एच एल दुसाध

मित्रों, आप में से कईयों को पता होगा कि हजारों-लाखों लोगों की तरह ‘सामाजिक परिवर्तन के लिए’ मैं भी बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम के ‘पे बैक टू द सोसाइटी’ आह्वान से अनुप्राणित होकर, शानदार नौकरी से इस्तीफा देकर 1997 से पूर्णकालिक तौर पर ‘बहुजन मुव्हमेंट’ से जुड़ गया. इसके लिए मैंने लेखन को माध्यम बनाया और देखते ही देखते मैंने कांशीराम के ‘बहुजनवाद’ के पक्ष में लगभग 2000 पृष्ठों का लेखन कर डाला, किन्तु 2005 में ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’की ओर विचलन के बाद जब 2007 में यूपी में बसपा को मिली ऐतिहासिक सफलता को सोशल इंजीनियरिंग का परिणाम बताया गया, मुझे काफी आघात लगा. इसके प्रतिवाद में मैंने अगस्त-2007 में 450 पृष्ठों की ‘उत्तर प्रदेश में बसपा की सफलता : सोशल इंजीनियरिंग का कमाल या कुछ और!’ पुस्तक H L Dusadhनिकाल कर बसपा से निर्लिप्त हो गया. किन्तु ठेकों में एससी/एसटी के आरक्षण जैसा क्रांतिकारी कदम उठाने के बावजूद पहले की भांति उसके पक्ष में धुआंधार लेखन का उत्साह जाता रहा.

लेकिन उत्तर प्रदेश के मौजूदा निर्णायक चुनाव में जिस तरह परिवर्तन-विरोधी दलों ने ‘विकास और भीखनुमा घोषणाओं’ के सहारे ‘शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों के 80-85 % वर्चस्व को बरक़रार रखने का षड्यंत्र रचा है, मुझे एक बार फिर बसपा के पक्ष में खुलकर सामने आने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए कि मेरा मानना है कि कुछ कमियों और सवालों के बावजूद राष्ट्रवादी, गांधीवादी, लोहियावादी और मार्क्सवादी इत्यादि दलों के मुकाबले आंबेडकरवादी बसपा ही एकमात्र वह दल है, जो काफी हद तक सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य को पूरा कर सकती है एवं मायावती ही वह नेत्री हैं जो उत्तर प्रदेश जैसे बर्बर राज्य को योग्य प्रशासन प्रदान कर सकती हैं.

मित्रों,इस पोस्ट को डालने का मेरा मकसद यह है कि जिन्हें लगता है कि बाकी दलों के मुकाबले बसपा बेस्ट नहीं है, उनकी शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करूं. एक बात का अनुरोध करूँगा कि शंका वे ही लोग रखें,जो दो-चार किताबों के लेखक,किसी अखबार के सम्पादक / पत्रकार या किसी विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं. मुझे ज्यादा ख़ुशी काग्रेस-भाजपा-सीपीएम इत्यादि जैसे सवर्णवादी दलों के समर्थकों के सवालों का जवाब देकर होगी.

अगर कोई हिचक है अपने इस मित्र को बताएं,उसे दूर करने का यथासाध्य प्रयास किया जायेगा.