मीडिया के मोदी
मीडिया के मोदी
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मुल्क अपने यहाँ चुनावों में मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। स्वतंत्र मीडिया के माध्यम से अपनी बात आम लोगों के बीच में पहुँचाते हैं। वहाँ की मीडिया निष्पक्ष तरीके से सभी लोगों की बात आम जनता तक पहुँचाने में अहम रोल निभाता है। भारत में भी जब से मीडिया का निजीकरण हुआ, मीडिया का दखल बढ़ गया है। चुनावों में तो मीडिया की सक्रियता देखने लायक होती है। पिछले लोकसभा के चुनावों में मोदी ने जिस प्रकार मीडिया प्रबन्धन किया उससे दूसरे दलों की आँखें फटी की फटी रह गयीं। मोदी मीडिया के कुशल प्रबन्धन के चलते दूसरे दलों से मीलों आगे निकल गये, फलतः परिणाम सबके सामने थे। बताया जाता है कि मोदी ने लोकसभा चुनावों में 1800 करोड़ रूपये केवल मीडिया प्रबन्धन पर खर्च किये। इसके अलावा जो उद्योगपति मोदी से जुड़े हुये थे, उनसे मीडिया को उपकृत कराकर अपने पक्ष में माहौल सृजित करने के लिये प्रबन्धन किया गया। फिर आरोपों का सिलसिला शुरू हुआ कि मोदी ने मीडिया को खरीद लिया था। खरीद फरोख्त इस देश की पहचान है, बल्कि कहा जाये कि खरीद फरोख्त किसी भी गरीब मुल्क की पहचान होती है, तो गलत नहीं है। भूख व्यक्ति को बेचने के लिये मजबूर करती है, सब आदर्श किनारे धरे रह जाते हैं। जिस देश में खरीद फरोख्त की संस्कृति पनप जाये तो फिर वहाँ पर खरीद फरोख्त का कोई मानक नहीं रहता है। कोई दो रूपये में खरीदा जाता है तो कहीं अरबों में सौदा पटता है। इस देश में सभी को पैसा चाहिये, पैसा केवल जीवन यापन के लिये नहीं बल्कि अम्बार लगाने के लिये भी चाहिये। पीढ़ी दर पीढ़ी खर्चे के लिये काम आये इस व्यवस्था में जुटे हुये हैं, इस मुल्क के लोग। मोदी का मीडिया प्रबन्धन जारी है। चुनावों में 1800 करोड़ का सौदा तय हुआ था, नया पैकेज कितने का है विरोधी दलों के रणनीतिकार खोज कर लायेंगे।
मोदी जब पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तब वह पॉपुलर नेता नहीं थे। गोधरा के कलंक से उन्हें एक धर्म के लोगों में लोकप्रियता हासिल हुई। गोधरा कांड का फायदा मोदी को अगले विधानसभा के चुनावों में मिला। सौभाग्यवश मोदी उस प्रान्त के मुख्यमंत्री बने जो देश का अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र है। गुजरात के लोग अमन पसन्द लोग हैं, वे व्यापारी हैं, व्यापारियों के निर्बाध व्यापार के लिये आवश्यक है कि शांति स्थापित रहे। गुजरात के मारवाड़ी व्यापारी पूरे देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैले हुये हैं। व्यापार जगत में उनकी धाक है। मोदी ने गुजरात में अर्जित की गयी उपलब्धियों का आधार बनाया, पूरे देश की मीडिया को इस्तेमाल कर प्रचार किया और देश के प्रधानमंत्री बन बैठे। प्रधानमंत्री मोदी यही नहीं रूके, अब उनमें अन्तर्राष्ट्रीय नेता बनने की ललक जाग गयी थी। वह अब रातोंरात अन्तर्राष्ट्रीय नेता बनना चाहते हैं, इसी क्रम में वह तमाम देशों की यात्रा कर चुके हैं जिन-जिन देशों में वह गये हैं उन-उन देशों में उन्होंने वहाँ की पार्लियामेंट एवं भारतीय समुदायों को सम्बोधित करने का कार्यक्रम अपने एजेण्डे में सबसे ऊपर रखा। मोदी के पास बोलने के लिये अभी कुछ भी नहीं है, सिर्फ घोषणायें हैं और वह भलीभाँति जानते हैं कि इन घोषणाओं के परिणाम सुखद नहीं रहने वाले हैं, इसलिये वह जल्दी में हैं। पूरे विश्व के अधिकांश देशों में जाकर अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटने का कार्यक्रम है उनका कि इससे पहले कि ढोल में पोल निकले वह अन्तर्राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित हो जायें। लेकिन मोदी को यह भी सोचना चाहिये कि देश के हिन्दुत्ववादी हिन्दुओं के लिये मोदी मजबूरी हो सकते हैं, किन्तु विदेशों के लोग बगैर किसी ठोस आधार के आपको नेता क्यों मानने लगे ? विदेश में यदि प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत हो रहा है तो इसकी वजह उनकी अपनी लोकप्रियता नहीं है, बल्कि वे लोग भारत को एक शक्ति के रूप में देख रहे हैं, इसलिये भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे हैं न कि मोदी का। प्रगल्भ आर0एस0एस0 के लोग यह भी कह सकते हैं कि भारत की पहचान एक शक्लिशाली देश के रूप में भाजपा ने बनाई है, तो वे झूठ बोल रहे हैं जिस प्रकार आर0एस0एस0 के लोग गला फाड़-फाड़कर देश में भ्रष्टाचार और तमाम खामियों के लिये कांग्रेस को कोस रहे हैं, उसी प्रकार यह श्रेय भी कांग्रेस के खाते में जायेगा। क्योंकि देश के पतन और उत्थान दोनों के लिये कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जाना न्यायोचित है।
प्रगल्भ मोदी बड़ी-बड़ी बातें मंचों से करते हैं। केवल योजनायें गिना देने से काम नहीं बनने वाला, सवा सौ करोड़ जनसंख्या वाले इस देश में इस प्रकार की योजनायें हमेशा ऊॅंट के मुँह में जीरा साबित हुई हैं। इन योजनाओं से भी कोई परिणाम नहीं आने वाले। देश जिस रफ्तार से चलता आया है उसी रफ्तार से चलेगा। सरकारी योजनाओं से कोई भी लाभान्वित नहीं होता, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में इतनी खामियाँ हैं कि वहाँ पर ऐसा दुष्चक्र बना हुआ है कि लाभार्थी अन्त में लुटा-पिटा, खड़ा हुआ, दूर से नजर आ जाता है। हो सकता है कि इन पाँच वर्षों में मोदी कारपोरेट जगत को कोई बड़ा फायदा पहुँचा दें (बजट एवं भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से लगता भी है यह) किन्तु आम जनता का भला नहीं होने वाला, आम जनता को लाभ पहुँचाने वाली कोई भी योजना दिखाई नहीं देती। हाँ, यह अवश्य है कि अब देश में गरीब नागरिकों को दो जून की रोटी मुहैइया हो जाती है (जिसका श्रेय मोदी नहीं ले सकते) किन्तु उन रोटियों पर न सब्जी है और न ही दाल। गरीब और अमीर के बीच की खाई विकराल रूप धारण कर रही है देश के राजनैतिज्ञ अनजान बने हुये हैं क्योंकि उनकी अपनी कोई सोच नहीं है। वे इस लायक कभी थे ही नहीं, कि उन्हें नेतृत्व प्रदान कर दिया जाता। कहीं जातिवाद का सहारा लेकर तो कभी साम्प्रदायिकता की बाजू पकड़कर, बाहुवलियों की मदद से, और पैसे को गरीब जनता में बाँट कर संसद, विधानसभाओं में पहुँचे हैं ये लोग। देश की मीडिया इनकी चेरी बन गया है देश की वर्तमान दुर्दशा के लिये यह चौथा स्तम्भ जिम्मेदार है जो केवल मार्केटिंग कर अपनी जेब भर रहा है इसके अपने कोई उसूल नहीं हैं। वजह, कि वह व्यवसायियों के हाथ की कठपुतली है। और मोदी जैसे नेताओं को वखूबी आता है कि व्यवसायियों का कैसे प्रबन्धन किया जाये। मोदी व उनकी पार्टी का गरीबों व किसानों से कभी कोई नाता ही नहीं रहा, अतः मोदी से समाज के दबे-कुचले, पिछडे वर्गों को कोई आशा नहीं रखनी चाहिये, उन्होंने अपने मतों के खजाने मोदी को लुटा दिये किन्तु उन्हें मोदी से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।
अनामदास


