नोटबंदी - ज़ख़्म नासूर का रूप लेकर कब कैंसर में बदल जायेंगे, कहना मुश्किल
नोटबंदी - ज़ख़्म नासूर का रूप लेकर कब कैंसर में बदल जायेंगे, कहना मुश्किल
नोटबंदी - ज़ख़्म नासूर का रूप लेकर कब कैंसर में बदल जायेंगे, कहना मुश्किल
नया साल नोटबंदी के ज़ख़्मों को लाइलाज नासूर में बदलने से बचाने का साल होगा
अरुण माहेश्वरी
आज के अख़बारों में तमाम लेखों में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है - जितनी जल्द संभव हो, देश को नोटबंदी के दुष्परिणामों से निकालो।
कल मोदी जी ने ख़ुद अपने भाषण में बैंकों से कहा कि वे जितनी जल्दी हो, नगदी की स्थिति को सामान्य करें। हम जानते हैं कि मोदी जी की बात का कोई मूल्य नहीं है, क्योंकि नगदी की स्थिति को सामान्य करने के लिये नोट छापने पड़ेंगे और इस छपाई में ही अभी इतना समय लगना है कि आगामी तीन महीनों तक भी नगदी की स्थिति सामान्य नहीं होगी।
'टेलिग्राफ़' में नीति आयोग के लोगों की मनोदशा के बारे में यह खबर है कि वे मोदी जी के कल के भाषण को लेकर बहुत डरे हुए थे। उन्हें लग रहा था कि फिर वे लोगों को डराने वाली और कोई घोषणा न कर बैठे, जिसे संभालना मुश्किल होगा।
नीति आयोग वाले यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आगे डिजिटलाइजेशन का अभियान वे कैसे चलायेंगे !
'टेलिग्राफ़' में ही आकार पटेल का लेख इसी बात पर केंद्रित है कि भारत को मोदी जी नामक इस महान प्रतिभा की करतूतों से कैसे बचाया जाए।
उन्होंने ऐसी प्रतिभा के जन्म पर प्रकाश डालते हुए 2014 में मधु किश्वर को दिये गये मोदी जी के एक साक्षात्कार का जिक्र किया है जिसमें मोदी जी अपने काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि वे फ़ाइलों की गहराई में जाना बिल्कुल पसंद नहीं करते। बस लोगों की बातें सुन कर सारे विषय को समझ लेते हैं और फिर काम में लग जाते हैं। 'मेरा इतना ग्रास्पिंग है'। इसी से मोदी जी के तमाम अद्भुत कामों, नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, बुलेट ट्रेन, आदि-आदि बातों के उत्स को समझा जा सकता है।
'सन्मार्ग' की एक खबर में देख रहा था कि आयकर घोषणा -1 में जहाँ 65000 करोड़ की घोषणा से 30000 करोड़ का कर मिला, वहीं इस दौरान की आयकर घोषणा -2 में सिर्फ 2000 करोड़ ही मिले हैं।
'जनसत्ता' में मोदी-प्रेमी तवलीन सिंह लिखती है कि अब तो ईमानदार नागरिकों को बेईमान अधिकारियों के इंस्पेक्टर राज से बचाने का अभियान चलाना होगा।
चिदंबरम ने अपने स्तंभ में तमाम आँकड़ों के ज़रिये मोदी सरकार की आर्थिक मामलों संबंधी मूढ़ता को बेपर्द किया है। बताया है कि ऋण लेने वालों में गिरावट आ रही है, बैंकों की डूबत (एनपीए) तेज़ी से बढ़ रही है। 2015 में जो 5.1 प्रतिशत थी, वह 2016 में 9.1 प्रतिशत हो गयी है। यह बैंकों पर दोहरी मार है।
उन्होंने यह भी बताया है कि मोदी जी की सर्जिकल स्ट्राइक ने कश्मीर और पाक-सीमा पर मरने वाले भारतीय जवानों की संख्या को दुगुना कर दिया है।
इसी प्रकार की तमाम बातें - नोटबंदी के असर से मुक्ति पाने की ज़रूरत की बातें ही सब जगह दिखाई दे रही है।
जाहिर है, भारत में 2017 का साल नोटबंदी के ज़ख़्मों को भरने की कोशिशों का साल होगा। इस पर यदि तेज़ी से कार्रवाइयाँ नहीं हुई तो ये ज़ख़्म नासूर का रूप लेकर कब कैंसर में बदल जायेंगे, कहना मुश्किल है।


