बेगुनाहों को सजा !!!
बेगुनाहों को सजा !!!
जाहिद खान
अक्षरधाम मंदिर पर साल 2002 में हुए आतंकी हमले के मामले में बीते दस साल से जेल की सजा काट रहे छह मुस्लिम नौजवानों को बेकसूर मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल उनकी रिहाई के आदेश दिए हैं। इसमें तीन मुल्जिमों को साल 2006 में गुजरात की पोटा अदालत ने आतंकवाद निरोधक कानून यानी पोटा के तहत मौत की सजा और एक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति एके पटनायक और वी गोपाल गौड़ा की खंडपीठ ने हाल ही में सुनाए अपने एक फैसले में निचली अदालत और गुजरात हाईकोर्ट के निर्णय निरस्त कर दिए। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी हर मोड़ पर कमजोर है। अदालत ने इस मामले में बेगुनाह लोगों को फंसाने के लिए गुजरात पुलिस के प्रति अपनी नाराजगी भी जाहिर की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में गुजरात पुलिस के साथ-साथ राज्य के गृह मंत्रालय को भी इस गलत जांच के लिए दोषी ठहराया। जिस वक्त यह हमला हुआ, उस वक्त गुजरात में गृह मंत्रालय का जिम्मा तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पास ही था।
गौरतलब है कि गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर में 24 सितंबर, 2002 को एक आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 32 मासूम लोग मारे गए थे। इस हमले में हमलावरों ने स्वचालित हथियारों और हथगोलों का इस्तेमाल करके 32 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें 28 मंदिर में आए दर्शनार्थी और एनएसजी के एक कमांडो समेत तीन कमांडों और एक राज्य पुलिस का सिपाही था। मुठभेड़ में दो आतंकवादी भी मारे गए थे। जिनकी पहचान पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के खूंखार आतंकवादी के रूप में हुई थी। बाद में इस मामले की जांच को आगे बढ़ाते हुए गुजरात पुलिस ने राज्य से कुछ गिरफ्तारियां की और मामले को सुलझाने का दावा किया। जाहिर है पुलिस की इस सब कवायद और निचली अदालत, हाई कोर्ट द्वारा इन मुल्जिमों को सजा सुनाने के बाद देश में लोगों के जेहन से यह पूरा मामला उतर गया। लोग यह बात भूल ही गए थे कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया, जिसमें उसने गिरफ्तार नौजवानों को ना सिर्फ बेकसूरवार बतलाया, बल्कि घटिया जांच के लिए गुजरात पुलिस को खूब लताड़ भी लगाई।
अदालत से बाइज्जत बरी होने के बाद मुल्जिमों ने प्रेस के सामने जो खुलासे किए, वे बड़े हैरतअंगेज हैं। मोहम्मद सलीम, जो उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें अदालत ने अक्षरधाम मंदिर हमले के मामले से बरी कर दिया, उसने गुजरात पुलिस पर इल्जाम लगाते हुए कहा कि हिरासत में पुलिस ने मुझसे कहा कि मैं गोधरा कांड, हरेन पंड्या हत्या मामला या अक्षरधाम मंदिर पर हमले में से किसी एक मामले में अपनी भूमिका स्वीकार कर लूं, जिसमें उन्हें फंसाया जा सके। सलीम ने अपनी दर्दनाक दास्तां को बयां करते हुए कहा, मैंने तेरह साल सऊदी अरब में काम किया। उसके बाद मैं वापिस गुजरात में आ गया। अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले के बाद यकायक एक दिन पुलिस ने मुझे पासपोर्ट की समस्या बताकर गिरफ्तार कर लिया। हिरासत में मुझे बुरी तरह से मारा-पीटा गया और मजबूर किया गया कि मैं वही करूं, जो पुलिस चाहती है। सलीम के इकरार के बाद निचली अदालत ने पोटा के तहत उसे उम्रकैद की सजा सुना दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में यह फर्जी मामला टिक नहीं पाया। अदालत ने फैसले को पलटते हुए इस मामले से सलीम समेत पांच दीगर लोगों को बरी कर दिया। इन छह लोगों में से चार की दस साल से ज्यादा जिंदगी जेल की सलाखों के भीतर ही खर्च हो चुकी है। उनकी जिंदगी के कीमती साल जेल के अंदर तबाह हो गए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किए गए एक दीगर शख्स मुफ्ती अब्दुल कय्यूम की दुनिया भी पूरी तरह से बदल गई है। कय्यूम जेल में ग्यारह साल बिता चुके हैं। इस दौरान उनके पिता की मौत हो गई और उनके परिवार ने बड़े ही जद्दोजहद एवं परेशानी से अपनी जिंदगी बिताई है। कयूम ने प्रेस को अपनी खौफनाक आपबीती बताई कि आतंकी हमले के दौरान पुलिस मुठभेड़ में जो आतंकी मारे गए थे, उनके पास मिले खत को लिखने का इल्जाम उन पर लगाया गया था। पुलिस ने बरामद किया गया खत मुझे दिया और तीन दिन और रात तक लगातार उसे कॉपी करवाया। वह रोज एक्सपर्ट बुलाते थे और जांच करवाते थे कि मैंने ठीक से कॉपी किया है या नहीं। वह चाहते थे कि मैं उर्दू के अक्षरों के घुमाव को भी ज्यों का त्यों कॉपी करूं, ताकि वह असली खत जैसा लगे। मैं बहुत डरा हुआ था, उन्होंने जो कहा, मैंने कर दिया। जब मैंने यह काम सही तरह से कर लिया, तब पुलिस ने अदालत में दावा किया कि वह खत मैंने ही लिखा है। बाकी चार लोगों की भी इसी तरह की कहानी थी। यानी गुजरात पुलिस ने इस मामले में अपनी नाकामी को छिपाने और झूठी वाहवाही लूटने की खातिर मासूम, बेकसूरवार नौजवानों से उस जुल्म को जबरन कबूलवा लिया, जिस जुल्म को उन्होंने किया ही नहीं था। पुलिस की यातनाओं से आजिज आकर इन नौजवानों ने पुलिस की फर्जी और मनगढंत कहानी पर अपनी रजामंदी जता दी थी।
बीते एक दशक में देश के मुख्तलिफ हिस्सों में ऐसे अनेक मामले सामने निकलकर आए हैं, जिसमें मुस्लिम नौजवान पुलिस और जांच एजेंसियों की ज्यादतियों के शिकार हुए। खास तौर पर आतंकवाद के मामलों में इन्हें जान-बूझकर फंसाया गया। मालेगांव, मक्का मस्जिद, मोडासा, अजमेर दरगाह शरीफ और समझौता एक्सप्रेस आदि बम विस्फोट मामलों में जिन मुस्लिम नौजवानों को पुलिस, एटीएस और दीगर जांच एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था, बाद में वे बेकसूर निकले। उन पर दहशतगर्दी के लगाए गए सभी इल्जाम अदालत में झूठे साबित हुए। पुलिस, एटीएस और जांच एजेंसियों ने जिस झूठ की बुनियाद पर यह केस रचे-बुने थे, वह अदालत में आखिरकार कमजोर निकले। मक्का बम विस्फोट मामले की तरह ही महाराष्ट्र के मालेगांव में साल 2006 और 2008 में हुए बम विस्फोटों के मामले में भी बड़ी तादाद में मुस्लिम नौजवान पुलिसिया हिंसा और पक्षपात के शिकार हुए। जयपुर बम विस्फोट में डॉ. अबरार व अनवार और हैदराबाद में 22 मुस्लिम नौजवानों को मक्का बम विस्फोट का गुनहगार बतलाकर पहले आठ-दस महीने जेल में रखा गया। और फिर बाद में छोड़ दिया गया। इन घटनाओं से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय मुसलमान देश में किन मानसिक हालातों से गुजर रहे हैं।
जब भी देश में कहीं बम विस्फोट या आतंकी हमला होता है, तो पुलिस और खुफिया जांच एजेंसियां अपनी नाकामी छिपाने के लिए बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को इन आतंकी घटनाओं का जिम्मेदार बतलाते हुए गिरफ्तार कर लेती हैं। ऐसी एक नहीं, दर्जनों मिसाल हैं, जिनमें बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को दहशतगर्द बतलाकर पकड़ा गया और मीडिया ने बिना किसी छानबीन और पड़ताल के पुलिस और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट पर आंख मूंदकर यकीन कर लिया। फर्जी सबूतों, यातना देकर हासिल कबूलनामों और वायदा माफ गवाहों के सहारे इन नौजवानों के खिलाफ ऐसे मनगढ़ंत किस्से गढ़े जाते हैं कि अदालतें तक गच्चा खा जाती हैं। गुजरात में बीते एक दशक में आतंकविरोधी दस्ते का ना सिर्फ बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ पूरी राज्य मशीनरी का भी इस्तेमाल किया। गुजरात में आज भी ऐसे सैंकड़ों मुसलमान मिल जाएंगे, जो झूठे मामलों में सालों से जेल में बंद हैं। कई मामलों में तो अभी अदालत में सुनवाई भी पूरी नहीं हुई है।
जेल के स्याह अंधेरे कोनों में पूरे दस साल गुजारने वाले यह मुस्लिम नौजवान उस बदकिस्मत घड़ी को शायद ही कभी भूल पाएं, जब गुजरात पुलिस ने अक्षरधाम मंदिर मामले में इन्हें हमले का दोषी ठहराते हुए गिरफ्तार किया था। ये नौजवान दस साल जेल में बिताने के बाद आज भले ही छूट गए हों, लेकिन इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा कैसे वापिस लौटेगी, जो उनकी एक गिरफ्तारी से चूर-चूर हो गई ? उनके परिवार ने समाज में जो अपमान, लांछन झेला क्या उसकी भरपाई मुमकिन है ? किसी जांच एजेंसी या पुलिस द्वारा बेकसूर नागरिकों को दहशतगर्दी के मामले में फंसाने से ज्यादा गंभीर अपराध कोई दूसरा नहीं हो सकता। क्योंकि, महज एक गिरफ्तारी पूरे समाज में उसकी छवि बदलकर रख देती है। यह गिरफ्तारी उसकी इज्जत, पैसा और पेशा गोया कि सब कुछ छीन लेती है। दहशतगर्दी के इल्जाम के चलते उसका पूरा परिवार समाज में जो कुछ सहता-भोगता है, वह अलग।
अदालतों और मानवाधिकार संगठनों के तमाम आदेशों और नसीहतों के बाद भी देश में अब तक कभी किसी सरकार ने अपनी यह जिम्मेदारी नहीं समझी है कि उसकी एजेंसियों की गलती से जिन लोगों को शारीरिक, मानसिक यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं, जेल में रहना पड़ा, माली नुक्सान हुआ, प्रतिष्ठा पर आंच आई उसकी क्षतिपूर्ति की जाए। उनसे माफी मांगी जाए, उनके साथ जो जुल्म हुआ उसका मुआवजा मिले। इंसाफ का तकाजा तो यह कहता है कि न सिर्फ इन नौजवानों को माफी व मुआवजा मिलना चाहिए, बल्कि जिन अधिकारियों की गलती की वजह से इन नागरिकों को समाज में बेवजह नुकसान उठाना पड़ा, उनकी जबावदेही तय की जाए। बेगुनाह लोगों को झूठे सबूतों की बिना पर फंसाने वालों को भी हर हाल में सजा मिलनी चाहिए। ताकि, आईंदा इस तरह की इंसानियत मुखालिफ कार्यवाही बार-बार अंजाम न लें।


