शेष नारायण सिंह
पांच विधानसभाओं के लिए हुए चुनावों के नतीजे आ गए हैं। उनका साफ़ सन्देश यह है कि कांग्रेस की हालत खस्ता है। वह उत्तर भारत के सभी महत्वपूर्ण राज्यों से हटा दी गयी है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में कांग्रेस का सफाया होना इस बात का संकेत है कि अब सत्ताधारी पार्टी के रूप में उसका फिर से स्थापित हो पाना दूर की संभावना है, क़रीब मुस्तकबिल में तो ऐसा होता नहीं दिखता। अब लोकसभा चुनावों की तैयारी भी शुरू हो गयी है जो हर हाल में मई तक हो जायेंगे। इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के इतने सदस्य जीतकर नहीं आयेंगे जिनके सहारे पार्टी सरकार बनाने का दावा कर सके। परम्परागत रूप से राजनीति में लोकतांत्रिक और लिबरल मूल्यों के कस्टोडियन के रूप में कांग्रेस की पहचान होती रही है। यह भी माना जाता रहा है कि कांग्रेस के राज में भारतीय नागरिकों के सभी वर्गों को सम्मान मिलता रहा है। इसी खास पहचान के ज़रिये कांग्रेस कई राज्यों में और केन्द्र की सरकार के लिए चुनाव जीतती रही है। लेकिन गुजरात में कांग्रेस को पिछले कई वर्षों से हार का सामना करना पड़ रहा है। पहचान की राजनीति को अपनी मुख्य पहचान बना चुके वहाँ के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात से कांग्रेस को लगभग खत्म कर दिया है। व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार के खिलाफ माने जाने वाले मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा माहौल बना रखा है कि भारतीय जनता के बड़े नेता यह मानने लगे हैं कि उनकी पहचान की राजनीति को केन्द्र के स्तर पर लागू करके केंद्रीय सत्ता को हासिल किया जा सकता है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को केन्द्र में रखकर इस बार चार विधानसभाओं के चुनाव का संचालन किया। जो नतीजे आये हैं उनको मीडिया का एक वर्ग नरेंद्र मोदी की जीत कहकर पेश करने की कोशिश कर रहा है लेकिन सच्चाई इससे अलग है। जिन तीन राज्यों में भाजपा की जीत हुई है उन तीनों में भाजपा का स्थानीय नेतृत्व बहुत ही मज़बूत है। और यह जीत उनके खाते में ही लिखी जानी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने पिछले दस वर्षों में ऐसे काम किये हैं जिसके कारण वे बहुत ही लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी योजनाएं लोकप्रिय हैं और उनके कारण उनकी पहचान राज्य के हर इलाके में है। यहाँ छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाओं को गिनाने का उद्देश्य नहीं है लेकिन इतना तय है कि वे राज्य में इतने लोकप्रिय हैं कि उनके नाम पर राज्य विधानसभा चुनाव बहुत ही आसानी से जीता जा सकता है। छत्तीसगढ़ विधान चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान एक बार भी नहीं लगा कि वहाँ नरेंद्र मोदी का कोई प्रभाव है। भाजपा के सबसे बड़े नेता के रूप में राज्य में रमन सिंह को पहचाना जाता है। रायपुर और उसके आसपास के इलाकों में राजनाथ सिंह की इज्ज़त है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में निश्चित पहचान है। कार्यकर्ताओं के बीच उनको अब अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बराबर माना जाता है। लेकिन राज्य में वोट हासिल करने का सबसे अहम जरिया रमन सिंह ही हैं। अपने अखबार के लिए चुनाव अभियान की रिपोर्टिंग के दौरान जब बस्तर के विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया गया तो साफ़ लग रहा था कि मुकामी विधायाकों से तो जनता बहुत नाराज़ है लेकिन चाउर वाले बाबा यानी रमन सिंह की लोकप्रियता हर जगह नज़र आती है। जहां भी नरेंद्र मोदी का नाम लिया गया बस्तर के क़स्बों में भी उनके नाम पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गयी। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कोई जानता ही नहीं था।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता भी अपने राज्य में बहुत ज्यादा है। इस बार का चुनाव भी उनकी लोकप्रियता को केन्द्र में रखकर लड़ा गया। कांग्रेस की पूरी कोशिश थी कि उनके राज्य के भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बाना दिया जाए और उसी पिच पर उनको घेर लिया जाए। भाजपा की कोशिश थी कि शिवराज सिंह चौहान के व्यक्तित्व के आस पास चुनाव को केंद्रित कर दिया जाय और उनकी लोकप्रिय को वोटों में तब्दील कर दिया जाए। राज्य में सरकार की तरफ से महिलाओं, नौजवानों और लड़कियों के लिए उन्होने इतनी लोकप्रिय स्कीमें चला रखी हैं कि आम आदमी की नज़र में उनको गिरा पाना बहुत मुश्किल है। शिवराज सिंह चौहान की पहचान को ही भाजपा ने वोटों में बदल देने में सफलता पाई और वहाँ तीसरी बार सरकार बन गयी है। मध्यप्रदेश के चुनावों में भी नरेंद्र मोदी की कोई भूमिका नहीं रही। यह अलग बात है कि मोदी की इमेज के प्रबंधकों ने मध्यप्रदेश में भी उनकी कई चुनावी सभाएं करवाईं लेकिन वहाँ चुनाव शुद्ध रूप से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम पर लड़ा गया। नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे आदमी की बन गयी है जो मुसलमानों के बहुत खिलाफ है। शायद यही वजह है कि राज्य के भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की बहुत सक्रिय भागीदारी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनको मालूम था कि मुसलमानों के बीच में भी लोकप्रियता हासिल कर चुके शिवराज सिंह चौहान की छवि को नुक्सान होगा। हुआ भी यही। मोदी के कारण राज्य के वे मुसलमान मतदाता शिवराज सिंह के उम्मीदवारों के खिलाफ हो गए जो आम तौर से शिव मामा को वोट दिया करते थे। इस लिए बहुत ही भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि रमन सिंह की तरह शिवराज सिंह चौहान भी अपनी लोकप्रियता के कारण मध्यप्रदेश में भाजपा को जीत दिला सके हैं। यह भी सच है कि भाजपा के अंदर सक्रिय बहुत सारे लोग नहीं चाहते थे कि शिवराज सिंह जीत जाएँ क्योंकि उनके तीसरा टर्म शुरू होने के मतलब यह होगा कि वे आर एस एस और कारपोरेट घरानों के चहेते नरेंद्र मोदी से ज़्यादा लोकप्रिय हो जायेंगे। लेकिन आज शिवराज सिंह गुजरात से बड़े राज्य के तीसरे टर्म में जीते हुए मुख्यमंत्री हैं और उनकी लोकप्रियता किसी जाति या वर्ग विशेष के खिलाफ अभियान चलाने के कारण नहीं है। उनकी जीत में पिछले आठ वर्षों में किये गए उनके काम की स्वीकार्यता ही मुख्य फैक्टर है।
राजस्थान में भाजपा की जीत में वसुंधरा राजे सिंधिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उनको हटाकर ही अशोक गहलौत से गद्दी संभाली थी। अब उन्होंने वह सीट वापस ले ली है। राजस्थान में भाजपा की जीत में कांग्रेस की असफलताएं मुख्य रूप से ज़िम्मेदार हैं। अशोक गहलौत के पांच साल के कार्यकाल में राज्य के कांग्रेसी उनके खिलाफ काम करते रहे। अभी चार महीने पहले तक उनको हटाकर किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की बात चलती रही। सी पी जोशी, सीसराम ओला, गिरिजा व्यास और सचिन पायलट ने हमेशा अशोक गहलौत को कमज़ोर साबित करने के लिए दिल्ली दरबार में अभियान चलाया। कांग्रेस की भी पता नहीं क्यों योजना थी कि आलाकमान ने अशोक गहलौत को चैन से शासन नहीं करने दिया। राजकाज चलाने में जो आज़ादी रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान को मिली हुई थी, वह अशोक गहलौत को कभी नहीं मिली। इस तरह से साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि राजस्थान में भाजपा की जीत में वसुंधरा राजे, सी पी जोशी, सीसराम ओला, गिरिजा व्यास और सचिन पायलट का सबसे अधिक योगदान है। यहाँ भी नरेंद्र मोदी का कोई खास योगदान नहीं है। यह बात वसुंधरा राजे ने जीत के बाद कही भी कि जीत में सबसे ज़्यादा योगदान राजस्थान की जनता का है।
विधानसभा चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई दिल्ली में लड़ी गयी। राजधानी होने के कारण यहाँ के चुनाव के दूरगामी परिणाम होने वाले थे। इसीलिये नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव का ज़िम्मा खुद सम्भाला। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किये जा रहे विजय गोयल को हटाकर उनकी जगह पर अपने उम्मीदवार डॉ हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया। दिल्ली शहर में कई चुनावी सभाएं कीं और जीत का भरोसा दिलाया। दिल्ली की मुख्यमंत्री बहुत ही अलोकप्रिय थीं। उनके खिलाफ भाजपा जैसे मज़बूत संगठन को जीतने के लिए बहुत मेहनत करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन यहाँ भाजपा सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा पाई और तीन बड़े राज्यों की चुनावी सफलता पर दिल्ली विधान सभा ने लगाम लगा दी। सही मायनों में दिल्ली विधान सभा का चुनाव नरेंद्र मोदी का चुनाव था लेकिन यहाँ पार्टी चुनाव में सरकार बनाने लायक सफलता नहीं ला सकी।
मिजोरम में कांग्रेस को जीत मिली है लेकिन 2014 के चुनावों में मिजोरम विधानसभा चुनावों का असर केवल उसी राज्य में पड़ेगा। राष्ट्रीय सन्दर्भ में उसका महत्व नहीं होगा यह सब जानते हैं। 2013 के चुनाव नतीजों से उन लोगों को भी दिलासा लेनी चाहिए जो इस दहशत में हैं कि अगर नरेंद्र मोदी का राज आ गया तो डबल मार्च करते हुए फासिज्म की स्थापना हो जायेगी। इस बार के चुनाव ने यह तय कर दिया है कि भाजपा के अंदर जो लिबरल ताकतें हैं वे फासिस्ट ताक़तों से भारी हैं। लिबरल ताक़तों के सबसे बड़े प्रतिनिधि खुद राजनाथ सिंह हैं, जबकि रमन सिंह, शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे उस विचारधारा के प्रमुख समर्थक हैं। यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि कांग्रेस में भी एक परिवार के अधिनायकत्व के चलते कांग्रेस भी कोई शुद्ध रूप से लिबरल संगठन नहीं है। जवाहरलाल नेहरू के लिबरल लोकतंत्र की उम्मीद कांग्रेस से कभी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि वहाँ भी कभी कोई संजय गांधी या राजीव गांधी आ जाता है और कभी राहुल गांधी सबसे पुरानी पार्टी को दिशा देने लगता है। लोकतंत्र की नेहरूवादी परम्परा में प्रशिक्षित लोग वहाँ भी पीछे धकेल दिए जाते हैं। इसलिए अब ज़रूरत यह है कि सभी पार्टियों में तानाशाही ताक़तों के खिलाफ लिबरल ताक़तों को पहचाना जाए और उम्मीद की जाए कि उनके सहारे ही देश का भला होगा।
शेष नारायण सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।