बढ़ने के स्थान पर घटा है लोकतंत्र - असग़र वजाहत

राघवेन्द्र रावत

जयपुर। ‘‘साम्प्रदायिक विभाजन की चेतना व्यक्तियां को अन्दर व बाहर से तोड़ती हैं और पूरे समाज को गहरे अंधेरे में ले जाती हैं। बड़े देश पहचान की राजनीति का खेल खेलते हैं और विकासशील देशों में विकास का पहिया गरीब एवं शोषित जनता को कुचलता है और ऐसे में हिंसा का दानव खुलकर खेलता है।"

सुप्रसिद्ध लेखक और जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो असग़र वजाहत ने जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब में साहित्य संवाद आयोजन में उक्त विचार व्यक्त किये।


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आयोजन में असग़र वजाहत से कवि-कथाकार नंद भारद्वाज ने साहित्य एवं साहित्येतर विषयों पर गम्भीर एवं सार्थक बातचीत की। बातचीत ऐसे लग रही थी जैसे गाँव, कस्बे एवं छोटे नगरों की सुरक्षित, अनौपचारिक एवं भावुक सम्बन्धों को समेटने वाली गलियाँ महानगरों के पास गुजरने वाले असुरक्षित ‘हाइवेज’ के पास पहॅुंच कर भयभीत हो रही हैं या फिर ‘हाइवेज’ का मुकाबला करने को एकजुट होने की तैयारी में हैं।

क्लब के खचाखच भरे सभागार में असग़र वजाहत ने अपनी बेवाक शैली में न केवल उनकी प्रसिद्व रचनाओं और उनकी रचना प्रक्रिया से जुडी बातों का खुलासा किया बल्कि आतंकवाद, आपातकाल, शिक्षा, जम्मू कश्मीर समस्या, साम्प्रदायिकता, साम्राज्यवाद लेखक एवं लेखक संगठनों की भूमिका पर भी विस्तृत चर्चा की।

जातिवाद, साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद की समस्याएं बढ़ी हैं

लोकतंत्र की स्थिति के बारे में बोलते हुए असग़र वजाहत ने कहा कि-

‘‘जनता किसी भी क्षेत्र में ‘इनीशिएटिव’ लेने की प्रवृति को उत्पन्न नहीं कर पायी है। शिक्षा व संस्कृति के प्रति उपेक्षा भी देखी जा सकती है। इन क्षेत्रों में माकूल माहौल बनाने की जरूरत है। देश में जातिवाद, साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद की समस्याएं बढ़ी हैं क्योंकि लोकतंत्र बढने के स्थान पर घटा है वह जनहित की तरफ न जाकर जातिवाद, साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद के दलदल में फंस गया है।"

आपातकाल तो नहीं पर आपातकाल से कम भी नहीं

एक अन्य सवाल के जवाब में असग़र वजाहत ने कहा कि आपातकाल एक भयानक समय था। आज जो कुछ रहा है वह आपातकाल तो नहीं है पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर आक्रमण सहित अनेक घटनाएं आपातकाल की याद दिलाने के लिये काफी हैं।

गुरु चेला संवाद

असग़र वजाहत ने बातचीत के अन्त में अपनी कुछ चुनिंदा कहानियों का पाठ भी किया, 'गुरु चेला संवाद' शीर्षक की इन कहानियों को श्रोताओं ने खूब पसंद किया।

आयोजन में दिल्ली से प्रकाशित ‘बनास जन’ पत्रिका के सम्पादक डॉ. पल्लव ने असग़र वजाहत से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि वजाहत साहब की सहजता और ईमानदारी उन्हें बड़े लेखक के साथ साथ बड़ा मनुष्य भी बनाती है। उन्होंने असग़र वजाहत के साथ अपनी कुछ यात्राओं के रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि असग़र वजाहत के लिए यात्राएं कोरे आनंद और मनोरंजन का साधन न होकर सामाजिक है। तभी वे अपने को सोशल टूरिस्ट कहते हैं जो जगहों के साथ वहां के लोगों के जीवन को जानने के लिए भी उत्सुक रहता है।

संवाद के प्रारम्भ में कवि राघवेन्द्र रावत ने लेखक पाठक संवाद के महत्त्व को रेखांकित करते हुए साहित्यिक आयोजनों में जनसहभागिता की जरूरत पर बल दिया।

संयोजन कर रहे कवि एवं आलोचक शैलेन्द्र चौहान ने असग़र वजाहत का विस्तृत परिचय भी दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी, प्रभा खेतान फाउन्डेशन की कार्यकारी सचिव अपरा कुच्छल एवं राज. विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक मनीष सिनसिनवार ने असग़र वजाहत एवं डॉ. पल्लव का स्वागत किया।

सुखद संयोग रहा कि आयोजन की तिथि को ही असग़र वजाहत का जन्मदिन भी था इससे कार्यक्रम यादगार बन गया।

कार्यक्रम में आए श्रोताओं ने भी असग़र वजाहत से रूबरू संवाद किया और अपने विभिन्न सवालों से आयोजन में भागीदारी की।

कार्यक्रम में इप्टा के राष्ट्रीय ध्यक्ष रणवीर सिंह, प्रलेस संयोजक ईश मधु तलवार, कवि सत्यनारायण, हरिराम मीणा, कैलाश मनहर, गोविन्द माथुर, कृष्ण कल्पित, सवाई सिंह शेखावत, हरीश करमचंदानी, डॉ सत्यनारायण व्यास, राजाराम भादू, उमा, रेखा पांडेय, नीलिमा टिक्कू,योगेश कानवा, विशाल विक्रम सिंह, जगदीश गिरी, रंगकर्मी विजय स्वामी सहित बड़ी संख्या में पाठक और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

इस समूचे कार्यक्रम की रूपरेखा जनवादी लेखक संघ राजस्थान एवं जयपुर जिला ईकाई ने तैयार की। समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता ने सभी उपस्थित अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।


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