रकोष्ठ का पदाधिकारी था (अपराधी किसी भी राजनैतिक दल का हो सकता है ?) 10 वर्षों से क़स्बे में एवं मध्य व्यावसायिक क्षेत्र में अवैध रूप से किराये के मकान में भारी मात्रा में रखे जिलेटिन डायनामाइट का भंडारण कर रहा था।
इतनें वर्षों तक पुलिस, प्रशासन सोया था जो वहाँ पर इतनी मात्रा में कुएँ/ खदानों में वैध/अवैध विस्फोट के लिये जिलेटिन का भंडारण हो रहा था ?
हाईकोर्ट जज द्वारा बरसों बाद लाखों करोड़ों रुपये बरबाद कर आई न्यायिक जाँच से क्या निष्कर्ष निकलेगा, जो आज सबको मालूम नहीं है? या पहले हुई जाँचों से अलग निष्कर्ष निकलेगा ? जाँच के अंत में यही लिखेंगे ना कि विस्फोटकों का भंडारण शहर से दूर सुरक्षित ढंग से होना चाहिये। क्या प्रशासन-पुलिस को यह पता नहीं था। प्रशासन पुलिस की अनुशंसा पर आगरा के संबंधित विभाग की अनुशंसा से निश्चित मात्रा में विस्फोटक रखने का लाइसेंस देता है जिसकी ख़रीदी/ उपयोग का ब्योरा रजिस्टर में रखना होता है, जिसकी प्रशासन को नियमित जाँच करना चाहिये।
जिलें में विस्फोटकों से खदानों, कुओं में वैध-अवैध तरीके से बरसों से विस्फोटकों का प्रयोग होता रहा, उस कथित भगोड़े व्यापारी का एक भाई पहले ऐसे एक विस्फोट में मारा जा चुका है, जिसे तब सिलेंडर से हुई मृत्यु बतलाया गया। कल ही उसके एक भाई के यहाँ भंडारित 100 जिलेटिन रॉड ज़ब्त हुई हैं।
✔️ सीधे प्रश्न और उत्तर उभरते हैं। क्यों नही पुलिस-प्रशासन के तत्कालीन और वर्तमान के उन सारे अफ़सरों पर, जिनकी विस्फोटकों के बारें में तनिक भी जवाबदारी थी या है- को चिन्हित कर -लापरवाही से हुई मौतों का जवाबदार ठहराना चाहिये।
झाबुआ विस्फोट दुर्घटना नहीं है, यह जानबूझ कर की गई या होने दी गई हत्याएँ हैं। ये आकस्मिक घटना नहीं है। चूक भी नहीं है। घोर अहंकार से उपजा प्रमाद है और बेशर्म लापरवाही है।
✔️ अगर वह व्यक्ति सिख होता तो तार खालिस्तान कमाडों फ़ोर्स या पंजाब के कट्टर आतंकवादियों से जुड जाते, मुसलमान होता तो मामला लश्कर ए तैयबा से आगे तालिबान और इस्लामिक स्टेट, सिरिया यमन तक जाता और सारे देश में टीवी पर बयानों-बहसों की बाढ़ आ जाती। मामला हिंदू राष्ट्र का है अत पहले ही दिन बिना किसी जाँच के अखबारों ने भी दबी ज़बान से लिख दिया कि पुलिस इस घटना का आतंकवादी कोण नहीं मानती।
राष्ट्रीय एजेंसी एनआईए भी पेटलावद पहुँच गई है, जो आतंकवादी कोण की भी निश्चित जाँच करेगी। यह क्षेत्र 'सिमी' संगठन की कर्मभूमि रहा है तो 'समझोता एक्सप्रेस, मालेगांव, मक्का मस्जिद, हैदराबाद, अजमेर दरगाह ब्लास्ट से जुड़े 'हिंदू राष्ट्रवादियों' के संबंध भी इसी क्षेत्र से हैं।

विस्फोटक धर्म निरपेक्ष होते हैं
इसके पहले भी मघ्यप्रदेश में सेंघवा में ओवरलोडेड बस -जिसमें निकास का एक ही दरवाज़ा था, में बसों की आपसी प्रतिद्वंदिता में आग लगाई गई। 15 जलकर मर गये। सरकार ने बसों में दो दरवाज़ों का नियम बनाया। पन्ना में अभी फिर बस जल गई 50 लोग जिंदा जल गये। इसकी जांच चल रही हैं। बसों में दो दरवाज़े नहीं लग सके। बस मालिक जब चाहें बसों का संचालन बंद कर सरकार को धमका सकते हैं। दो वर्ष पूर्व राऊ (इंदौर) में पटाखों के अवैध भंडारण से 10 से अधिक लोग जिंदा जल चुके हैं। मई १४ में 18 लोग अवैध पटाखों से नज़दीक के बडनगर में मर चुके हैं। समाचार पत्रों में आज सारे मघ्यप्रदेश के ऐसे अनेकों जिलों की रपट छपी हैं जहाँ पटाखों/ विस्फोटकों के अवैध भंडारण से कई मौतें हुई हैं।
मध्य प्रदेश में मंदिरों में भीड़ से उपजे हादसे भी अब सनसनी या संवेदना नहीं जगाते। नियमित होने वाली घटनाएँ हैं। धाराजी, उज्जैन, दतिया, सतना, चित्रकूट आदि स्थानों पर पिछले वर्षों मे प्रशासनिक लापरवाही/ निकम्मेपन से बार बार दुर्घटनाएँ हुई हैं, जिनमें बहुमूल्य जीवन और माल का नुक्सान हुआ है।
मुख्यमंत्री भामाशाह बन कर अपनी सरकार और अधिकारियों की नाकामियों को छुपाकर जनता का पैसा ऐसी दुर्घटनाओं के मुआवजें में बांटते हैं जिसकी पूरी जवाबदारी उनकी है।
जसबीर चावला
जसबीर चावला, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।