प्रकाश कारात
सुषमा स्वराज की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान पाकिस्तान के साथ बातचीत दोबारा शुरू किए जाने की जो घोषणा की गयी थी, उसके चार हफ्ते में ही पठानकोट का आतंकी हमला हो गया। वास्तव में सीमा के दोनों ओर के अनेक प्रेक्षकों को ऐसे हमले की आशंका थी। ऐसा लगता है कि मोदी की लाहौर की यात्रा ने हमले की योजना को और जल्दी अंजाम दिला दिया। बहरहाल, पठानकोट के भारतीय वायु सेना के हवाई अड्डे पर की गयी आतंकीविरोधी कार्रवाई में रक्षा तथा सुरक्षा बलों के 7 लोगों की जान गयी है। छ: हथियारबंद आतंकियों को बाहर निकालने तथा खत्म करने में साढ़े तीन दिन लग गए। भाजपा की सरकार को, जो पिछले एक साल के दौरान दो-दो बार बातचीत रद्द करने के कभी हां कभी ना के खेल के बाद, पाकिस्तान के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के रुख तक पहुंची है, इस रास्ते पर कायम रहना चाहिए और अतिवादी-जेहादी गुटों को अपनी मर्जी थोपने का मौका नहीं देना चाहिए। वास्तव में पठानकोट की घटना, बातचीत में आतंकवाद के मुद्दे पर चर्चा में भारत के रुख को मजबूत ही कर सकती है। यह घटना, इस सचाई को रेखांकित करती है कि पाकिस्तानी हुकूमत, उन जेहादी गुटों से अब भी नहीं निपट पा रही है, जिन्हें देश के खुफिया तथा सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक हिस्से का संरक्षण हासिल है।
दोनों देशों के बीच बातचीत का जो कार्यक्रम तय किया गया था, उस पर कायम रहा जाना चाहिए और इसमें आतंक के मुद्दे को समुचित प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस कार्यक्रम से पलटना भारत के रणनीतिक विकल्पों को ही सीमित करेगा और टकराव की स्थिति पर दोबारा लौटना, भारत की आर्थिक प्रगति तथा बहाली को ही कमजोर करेगा।

जहां बाहर वालों के प्रति इस तरह का रुख अपनाए जाने की जरूरत है, वहीं इस आतंकवादी कार्रवाई का जिस तरह गड्ड-मड्ड तथा स्पष्ट दिशाविहीन तरीके से जवाब दिया गया है, उसकी फौरन समीक्षा किए जाने की जरूरत है। कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने तो इसे पराजय ही करार दे दिया है। समूचे ऑपरेशन को लेकर बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं। पहली बात तो यही है कि हमले के संबंध में पहले ही चेतावनी मिल गयी थी क्योंकि आतंकवादी दस्ते ने एक सुपरिटेंडेंट का पुलिसिया वाहन लूटा था और संबंधित पुलिस एस पी ने इस घटना के संबंध में पुलिस अधिकारियों को जानकारी दे दी थी। इसके बाद लिए काफी समय मिला था जिसमें यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर तक ले जाया जा सका, संबंधित हवाई अड्डे पर रैट एलर्ट किया जा सका और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजीत डोवाल के निर्देश पर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडो को विमान से वहां पहुंचाया जा सका था। इसके बावजूद, छ: आतंकवादी वायु सेना के हवाई अड्डे के परिसर की बाहरी दीवार पार करने और भीतर घुसने में कामयाब हो गए। पठानकोट में सेना का बहुत बड़ा अड्डा होने के बावजूद, आतंकवादियों की सघन तलाशी (कांबिंग ऑपरेशन) के लिए सेना को क्यों नहीं बुलाया गया? वायु सैनिक अड्डे की बाहरी दीवार की सुरक्षा डिफेंस सीक्यूरिटी कॉर्प्स के भरोसे छोड़ दी गयी, जिसमें सेवानिवृत्त सैनिक आते हैं। सबसे ज्यादा जानें उन्हीं की गयी हैं।
ऐसा लगता है कि विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों और बलों के बीच कोई तालमेल ही नहीं था। गृहमंत्री ने पहले दिन के बाद ही ऑपरेशन को समाप्त और सफल घोषित कर दिया और बाद में उन्हें अपना ट्वीट वापस लेना पड़ा। इससे इस बात का अंदाजा लग सकता है कि कितने अकुशल तरीके से पूरी कार्रवाई का संचालन किया गया।
मोदी सरकार को स्वीकार करना चाहिए कि इस मामले में गड़बड़ी हुई है और इससे अनेक परेशान करने वाले सवाल उठते हैं। सरकार को झूठी शान की परवाह नहीं करनी चाहिए, खामियों को स्वीकार करना चाहिए और समुचित जांच करानी चाहिए ताकि ऐसी गलतियां फिर से नहीं होने पाएं। 0