उज्ज्वल भट्टाचार्या
हिंदी से मेरा मतलब हमेशा हिंदी भाषा से होता है, न तो देवनागरी लिपि और न ही भारतीय के पर्यायवाची के रूप में। यूँ कहा जाय कि भारत में भौगोलिक रूप से सर्वाधिक फैली हुई और संप्रेषण की संभावना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषा।

जर्मनी में भारतीय भाषाओं के साहित्य पर विभिन्न संगोष्ठियों में एक सवाल बार-बार उभरकर सामने आया है- क्या कोई एक भारतीय साहित्य है या कई भारतीय साहित्य हैं ? इस विमर्श में बड़े-बड़े भारतीय लेखक भाग ले चुके हैं, अलग-अलग प्रकार की राय सामने आ चुकी है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाया हूँ। बहरहाल, कुछ एक बातें मेरे मन में उभरी हैं, जिन्हें यहाँ रखने की कोशिश कर रहा हूँ।

पहली बात तो यह है कि इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिये इसे भाषाई राजनीति से अलग रखकर सिर्फ़ एक बौद्धिक व साहित्यिक प्रश्न के रूप में देखना होगा। कई उत्तर सामने आयेंगे और मेरी राय में किसी एक उत्तर पर न अड़ना ही बेहतर है। ऐसे प्रश्नों का जवाब एक लंबी प्रक्रिया के तहत इतिहास से मिलता है, किसी कमेटी द्वारा पारित प्रस्ताव से नहीं। बहस के ज़रिये हम सिर्फ़ विमर्श को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं।

मैं बहुलता के साथ-साथ अनेकता शब्द का भी पक्षधर हूँ। इसकी वजह यह है कि अनेकता शब्द एकता का नकारात्मक भी है। भारत में साहित्य की अनेकता सिर्फ़ भाषाई सीमाओं के कारण ही नहीं है, बल्कि एक भाषा में भी हमें सिर्फ़ विषय आधारित ही नहीं, बल्कि भूगोल, संस्कृति और परंपरा आधारित भिन्नता भी दिखाई देती है। मैला आंचल और एक चादर मैली सी के बीच भिन्नता को मैं इस श्रेणी में रखना चाहूँगा। ये दोनों दो अलग-अलग भूगोल की कृतियाँ हैं।

अपने जीवन में मुझे बांगला और हिंदी के संदर्भ में इस भिन्नता का अनुभव हुआ है। मेरे सीने में एक बांगला और एक हिंदी दिल धड़कता है। हिंदी के अलावा मैं किसी भी भाषा में स्वच्छंद रूप से नहीं लिख पाता हूँ। लेकिन बांगला मेरी पहली भाषा है, मैंने बांगला साहित्य की कहीं अधिक किताबें पढ़ी हैं, मैं बांगला में सोचता हूँ। दिलचस्प बात यह है कि अपनी बंगाली पहचान के साथ मैंने हिंदी लेखकों और हिंदी साहित्य जगत के साथ हमेशा एक दूरी महसूस की है, भले ही मैं हमेशा बनारसी होने का दावा करता रहूँ। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि बांगला के लेखकों और बांगला साहित्य जगत के साथ दूरी का अहसास कहीं अधिक रहा है। इसके साथ ही, दोनों जगत में मैं अपने आपको घुला-मिला पाता हूँ, वे मुझे पराये नहीं, आत्मीय लगते हैं। मुझे अगर दोनों में से किसी एक को चुनने के लिये मजबूर किया जाय तो मेरी पहचान दो टुकड़ों में बंटकर ख़त्म हो जाएगी। अगर यह फ़रमान दे दिया जाय कि दो टुकड़े हैं ही नहीं तो मैं सहमत नहीं हो पाऊँगा, क्योंकि मैं हर पल उन टुकड़ों को, उनके बीच अंतर को महसूस करता रहा हूँ।

दक्षिण भारत के लेखकों के साथ भी यह बात मैंने महसूस की है। सिर्फ़ लेखकों से बातचीत में ही नहीं, दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान आम लोगों से बातचीत में भी। उनके मुहावरे, उनकी मानसिकता, उनके चुटकुले लगभग बुनियादी रूप से मुझसे अलग हैं। और इसके बावजूद एक व्यापक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और परंपरागत समझ के आधार पर हम एक हैं। ज्योंही हम अपनी भिन्नताओं, अपने अंतरों को नकारने की ज़िद करने लगते हैं, हमारी एकता पर सवालिया निशान लग जाता है।

इन सवालों को साहित्य के धरातल पर लाते हुए शायद कहा जा सकता है - हाँ, एक भारतीय साहित्य है। विभिन्न धाराओं से जुड़कर बनी यह एक संयुक्त धारा है, लेकिन इस संयुक्त धारा में विभिन्न धाराओं का स्वतंत्र अस्तित्व भी बना हुआ है। यह धारा ऐसी ही बनी रहेगी, चाहे हम मानें या न मानें। अगर हम मान लें तो यह हमारी समझ के लिये बेहतर है।

उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।