कांग्रेस की नेहरूवादी परम्परा को आगे बढ़ा रही हैं सोनिया
शेष नारायण सिंह
विन्ध्य के उस पार, अपने पुराने वायदे को कांग्रेस ने पूरा कर दिया है। तेलंगाना का अलग राज्य बनाने के लिये राजनीतिक फैसला लेकर प्रशासनिक काम आगे बढ़ा दिया है। अब यह सरकार और संसद की ज़िम्मेदारी है कि इस राजनीतिक फैसले को अमली जामा पहनाये। आंध्र प्रदेश के कुछ नेताओं और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा इस फैसले का कहीं कोई विरोध नहीं है। विरोध के लिये विरोध करने वाली राजनीतिक जमात, भाजपा, ने तो पहले ही अपने आप को तेलंगाना का पक्षधर घोषित कर रखा था। उनको उम्मीद थी कि कांग्रेस इस फैसले को टालती रहेगी और भाजपा के नेता कांग्रेस को ढुलमुल काम करने वाली पार्टी के रूप में पेश करते रहेंगे लेकिन सब कुछ उलट गया। कांग्रेस ने तेलंगाना के पक्ष में वोट डाल दिया। अब भाजपा के सामने विरोध का मौक़ा नहीं है। उसे भी कम से कम एक मुद्दे पर कांग्रेस के साथ जाना पड़ रहा है।

तेलंगाना के इलाके में खुशी की लहर है। यह उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सपनों की ताबीर है। तटीय आन्ध्र और रायल सीमा के नेता लोग परेशान हैं। उनकी राजनीतिक ब्लैकमेल की ताक़त कम हो रही है। अलग तेलंगाना राज्य की अवधारणा 1953 में ही कर ली गयी थी और भाषा के आधार पर जब राज्यों का गठन हुआ तब 1956 में ही तेलंगाना को अलग राज्य बन जाना चाहिए था लेकिन तटीय आन्ध्र और रायल सीमा में भी वही भाषा बोली जाती थी जो तेलंगाना की है, इसलिये भाषाई आधार पर राज्य को अलग नहीं किया जा सका। हाँ एक जेंटिलमैन एग्रीमेंट, तेलंगाना के लोगों के हाथ आया जो बार-बार तोड़ा गया। तेलंगाना के लिये 1969 और 1972 में बहुत ही हिंसक आन्दोलन भी हुआ। इस इलाके के लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गयी कि उनको बेवकूफ बनाया जाता रहेगा लेकिन राज्य का गठन कभी नहीं होगा।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले में ऐसी बातें हैं जिस से तेलंगाना और बाकी आंध्र प्रदेश के लोगों के साथ न्याय होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि तेलंगाना को भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के अन्दर रखने के प्रस्ताव का जवाहरलाल नेहरू ने उस समय भी विरोध किया था जब 1956 में आंध्र प्रदेश के ताक़तवर राजनेताओं ने हैदराबाद समेत बाकी तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में रखने का फैसला करवा लिया था। उन्होंने कहा था कि यह शादी बेमेल थी और इसमें तलाक की गुंजाइश थी। आज वह तलाक़ हो गया है केवल कागज़ी काम होना बाकी है। जवाहर लाल नेहरू की इच्छा को उनकी पार्टी ने पूरा कर दिया है।

इस बात में दो राय नहीं है कि मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस की नेहरूवादी परम्परा को आगे बढ़ा रही हैं। निष्पक्ष और पारदर्शी राजनीतिक फैसलों की परम्परा कायम कर रही हैं। अभी दस साल तक बाकी आंध्र प्रदेश की राजधानी भी हैदराबाद में ही रहेगी। प्रस्ताव में लिखा है कि आंध्र प्रदेश को अपनी नई राजधानी बनाने के काम में केन्द्र से सहायता मिलेगी। कानून व्यवस्था की हालत बिगड़ न जाये इसकी जिम्मेदारी भी फिलहाल केन्द्र सरकार की होगी। इस फैसले से कांग्रेस ने हैदराबाद की स्थिति के बारे में भी स्थायी हल तलाश लिया है। हैदराबाद से राजधानी हटाने के लिये आंध्र प्रदेश को जो रकम मिलेगी, उससे एक बहुत ही आधुनिक राजधानी का विकास सम्भव है। पोलावरम सिंचाई परियोजना को केंद्रीय प्रोजेक्ट बनाकर कांग्रेस ने दूरदर्शिता का परिचय दिया है। अभी प्रस्ताव में दस जिलों वाले तेलंगाना की बात की गयी है। ज़ाहिर है कि कुरनूल और अनंत पुर जिलों के बारे में अभी संसद या सरकारी विचार विमर्श में विधिवत चर्चा की जायेगी।

तेलंगाना के गठन के कांग्रेस और संप्रग के राजनीतिक फैसले के बाद टी वी चैनलों ने गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड आदि राज्यों के गठन की माँग को सूचना के विमर्श का मुख्य विषय बना दिया है। इस से भाजपा के नेता बहुत नाराज़ हैं। उनका आरोप है कि जिन न्यूज़ चैनलों पर लगातार मोदीपुराण चलता रहता है, वहाँ तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों की चर्चा को लाकर न्यूज़ चैनल और कांग्रेस ने भाजपा का बहुत नुक्सान किया है। टी वी चैनलों की कृपा से चर्चा में बने रहने की भाजपा की रणनीति को इस नए राजनीतिक विकासक्रम से भारी घाटा हुआ है। इस तरह से साफ़ समझ में आ रहा है कि कांग्रेस ने यह फैसला लेकर भाजपा को रक्षात्मक खेल के लिये मजबूर कर दिया है। जानकार बताते हैं कि इस फैसले को एक निश्चित दिशा देने के लिये कांग्रेस के आंध्र प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ज़िम्मेदार हैं। आम तौर पर भाजपा की राजनीति की हवा निकालने के लिये विख्यात दिग्विजय सिंह ने इस बार राजनीतिक शतरंज की बिसात पर ऐसी चाल चली है कि भाजपा को बिना शह का मौक़ा दिये मात की तरफ बढ़ना पड़ सकता है।