मोदियापा हिन्दुत्व नहीं, सरासर कॉरपोरेट लाबिइंग है और उससे भी ज्यादा जायनी अमेरिकापरस्ती
किस सर्वनाशी, आत्मध्वंसी गृहयुद्ध के कगार पर हमारा यह मंत्रोच्चार ओ3म मोद्याय सर्वम् स्वाहा?
पलाश विश्वास
मामला हिन्दुत्व का अब नहीं है। हिन्दुत्व की लड़ाई है ही नहीं। सही मायने में मामला अब अमेरिकापरस्ती का भी नहीं है।
मामला है कॉरपोरेट साम्राज्यवादी कॉरपोरेट एकाधिकारी वर्णवर्चस्वी जायनी युद्धक अमेरिकापरस्ती का या सर्वभूताय मोदी और उसकी तीखी प्रतिक्रिया में हो रही भयंकर ध्रुवीकरण का, जिससे लोकतंत्र और लोकगणराज्य के साथ ही जिस हिन्दुत्व के नाम यह लड़ाई लड़ी जा रही है, उसके कॉरपोरेट विध्वंसक कायाकल्प का।
नमोमुखे समस्त असम्मतों को भारतविरोधी राष्ट्रद्रोही फतवा अब मोदियाये अस्मिता सर्वस्व सर्वस्वहारा भारतीयों का भाषाविज्ञान और सौंदर्यशास्त्र है। उनके अलंकार और छंदबद्ध घृणा अभियान और उसी तर्ज पर अहिंदू तोपंदाजी इस देश की एकता और अखंडता के लिये अभूत पूर्व संकट है और न आपके पास कोई इंदिरा हैं और न अटल बिहारी वाजपेयी, जो इस संकटमध्ये देश को नेतृत्व दें।
यक्षप्रश्न यह है कि निर्विकल्प इस महाभारती जनसंहारी राजसूयी जनादेश प्रतिरोधे क्या माओप्रभावित सलवा जुड़ुम अचलों की तरह मतदाताओं के सामने नोटा के अलावा कोई विकल्प है या नहीं।
हम किन्हें चुनने जा रहे हैं ?
नमोमयभारत के लिये नमोपा जिस तेजी से सर्वभूतेषु मोदी और हर हर मोदी का जाप कर रही है और उसके जवाब में जो अल्लाहो अकबर की प्रतिध्वनियां गूंज रही हैं, ये हालात इक्कीसवीं सदी से हमें मध्ययुग के अंधकारी ब्लैकहोल में स्थानांतरित करने जा रहे हैं। अब कयामत कोई बाकी नहीं है।
हम भाजपा के लोकतांत्रिक प्रक्रिया मार्फत सत्ता में आने के विरुद्ध नहीं हैं और न हम असहमत होने के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित करने के पक्ष में हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा भी बाकी विचारधाराओं की तरह इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहेगी, इससे भी इंकार नहीं है। लेकिन यह कैसी हिन्दुत्व सेना है जो हिन्दुत्व, भाजपा और संघ परिवार के साथ भारत राष्ट्र को ही यज्ञअधीश्वर विष्णुपरिवर्ते मोद्याय ओ3म स्वाहा कर रहा है? इस सनातन श्राद्धकर्म से किसकी आत्मा की प्रेतमुक्ति संभव है,हम नही जानते।
नमूना देख लीजिये।
'या मोदी सर्वभूतेषु, राष्ट्ररूपेण संस्थित:, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:'
इस मंत्रजाप से महिषासुर मर्दिनी मिथक के असली जनसंहारी तात्पर्य का खुलासा भी हो जाता है।
चरित्र से नस्ली इस मंत्र के उच्चारण से नस्ली वर्चस्व की धारावाहिकता की शपथ ले रही है नमोवाहिनी, जिसके तार सीधे उस अमेरिकाविरोधी जायनी नस्ली लंपटक्रोनी वित्तीयपंजी के कॉरपोरेट युद्धक साम्राज्यवाद से जुड़ते हैं और जो समूची एशिया ही नहीं, बाकी दुनिया को भी परमाणु विध्वंस की कगार तक पहुंचा देते हैं।
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्तुतिगान में कार्यकर्ताओं द्वारा लगाये जा रहे ‘हर-हर मोदी’ के नारों का इस्तेमाल रोकने की गुजारिश के बाद अब वाराणसी में मां दुर्गा से जुड़े एक श्लोक का भी मोदीकरण कर दिया गया है। भाजपा साहित्य एवं प्रकाशन प्रकोष्ठ द्वारा जारी एक पोस्टर में मां दुर्गा की पूजा करते वक्त पढ़े जाने वाले श्लोक को वाराणसी से चुनाव लड़ रहे मोदी के माफिक बनाने की कोशिश की गयी है।
मोदी की तस्वीर वाले पोस्टर में नवरात्रि के आगमन की बधाई देते हुए लिखा है ‘‘या मोदी सर्वभूतेषु राष्ट्ररूपेण संस्थित:, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नम:।’’ विशेषज्ञों के मुताबिक मां दुर्गा के लिये पढ़े जाना वाला श्लोक ‘‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थित: नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नम:’’ है, जबकि मोदी के समर्थकों द्वारा गढ़े गये श्लोक का शाब्दिक अर्थ है..‘‘मोदी जो राष्ट्र के रूप में हर मनुष्य में निवास करते हैं। उन्हें बार-बार नमन।’’
भारत को अमेरिका बनाने की मैराथन दौड़ इस वक्त की भारतीय संसदीय राजनीति है। कांग्रेस और भाजपा क्या, इस देश के संसदीय वामपंथी भी औद्योगीकरण और शहरीकरण के जरिये देहाती देश का कायाकल्प करना चाहते हैं। नंदीग्राम और सिंगुर इसके सबूत हैं। इस अमेरिकापरस्त राजनीति की खासियत यह है कि अमेरिकी कॉरपोरेट साम्राज्यवाद का अंध अनुसरण करते हुए अमेरिकी लोकतांत्रिक परंपराओं की सिरे से अनदेखी करने में ये लोग चूकते नहीं हैं।
हमारे मित्र एचएल दुसाध दावा करते हैं कि अमेरिका महाशक्ति अकेला इसलिये बना रहा क्योंकि वहां डायवर्सिटी लागू है। यानी सबके लिये समान अवसर और संसाधनों का बंटवारा। संसाधनों के बंटवारे की बात तो किसी पूंजीवादी व्यवस्था में एकदम असंभव है और तथ्य से परे हैं।
शायद अवसरों के लिये न्याय वहां भी नहीं है। लेकिन नागरिकों की संप्रभुता के मामले में नागरिकों के सशक्तीकरण के मामले में और दुनिया भर में एकाधिकारवादी साम्राज्यवाद की खूंखार एक ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का इजारेदार होने के बावजूद अमेरिका में आखिरकार सरकार और संसद आम नागरिकों के प्रति करदाताओं के प्रति, मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है।
अगर दुसाध जी की डायवर्सिटी का तात्पर्य इस आंतरिक लोकतंत्र से है, तो उन्हें गलत नहीं कहा जा सकता।
सबसे अहम बात जो है वह यह है कि दुनियाभर में नस्ली भेदभाव के विरुद्ध आजादी की लड़ाई अमेरिका ने लड़ी तो काम के घंटे तय करने की निर्णायक लड़ाई भी अमेरिका में लड़ी गयी। वहां श्रम कानून कितनी सख्ती से लागू है, देवयानी खोपड़ागड़े का मामला सामने है।
इसके अलावा वियतनाम युद्ध हो या इराक अफगानिस्तान युद्ध.युद्धविरोधी अमेरिकी जनमत ने हमेशा वैश्विक प्रतिरोध का नेतृत्व भी किया है।
हमारे साम्राज्यवाद विरोधी तमाम रंगबिरंगे तत्व तो विचारधारा जुगाली तक सीमाबद्ध रहे हैं और चरित्र ने नस्ली वर्चस्व और वर्णवर्चस्वी व्यवस्था बहाल रखने के लिये घनघोर सामंती तत्वों से साझा मोर्चा उनका भी भारतीय बहुसंख्य जनगण विरुद्धे हैं।
सबसे खास बात है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के बारे में सभी उम्मीदवारों को अपनी विदेश नीतियों, आर्थिक नीतियों, गृहनीतियों का खुलासा करना होता है। अमेरिकी मतदाता जिन नीतियों का समर्थन करते हैं, उन्हीं के मुताबिक मतदान की रुझान बनती है और जिसे बनाने में चुनाव अभियान के दौरान होने वाली बहसों और संबोधनों का खास महत्व होता है। इसके विपरीत भारत में चुनाव बिन मुद्दा नारों पर लड़ा जाता है। चुनाव घोषणापत्र रस्मी होते हैं और किसी उम्मीदवार को अपनी विचारधारा और नीतियों पर कोई कैफियत देनी नहीं होती।
अमेरिका में हर सरकारी फैसले और हर समझौते का संसदीय अनुमोदन ही नहीं, बाकायदा कानून बतौर पास होना भी अनिवार्य है। हमारे यहां कॉरपोरेट नीति निर्धारण हैं। असंवैधानिक कॉकस राजकाज चलाते हैं और संसद हाशिये पर मौन।
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति पर खास फोकस होता है गृहनीतियों और आर्थिक नीतियों की तरह। भारतीय चुनावों में आर्थिक नीतियों और मुद्दों पर खुलकर चर्चा नहीं होती। गृहनीतियों और आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य पर,रक्षा विषयक चर्चा भी नहीं होती और विदेश नीति का मामला पड़ोसी देशों को मवालियों की तरह मस्तानी चुनौतियां देना शामिल है।
समस्याओं का जिक्र करना ही मुद्दा नहीं होता, यह तमीज भी अपनी राजनीति को नहीं है। अमेरिकी चुनावों में समस्याओं को संबोधित करते हुए उनके समाधान पर संवाद तो करना अनिवार्य है ही, हर उम्मीदवार को तत्संबंधी परिकल्पना प्रस्तुत करनी होती है।
कॉरपोरेट साम्राज्यवादी अमेरिका ही अमेरिका नहीं है। रंगभेद के खिलाफ मोर्चाबंद युद्धविरोधी अमेरिकी जनमत को जाने बिना अपनी नस्ली वर्चस्वी व्यवस्था को बहाल रखने के लिये हम घृणा आधारित विदेश, गृह और अर्थनीतियों की बहाली और निरंतरता के लिये कॉरपोरेट जायनवादी साम्राज्यवादी विश्वव्यवस्था के साथ रणनीतिक गठबंधन करके अपनी आंतरिक वर्णवर्चस्वी सामंतशाही को ही मजबूत कर सकते हैं, अमेरिकी ऊंचाइयों को हरगिज छू नहीं सकते।
फिर नमो भारत की वैश्विक पारिपार्शिक पृष्ठभूमि पर फिर एकबार कवि अशोक कुमार कुमार पांडे जी के सौजन्य से अगला संवाद शुरु से पहले पाकिस्तानी कवियत्री की ये पंक्तियां हमें जरुर इस अखंड महादेश के जुझारु पुरखों की याद में अवश्य पढ़ लेनी चाहिए।
माफ करना रियाज भाई, आपका मेल देरी से मिला। पहले ही फेसबुक पर बहस की शुरुआत कर दी थी। लेकिन इस पाकिस्तानी कविता के लिये आपका आभार भी।
गौर करें कि कवियत्री फ़हमीदा रियाज़, पाकिस्तान ने नमो भारत को नया भारत नाम दिया है। नये भारत की जो तस्वीर बन रही है पास पड़ोस में बिना शत्रूभाव अटल नजरिये से उस पर भी गौर करें हमारे मोदीयाये देशवासी। पढ़ा जरूर, भले ही हमें नाम लिहाज से एके 47 की तुक से न मिला सकें तो पाकिस्तानी एजंट तो बता ही सकते हैं।
अटल जी के निष्पक्ष मूल्यांकन पर भी और उनको नेहरु इंदिरा से ऊपर के दर्जे में रखने के बावजूद मोदीयापे में लोग हमें पहले ही पाकिस्तानी, नक्सली वगैरह खिताब दे रहे हैं। ताज्जुब तो यह है कि अबकी दफा बांग्लादेश तमगा देना भूल रहे हैं।
हम भारतीय लोकतंत्र में बाकायदा एक राजनीतिक दल भाजपा की भूमिका और उनके घनघोर आलोचक हैं। हम हिंदू राष्ट्र के विरुद्ध हैं। लोकिन भाजपा का यह कॉरपोरेट नमोपा अवतार न केवल हिन्दुत्व के खिलाफ है बल्कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उच्च आदर्शों और मूल्यबोध के विरुद्ध भी है। मोदियापा हिन्दुत्व नहीं, सरासर कॉरपोरेट लाबिइंग है और उससे भी ज्यादा जायनी अमेरिकापरस्ती।
पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।