प्रधानमंत्री के मन में रियो ओलंपिक की बात ... शत-प्रतिशत ‘स्क्रिप्टेड’
प्रधानमंत्री के मन में रियो ओलंपिक की बात ... शत-प्रतिशत ‘स्क्रिप्टेड’
प्रधानमंत्री के मन में रियो ओलंपिक की बात ... शत-प्रतिशत ‘स्क्रिप्टेड’
संजीव ‘मजदूर’ झा
भारत के प्रधानमंत्री ने सचमुच में रियो-ओलंपिक के संदर्भ में अपने मन की ही बात कही, देश, खेल या खिलाड़ी की बात नहीं.
उन्होंने जब शुरू में ही यह स्वीकार किया कि सामान्य नागरिकों का रियो ओलंपिक के संदर्भ में प्रधानमंत्री से गुजारिश करना यह दर्शाता है कि वे खेल के प्रति जागरूक हैं, फिर वे अंत में वे यह कैसे कहते हैं कि ‘हमें खेल के प्रति समाज को मोटीवेट करने की जरुरत है’. ‘समाज को यह बताने की जरुरत है कि खेल समय की बर्बादी करना नहीं है’.
यह अपने आप में परस्पर विरोधी बातें हैं जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी बातें वाकई उनके मन की ही बातें हैं, शत-प्रतिशत ‘स्क्रिप्टेड’. ठीक उस रियलिटी टी.वी शो की भांति जो सिर्फ़ कहने को रियल और करने को मन-मर्जी के लिए प्रचलित हैं.
विश्व-स्तरीय युवा आधारित किसी भी स्पर्धा में भागीदारी का ग्राफ असल में उस राष्ट्र की प्रगति, सोच और व्यवस्था का भी ग्राफ होता है जिसमें भाग लेने वाले देश की वास्तविक सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता चलता है.
भारत का रियो ओलम्पिक में औसत से भी नीचा प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों की कमजोरी नहीं, बल्कि भारतीय व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है.
जिस देश में आज भी ‘चड्डी पहन के फूल खिला है’ और कीचड़ में कमल उगता है’ के नारे पर काम चलाया जा रहा हो, वहां इस तरह के ‘फूल’ और ‘कमल’ के जश्न में डूबने से कहीं अधिक जरूरी हो जाता है अपनी राजनैतिक संरचना पर बात करना.
मोटे तौर पर या कुल मिलाकर स्थिति सुधर रही है अथवा कम से कम अब हम भागीदारी करने लायक तो हो रहे हैं, जैसे मध्यकालीन सोच और समझ से हमें उबरने की जरूरत है. क्योंकि जिसे हम स्थिति में बदलाव और परिवर्तन कह रहे हैं, वह दरअसल एक नेचुरल बदलाव होता है जो किसी भी देश अथवा काल में लागू होता है और उस बदलाव में व्यवस्था की कोई सकारात्मक भूमिका हो, यह जरूरी नहीं होता.
मसलन देश गुलाम भी होता, तब भी हमारे यहाँ खिलाड़ी होते ही और वो खेल की दुनियाँ में हल्की-फुलकी दस्तक देते ही और ऐसा हमेशा से हुआ भी है.
अब प्रश्न यह उठता है कि देश को गुलामी से मुक्त हुए 70 वर्ष हो गए फिर भी हम हल्की-फ़ुल्की दस्तक ही क्यों दे पा रहे हैं?
अब अगर यहाँ भी राजनैतिक स्लोगन जहाँ ‘मोटे तौर पर’ जैसे वाक्य इस्तेमाल किये जाते हैं, के आधार पर कहें तो इसका मतलब तो यही निकलता है कि देश आजाद ही नहीं हुआ या देश एक हाथ से दूसरे हाथ बस बदल दिए गए हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो आज भी व्यवस्था मजबूत करने के बदले हम ‘चमत्कार’ या किसी ‘चड्डी पहने फूल’ की प्रतीक्षा में नहीं जुटे होते. खेल या खिलाड़ी हवा में तैयार नहीं होते हैं.
जिस देश के खिलाड़ियों को सुविधाएँ न के बराबर मिलती हों, वहां इस तरह की अपेक्षाएं रखनी बेकार है.
विशाल जन-समूह में स्वाभाविक होता है कि तरह-तरह की प्रतिभाएं हमारे बीच पैदा हों.
प्रधानमंत्री यह तो स्वीकार करते हैं कि बच्चों में खेल के प्रति जिज्ञासा बढ़ाने की जरुरत है, लेकिन इसके साथ ही उन्हें यह क्यूँ नहीं दिखाई देता है कि इस देश के लगभग 70% बच्चों को उनके स्कूल में खेल-सम्बन्धी किसी भी प्रकार की सुविधाएँ मौजूद नहीं है. जहाँ सरकार 21वीं सदी में स्कूलों में खिचड़ी की सुविधा देकर ही ख़ुश है, वहां क्या यह हास्यास्पद नहीं कि जिन दूसरे देशों के बच्चों को अच्छी डाइट उपलब्ध हैं, वहां से प्रतिस्पर्धा नहीं की जा सकती है.
राज्य को यह समझना चाहिए कि हमारी संरचना इतनी कमजोर है कि उसे ठीक किये वगैर हम पदक-तालिका में चीन या अमेरिका से तुलना तो दूर की बात उसके आस-पास भी खड़े नहीं हो सकते.
बच्चों में स्वाभाविक रूप से खेल के प्रति झुकाव होता है लेकिन अक्सर 10वीं के बाद ही उन्हें छोटी-मोटी सुविधाएँ मिल पाती हैं, जबकि अन्य जगहों पर इससे अधिक सुविधाएँ 10 वर्ष पहले मिलती है.
अब यह कैसे मुमकिन है कि इस 10 वर्ष के गैप को भुलाकर स्पर्धा की जाय.
इसके साथ ही समस्याएँ और तेजी से बढ़ती हैं. हाई-स्कूल तक खेलने वाले अधिकांश बच्चों की डाइट उनके पेरेंट्स को व्यक्तिगत स्तर पर ही मुहैया कराना पड़ता है और जिन 70% बच्चों की बात की जा रही है वहां यह अत्यंत ही मुश्किल है.
इसके बाद कॉलेज की संरचना भी कुछ खास नहीं होती है.
यदि उदहारण स्वरुप देश के बहुचर्चित विश्वविद्यालय ‘दिल्ली-यूनिवर्सिटी’ के कॉलेज को ही लें तो हम पाते हैं कि वहां भी खेल और खिलाड़ी को लेकर कोई योजना नहीं, बल्कि खाना-पूर्ति का काम चलता है.
जिन बच्चों का ‘एडमिशन’ खेल कोटे से होता है, उनके लिए प्रैक्टिस और पढ़ाई की कोई अलग से टाइमिंग नहीं तय होती है, जिससे खेलने वाले छात्रों के भविष्य का एक विकल्प हमेशा के लिए खत्म हो जाता है.
इसके बाद 4-6 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद 20 रूपये के टोकन से प्रति ख़िलाड़ी को अपनी डाइट लेनी होती है. जिससे सामान्यतः खिलाड़ी शारीरिक रूप से कमजोर होता चला जाता है.
इसके बाद भी यदि ‘ग्रेजुएशन’ से ऊपर की पढाई कोई खिलाड़ी करना चाहता है तो ‘पोस्ट-ग्रेजुएशन’ से स्पोर्ट्स कोटे का अंत हो चुका होता है.
यह स्थिति कई मायनों में भयावह है.
जैसे यदि बी.ए. तक में खिलाड़ी को कोई बड़ी ‘इंजरी’ होती है तो वह पढ़ाई के क्षेत्र में अपनी वापसी नहीं कर सकता है. उसके सारे ग्रेस अचानक से खत्म हो चुके होते हैं. आगे रास्ता लगभग बंद हो चुका होता है.
यह है हमारे खिलाड़ियों के खेल और उनके भविष्य की संरचना.
लगभग यही हाल सभी फेडरेशनों का खेल और खिलाडियों के प्रति है. अब फिर भी यहाँ से कोई आगे निकलता है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ कर पाता है तो उसका व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक रूप से मजबूत होना अनिवार्य हो जाता है.
इससे एक और बात साफ़ है कि छोटी जाति अथवा कमजोर वर्ग के बच्चों की भागीदारी नहीं के बराबर होती है. इसलिए बार-बार यह कहना कि 120 करोड़ की संख्या वाले देश में हम एक भी गोल्ड-मैडल नहीं ले पाते हैं, बेमानी है.
बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है जब किसी तरह व्यक्तिगत साधनों के दम पर कोई खिलाड़ी कोई पदक जीत पाता है तब देश के सभी बड़े नेताओं में उसके साथ तस्वीर खिंचवाने की होड़ लग जाती है.
यह एक पोलिटिकल स्टंट होता है और स्वाभाविक सी बात है कि इस स्टंट की जरुरत इसलिए नेताओं को पड़ती है क्योंकि जनता का ध्यान उस खेल और खिलाड़ी पर है. इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि एक बड़े मास का ध्यान खेल और खिलाड़ी के प्रति है, फिर राजनीति में इसकी उपेक्षा क्यों?
जब देश के प्रधानमंत्री यह कह रहे होते हैं कि- हमारी उपलब्धि में एक उपलब्धि यह भी है कि 36 वर्ष बाद हम हॉकी में नॉक-आउट तक पहुंचे, एथलैटिक्स में चौथे स्थान पर रहे, पी. टी. उषा के बाद पहली बार हम लम्बी रेस में फाइनल तक पहुंचे, तब वो इन उत्सवी बातों के पीछे के खतरनाक सच को छुपा लेते हैं और वह सच यह है कि हम लगातार विकसित नहीं बल्कि अविकसित हो रहे हैं.
सही मायने में खेल के प्रति समाज को नहीं बल्कि भारतीय राजनीति को ‘मोटीवेट’ होने की जरूरत है.


