देशप्रेम के मायने और भगत सिंह- आजादी ही आजादी......
देशप्रेम के मायने और भगत सिंह- आजादी ही आजादी......
अगले आम चुनाव होंगे और मोदी सरकार चली भी जाएगी
भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव के शहादत दिवस के मौके पर इप्टा इंदौर के आयोजन
आजादी ही आजादी......बस आजादी ही आजादी
सारिका श्रीवास्तव
इंदौर। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का राष्ट्रीय सम्मेलन 2-4 अक्टूबर 2016 में इंदौर में होना तय हुआ है। उसी तारतम्य में से ये भी तय किया गया कि इप्टा द्वारा इंदौर में प्रतिमाह विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा। 17 मार्च 2016 को भगत सिंह की शहादत पर परिचर्चा का आयोजन इस कड़ी का यह पहला कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता थे जेएनयू के प्रो. चमनलाल जिन्हें उनके भगतसिंह पर किये गए शोधपूर्ण लेखन और क्रांतिकारी पंजाबी कवि पाश की कविताओं के अनुवाद के लिए देश-विदेश में जाना जाता है।
इस परिचर्चा पर अगले दिन इंदौर के एक अखबार में टिप्पणी प्रकाशित हुई कि ‘तर्क थे और सवाल थे। सवालों के जवाब थे। जवाबों के बाद फिर सवाल थे और फिर जवाब थे। बहुत ही खुली चर्चा थी। इतनी खुली चर्चा कि आजकल के माहौल में डर लगता है कि कहीं कोई देशद्रोही ना बोल दे।’
यह दृश्य था 17 मार्च 2016, गुरुवार शाम 5 बजे से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शहीद भवन में शहर के विभिन्न क्षेत्रों और संगठनों के लोगों के साथ ‘‘देशप्रेम के मायने और भगत सिंह’’ विषय पर रखी परिचर्चा का। उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए प्रोफेसर चमनलाल ने कहा कि भगत सिंह ने देश को जगाने के लिए शहादत दी थी। भगत सिंह ने कहा था कि मनुष्य पर हो रहे शोषण के तंत्र को नष्ट करना ही ‘‘इंकलाब’’ है। भगत सिंह के लिए देश का अर्थ देश के लोग और उनकी जरूरतों के साथ जुड़ा हुआ था। शुरुआती दौर में उन्होंने ‘‘वंदे मातरम’’ का नारा लगाया लेकिन समाजवाद को जानने-समझने के बाद उन्होंने ‘‘इंकलाब जिंदाबाद’’ और ‘‘साम्राज्यवाद हो बरबाद’’ का नारा ही लगाया।
प्रो. चमनलाल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आाज जिस तरह देशप्रेम और देशभक्ति को परिभाषित किया जा रहा है उसका सही मायनों में देश से कोई सम्बन्ध ही नहीं है। वह केवल सत्ता की विचारधारा को प्रतिबिंबित करता है। उनकी इस बात पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ‘‘भारत माता की जय’’ कहना देशभक्ति का प्रमाण नहीं है। 15 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू द्वारा लाल किले पर दिए गए भाषण से लेकर 2014 तक मोदी के पहले तक, किसी भी प्रधानमंत्री ने लाल किले पर दिए गए अपने भाषण में ‘‘भारत माता की जय’’ नहीं बोला, यहां तक कि अटल बिहारीजी ने भी नहीं बोला। हाँ सभी प्रधानमंत्रियों ने ‘‘जय हिंद’’ जरूर कहा। मोदी ने पहली बार ‘‘भारत माता की जय’’ कहा। इसका मतलब क्या यह लगाया जाए कि मोदी के पहले के सारे प्रधानमंत्री ‘‘देशद्रोही’’ थे?
प्रोफेसर चमनलाल ने बताया कि नेहरूजी भी काफी हद तक समाजवादी थे। उन्होने अपने देश से लोगों को सोवियत रूस भी भेजा जिससे वहाँ से लोग सीख कर आ सकें। लेकिन नेहरू आधे-अधूरे समाजवादी थे।
भगत सिंह के बारे में उन्होंने बताया कि भगत सिंह ने कहा था- हमारे शहीद होने के बाद देश हमें भूल जाएगा। सब आजादी के जश्न में मगन हो जाएंगे। बीस साल बाद इन्हें मालूम पड़ेगा कि कुछ नहीं बदला। गोरे साहब की जगह काला साहब आकर बैठ गया। शोषण जारी है। ये पूंजीपति सरकारें अम्बेडकर, भगत सिंह, चंद्रशेखर का पुतला तो लगवा सकती है, उनकी पूजा भी कर रही है लेकिन उनके विचारों की बात नहीं करना चाहती और जो करता है उसे देषद्रोही करार दे देती है। इसे विचारों से, बुद्धिजीवियों से डर लगता है। उन्होंने राजद्रोह कानून के बारे में विस्तार से बताते हुए हाल में घटी जेएनयू घटना पर भी प्रकाष डाला। उन्होंने बताया कि जिस तरह साजिषपूर्ण तरीके से सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों और आरएसएस के नेताओं ने निर्दोष विद्यार्थियों पर हमला बोला उसके विरोध में उन्होंने मानव संसाधन मंत्रालय का एक पुरस्कार लौटा दिया। उन्होंने कहा कि हैदराबाद और जेएनयू के नौजवानों ने फिर से ताक़तवर सत्ता के सामने निडरता से वैसी ही चुनौती खड़ी की है जैसी भगतसिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजों के लिए खड़ी की थी। कितने झूठ गढ़े जा रहे हैं कि पूरा देश वामपंथ से, इन नौजवानों से नफ़रत करने लगे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग ये नहीं जानते कि वामपंथ सच के साथ खड़ा है और उनका झूठ चाहे कितने ही अख़बारों और चैनलों से बोला जाए, उासकी कलई खुलनी ही है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने सवाल-जवाब के इस सिलसिले में ‘‘अगले आम चुनाव होंगे कि नहीं?’’ प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि चुनाव होंगे और मोदी सरकार चली भी जाएगी। मगर कुर्सी पर राहुल या उनके जैसा कोई और बैठ गया तो इस बदलाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा क्योंकि भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियां तो एक जैसी ही हैं। इससे आम इंसान को कोई राहत नहीं मिलने वाली। हमें एक अच्छा विकल्प तो लोगों को देना ही होगा। उन्होंने याद दिलाया कि समाजवाद के लिए संघर्ष करने वालों के लिए फासीवाद के आक्रमण को रोकना मात्र ही लक्ष्य नहीं होता बल्कि शोषणरहित समाज की स्थापना तक संघर्ष करते रहना होता है।
एक सवाल यह भी हुआ कि सरदार पटेल ने भी सारी रियासतों को कोई बहुत शराफत और लोकतांत्रिक तरीके से भारत में विलय नहीं कराया था तो अब कश्मीर के मामले में क्यों इतना लोकतंत्र बरतने की बात की जा रही है। जवाब में कॅामरेड जया ने कहा कि कश्मीर के लोागें को आम भारतीयों की तरह हक़ हासिल होने चाहिए और दउन पर होने वाली ज़्यादतियों का हम विरोध करते हैं जिस तरह देश दुनिया में कहीं भी हम ज़ुल्म का विरोध करते हैं। लेकिन कश्मीर पर भारत, पाकिस्तान ही नहीं उलझे हैं, साम्राज्यवादियों की लालची नज़रें भी वहाँ लगी हुई हैं। ऐसे में अगर हम जनमत संग्रह कराते हैं और भारत विरोधी प्रचार या नाराज़गी की वजह से अगर कश्मीर आज़ाद हो जाता है तो दूसरे ही दिन वहाँ अमेरिकी फौजें डेरा डाल लेंगी। दूसरा असर ये होगा कि नॉर्थ ईस्ट से भी जनमत संग्रह की मांग उठेगी और हमारा देश फिर से टुकड़ों में बंटना शुरु हो जाएगा और ये छोटे-छोटे देश अमेरिका जैसे साहूकार का सामना नहीं कर सकते, इसलिए एक होकर रहना बहुत जरूरी है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप सबको बंदूक के दम पर बाँध करके रखो। कश्मीर और सभी भारत के लोगों को ये विश्वास होना चाहिए कि जो सरकार है वह देश के लोगों के हितों की फिक्र करने वाली सरकार है न कि उन पर जुल्म ढाने वाली।श्
कार्यक्रम का संचालन कर रहे कॅामरेड विनीत ने बताया कि कन्हैया द्वारा लगाए गए ‘‘आजादी’’ के नारे का मूल स्त्रोत भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का जनगीत है, जिसे इप्टा लखनऊ के रवि नागर ने सन् 1993 में लिखा और वाराणसी से मगहर तक निकाली गई ‘‘कबीर के पगचिन्ह’’ यात्रा में पहली बार गाया गया था। दूसरी बार सन् 1995 में आगरा से दिल्ली तक ‘‘पहचान नजीर’’ यात्रा में गाया गया। लखनऊ में 2005 में हुए इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में इसे लखनऊ इप्टा के साथियों द्वारा गाया गया और देश भर में फैले इप्टा के सभी साथी इसे विभिन्न जगहों में गाने लगे। कन्हैया भी इप्टा का सदस्य रहा है।
कॅामरेड विनीत ने कहा कि भगत सिंह भी यही नारे लगाया करते थे तब अंग्रेज हुकूमत ने भगत सिंह पर राजद्रोह का आरोप लगाया था और आज जब जनता द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हूई सरकार है तब भी हम ये नारे नहीं लगा सकते तो क्या हम सच में आजाद हुए हैं?
इस परिचर्चा में नौजवानों की उपस्थिति के साथ-साथ पेरिन दाजी, वसंत श्ंिात्रे, सोहनलाल शिंदे, कल्पना मेहता, अनिल त्रिवेदी, रुद्रपाल यादव, कैलाश लिम्बोदिया जैसे अनेक साथी भी उपस्थिति रहे।
इस कार्यक्रम के अलावा प्रो. चमनलाल के साथ अन्य दो जगहों पर भी इंदौर में भगत सिंह पर केंद्रित कार्यक्रम हुए। 16 मार्च को इप्टा के किशोर उम्र के सदस्यों चर्चा करते हुए प्रोफेसर चमनलाल ने बताया कि भगत सिंह को भगतसिंह बनाने में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी योगदान था। भगतसिंह के परिवार में उनके पिता, चाचा और अन्य क़रीबी रिश्तेदार भी आज़ादी के आंदोलन में कमर कसे हुए थे। चार साल का बच्चा भगत अपने खेत में गेंहू की जगह ‘‘दंबूक’’ उगाना चाहता है जिससे वह अपने चाचा को अंग्रेजों की कैद से छुड़ा सके जो स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने के कारण आये दिन जेल में ही रहते थे।
इप्टा के सबसे छोटे सदस्य 15 वर्षीय पीयूष की उम्र का तकाजा करते हुए चमनलालजी ने बताया कि किस तरह 10-11 साल के बच्चे का स्कूल जाने के बजाय लाहौर से अमृतसर तक करीब 12 मील दूर जाकर जलियाँवालाँ बाग से शहीदों के खून से सनी मिट्टी को लाना उनकी उस उम्र में राजनीतिक और वैचारिक सोच को दर्शाता है। वहीं उनकी अपने दोस्तों के साथ मस्ती और शरारतों की भी अनेक घटनाओं का जिक्र प्रोफेसर चमनलाल ने किया। उन्होंने बताया कि ये सब क्रांतिकारी लोग ऐसा नहीं कि हँसते मुस्कुराते या मजाक नहीं करते थे। भगतसिंह को भी फिल्में देखने का शौक था।
करीब डेढ़ से दो घंटे चली इस बैठक में इप्टा के सफेद बाल वालों से लेकर दूध के दांत वाले तक करीब 25-30 साथी मौजूद थे। महिमा, पूजा, राज, साक्षी, पीयूष जैसे बच्चों के अलावा युवा साथी नितिन, आमिर, यशोदा, दीपाली, आस्था और इप्टा इंदौर के अध्यक्ष विजय दलाल, सचिव अशोक दुबे, जया मेहता, विनीत तिवारी, प्रमोद बांगड़ी, अरविंद पोरवाल, एस. के. दुबे, सारिका श्रीवास्तव की मौजूदगी भी रही।
इसी तारतम्य में 17 मार्च की दोपहर 12 बजे ‘‘वर्चुअल वोयेज कॅालेज’’ के विद्यार्थियों के साथ ‘‘नौजवानों के नाम भगत सिंह का संदेश’’ विषय पर परिचर्चा रखी गई। जिसमें चमनलालजी ने नौजवान भगत के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया कि भगत सिंह पर यूँ तो अनेक फिल्में बनी हैं लेकिन ‘‘लीजेन्ड अॅाफ भगत सिंह’’ में ही थोड़ा बहुत उनके नजदीक ले जाती है। फांसी के फंदे से बेखौफ 23 वर्षीय युवक को फंासी के लिए ले जाने को जब जेलर आए तो ‘‘रूसी क्रांतिकारी नेता लेनिन महान की जीवनी’’ पढ़ रहे उस नवयुवक ने उन्हें बड़ी ही बेफिक्री से रोकते हुए कड़क आवाज में कहा ‘‘ठहरो अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रंतिकारी से मिल रहा है।’’ और जब फांसी के पहले पहनाया जाने वाला नकाब लाया गया तो उस खामोश सुबह में एक कड़कती और बुलंद आवाज की गरज सुनाई दी ‘‘हमारे हाथों में हथकड़ी ना होंगी और ना हमारे चेहरे नकाब से ढंके होंगे’’। ये थे भगत सिंह। ‘वर्चुअल वोयेज’ कॉलेज के विद्यार्थियों ने भगतसिंह के विचारों पर आधारित एक नाटक भी प्रस्तुत किया जिसका निर्देशन किया श्री गुलरेज़ ने।
‘‘इंकलाब जिंदाबाद’’ का नारा देने वाले भगत सिंह पूरी तरह से नास्तिक थे। आज भले उनके बुत को चाहे भगवा पगड़ी बांध दी जावे या अरदास पढ़ी जावे लेकिन भगत सिंह द्वारा लिखे लेख में ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’’ वो सीधे कहते हैं कि मैं किसी सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता और अपने नास्तिक होने को वो पूरे तर्क सहित बताते हैं।
आरएसएस की कायराना सोच है जो लोकतांत्रिक बहस से भागकर तानाशाही कायम करना चाहती है।
क्यूबा, नॉर्वे, डेनमार्क इत्यादि देशों की अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों को समझाते हुए प्रो. चमनलाल ने विद्यार्थियों से ये सवाल पूछा कि आजादी के आंदोलन में अंग्रजों का विरोध करते हुए भगत सिंह ने ‘‘आजादी’’ के नारे लगाए थे वही नारे अभी कुछ दिन पहले कन्हैया ने भी लगाए तो क्या भगत सिंह भी देशद्रोही थे? विद्याथर््िायों ने भी बहुत सारे सवाल पूछे। एक सवाल ये भी था कि नाथूराम गोडसे ने गाँधी की हत्या को वध कहा और बताया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो आप इस पर क्या सोचते हैं। जवाब में विनीत तिवारी ने कहा कि गाँधीजी से मतभेद अनेक मामलों में कम्युनिस्टों के भी रहे और संघियों के भी काँग्रेसियों के भी। हमारे मतभेद को हम आपस में सुलझाने की कोशिश करेंगे, नहीं सुलझेगा तो पुलिस, कानून का सहारा लेंगे, तब भी नहीं सुलझा तो जनता के बीच जाकर समझााएँगे, लेकिन हम हत्या नहीं करेंगे। ये आरएसएस की कायराना सोच है जो लोकतांत्रिक बहस से भागकर तानाशाही कायम करना चाहती है।


