मजबूरों, मजलूमों की ल़ाई लड़ने वाले कप्तान को सलाम
मजबूरों, मजलूमों की ल़ाई लड़ने वाले कप्तान को सलाम
चंचल
कप्तान साहब नहीं रहे। यह बड़ी खबर है। अभी भाई शेष नारायण सिंह का फोन आ गया कि हम अलीगढ़ जा रहे हैं जहां कप्तान साहब ने आख़िरी सांस लिया। मन दुखी हो गया।
कैप्टन अब्बास अली, जिन्हें हम प्यार से कप्तान साहेब कहते हैं और वो हमें गले से लगा लेते थे। हम और हमारे जैसे अनगिनत लोग रहे हैं जो कप्तान साहब के घर में ही नहीं उनके दिल में बेहिचक उतर जाते थे। सियासत में उनका अपना मुकाम रहा। सुभाष चंद बोस के साथ रहे। फिर डॉ. लोहिया से जुड़े और आजीवन एक समाजवादी की जिंदगी जीते रहे। सादगी और करुणा उनकी स्थायी पूंजी थी जिसके सामने बड़े 'बड़ों' को झुकते देखा गया है। हमने उन्हें पहली बार फैजाबाद समाजवादी सम्मलेन में देखा और मिले। यह पहली मुलाकत मुलाकातों तक चलती रही। आख़िरी बार उनसे मुलाक़ात हुयी थी विट्ठल भाई पटेल के मावलंकर हाल में। वही प्यार वही आत्मीयता, वही जोश। वही रुआब। हमने छेड़ा- कैप्टन साहब आप बूढ़े नहीं होंगे। कप्तान साब ने हमें कंधे से पकड़ कर खींच लिया- बुढ़ापा सोच में आता है उम्र में नहीं। लेकिन तुम लोग बूढ़े हो रहे हो। कोई लड़ाई क्यों नहीं लड़ते ? क्या सारे मुद्दे जिन पर लड़ते रहे हो पूरे हो गए ? हमारे पास कोइ जवाब नहीं था। आज उनके जाने की खबर ने दिल के बड़े हिस्से को खाली कर दिया।
भाई कुर्बान अली ( उनके बेटे और हम लोगों के अजीज ) तुम अकेले नहीं हो। आज कैप्टन साब के जनाजे के लिए कई कंधे झुके हुए हैं। जिंदगी भर जो मजबूर थे, मजलूम थे, जलालत और जिल्लत की जिंदगी जीने के लिए मजबूर थे, उनकी लड़ाई लड़ने वाला कैप्टन जा रहा है। अवाम सलाम कर रही है कैप्टन साहब। आपको फूल अर्पित करता हूँ।


