जंगली महाराज रोड सिलसिलेवार बम धमाका 2012 में गिरफ्तार मुस्लिम नौजवानों के परिजनों ने अपना दर्द बयान किया, मुनीब मेमन की माता यासमीन, फीरोज़ सैयद की पत्नी शगुफ्ता सैयद, फारूक़ बाग़बान के पिता शौकत बाग़बान, पत्नी नाज़नीन फारूक़ ने कहा असल गुनहगार दयानंद पाटिल को गायब करके हमारे बच्चों को फंसा दिया गया।
रिपोर्ट– मुम्ताज़ आलम रिज़वी
नई दिल्ली: जेल की सख्ती और पुलिस की यातना से हमारे पढ़े लिखे नौजवान बच्चों की ज़िंदगी तबाह हो रही है। उनकी स्मरण शक्ति खत्म हो रही है, आंखों की रोशनी कम हो रही है और शरीर के अंग नाकारा होते जा रहे हैं। हाथों और पैरों को लोहे की ज़ंजीरों से बांध कर सादे कागजों पर हस्ताक्षर लेने के लिए बिजली के इतने झटके दिए गए हैं कि उनका पूरा शरीर चूर चूर हो गया है। धमाके का असल अपराधी दयानंद था उसे ग़ायब कर दिया गया और हमारे बेगुनाह बच्चों को बलि का बक़रा बना दिया गया। “हम अपना दर्द कैसे बयान करें, बस यह समझ लें कि हर घटना की पूरी पूरी किताब तैयार की जा सकती है”।

दर्द में डूबे यह वाक्य उन उन पीड़ितों के हैं जिनके बच्चों को जंगली महाराज रोड बम धमाका केस में ‘मकोका’ क़ानून का ग़लत इस्तेमाल करते हुए जेल भेज दिया गया है।

अब से तीन साल पहले 1, अगस्त 2012 को पुणे के जंगली महाराज रोड स्थित पांच स्थानों पर सिलसिलावार बम धमाके हुए थे जिसके आरोप में असद खान, इमरान खान, इरफान मुस्तफा, सैयद फीरोज़, मुनीब मेमन, फारूक़ बाग़बान जैसे मुस्लिम नौजवानों को एक साज़िश के तहत जेल में डाल दिया गया।

यह पूरा मामला सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट से होता हुआ अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और इस मामले की पैरवी जमीअतुल उलेमा हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना महमूद मदनी के निर्देश पर जमीअतुल उलेमा महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हाफिज़ नदीम सिद्दीक़ी की निगरानी में लीगल सेल कर रहा है।

इंक़लाब ब्यूरो ने वर्तमान परिस्थितियों के आंकलन के लिए मुनीब मेमन की माता यासमीन फारूक़ बाग़बान की माता शौकत बाग़बान, पत्नी शगुफ्ता सैयद से विशेष मुलाकात की।

मुनीब मेमन की मां नाज़नीन अपने बेटे का दर्द बयान करते हुए रोने लगीं। उन्होंने कहा कि मेरे बेटे के साथ एटीएस ने जो ज़ुल्म व ज़्यादती किया है वह असहनीय है। उन्होंने कहा कि इस धमाके में सबसे पहला नाम दयानंद पाटिल का आया था, वह ज़िन्दा बम के साथ घायल अवस्था में पाया गया था और कई दिनों तक न्यूज़ चैनलों पर मुस्लिम नौजवानों का नहीं बल्कि उसी का नाम चलता रहा था। दयानंद पाटिल को एटीएस महाराष्ट्र की निगरानी में इलाज के लिए पुणे अस्पताल में भर्ती किया गया था।

भर्ती होने के आठ दिन बाद जब वह अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाला था कि अचानक ग़ायब हो गया और आज तक वह लापता है। उन्होंने कहा कि हम लोग उसकी खबरें न्यूज़ चैनलों पर सुनते रहते थे लेकिन उस लड़के के ग़ायब होने के बाद हमारे बच्चों को इस धमाके के मामले में उठाया जाने लगा।

नाज़नीन ने कहा कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हमारे बेटे मुनीब मेमन और फारूक़ बाग़बान को क्लीन चिट दे दी लेकिन यह भी कहा कि मुम्बई पुलिस तुम्हारे साथ क्या करेगी यह तुम जानो।

उन्होंने कहा कि पुणे सेशन कोर्ट ने दो बार फैसला सुनाया कि इन बच्चों पर मकोका लागू नहीं होता लेकिन महाराष्ट्र एटीएस ने उस फैसले के खिलाफ फिर मुकदमा कर दिया क्योंकि उसे मालूम है कि मकोका हटते ही यह सभी बच्चे बाइज़्ज़त बरी हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों को ट्रांज़िट रिमांड पर लेकर ज़बरदस्ती उनसे सादे कागज़ों पर हस्ताक्षर कराए गए और धमाकों का आरोप थोपा गया।

नाज़नीन ने रोते हुए कहा कि सादे कागज़ों पर हस्ताक्षर कराने के लिए मेरे बेटे को बिजली का करेन्ट लगाया गया। उसके हाथ–पैर ज़ंजीरों से बांधे गए और उसको करेन्ट दिया गया जिससे उसका पूरा शरीर, करेन्ट से उछलता था और ज़मीन पर गिरता था, बेकार हो गया। उन्होंने कहा कि आखिर यह कैसा ज़ुल्म है?

उन्होंने कहा कि एटीएस को हमारे बच्चों के खिलाफ न कोई सबूत मिला न गवाह लेकिन मकोका के तहत उन्हें फंसाया गया क्योंकि मकोका क़ानून के अनुसार पुलिस रिमांड में लिया गया इकबालिया बयान सही माना जाएगा और उसके तहत सज़ा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों पर ग़लत तरीके से मकोका कानून थोपा गया है जिसके खिलाफ हम जमीअतुल उलेमा हिंद की सहायता से क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और हमें यकीन है कि हमारे बच्चे बाइज़्ज़त बरी होंगे क्योंकि उनके खिलाफ कोई गवाह या सबूत नहीं है।
साभार “रोज़नामा इंक़लाब” उर्दू, लखनऊ
(अनुवाद- मसीहुद्दीन संजरी)