एक तीर से मोदी ने कई निशाने साधे हैं
नई दिल्ली। दिल्ली सचिवालय में सीबीआई का छापा पड़ने पर देशकी राजनीति में तूफान आ गया है। इस छापे के बाद एक बार फिर राजनीति मोदी बनाम केजरीवाल करने की कोशिशें परवान चढ़ रही हैं।पूरे घटनाक्रम की पड़ताल कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र मिश्रा
दिल्ली सचिवालय में सीबीआई का छापा शुद्ध रूप से एक राजनीतिक कार्रवाई है। जिसे प्रधानमंत्री मोदी के इशारे पर अंजाम दिया गया है। यह छापा मोदी जी की बौखलाहट को दिखाता है। संसद सत्र सोची समझी दिशा में आगे नहीं बढ़ सका। मोदी जी ने अपना रंग भी बदला। और सोनिया गांधी के साथ चाय पर चर्चा भी की। बावजूद इसके संसद में बिलों की जगह विपक्ष भारी है। रही सही कसर नेशनल हेरल्ड के मामले ने पूरी कर दी। संसद की कार्यवाही से फायदा कम नुकसान ज्यादा दिख रहा था। ना चाहते हुए भी सोनिया और राहुल एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए थे। मोदी को अपने कांग्रेस मुक्त भारत का प्रोजेक्ट आंखों के सामने ढहता दिख रहा था। ऐसे में उन्हें ऐसा कुछ करना था जिससे लोगों का ध्यान संसद और गांधी परिवार दोनों से शिफ्ट किया जा सके। शायद किसी दूसरे मुख्यमंत्री के शासन वाले राज्य में सीबीआई का छापा पड़ता तो उतना बवाल नहीं मचता। इसलिए एक ऐसे क्षेत्र और नेता को चुना जाना जरूरी था जहां ज्यादा हंगामा हो सके। इस लिहाज से दिल्ली और अरविंद केजरीवाल सबसे फिट बैठते थे। इसमें मोदी को न तो राजेंद्र कुमार से कुछ लेना देना है और न ही उनके भ्रष्टाचार से। वह तो मोदी के लिए सिर्फ एक मोहरा भर हैं जिनके जरिये वह अरविंद केजरीवाल को बौखलाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
इस एक तीर से मोदी ने कई निशाने साधे हैं। इस दौर में तमाम मोर्चों पर हो रही अपनी नाकामी की चर्चाओं को विराम देना। पंजाब में दलितों के हाथ काटने से लेकर पार्टी के नेताओं के व्यवहार तक पर रोजाना संसद में हो रही सरकार की फजीहत से बचना। बिहार चुनाव की हार के बाद से पार्टी और सरकार में आई पस्तहिम्मती से उबरना। साथ ही पाक-साफ अरविंद केजरीवाल को भी भ्रष्टाचार के दाग से नवाज देना। और इन सबसे ज्यादा गांधी परिवार को किसी भी हालत में राजनीति के केंद्र में न आने देने का इरादा।
दरअसल मोदी को लगता है कि कांग्रेस को जड़ से खत्म करना है तो उसे गांधी परिवार की राजनीतिक साख को खत्म करना होगा। इसके लिए पहली शर्त ये है कि उन्हें बहस के केंद्र में न आने दिया जाए। ऐसी कोई स्थिति बने तो किसी दूसरे विपक्षी नेता को उसके विकल्प में खड़ा कर दिया जाए। क्योंकि कांग्रेस के मुकाबले उन नेताओं को खत्म करना ज्यादा आसान होगा। इस पूरी प्रक्रिया में खुद को भ्रष्टाचार के एक क्रुसेडर के तौर पर सबसे अलग खड़ा कर लेना। ये दिल्ली का गुजरात माडल है। पार्टी के भीतर लोगों को शंट करने के बाद अब बारी विपक्षी नेताओं की है। उसमें क्या ममता बनर्जी क्या वीरभद्र और क्या सोनिया गांधी और केजरीवाल। और इसके लिए सीबीआई से लेकर राज्यपाल तक सभी संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाएगा।
अगर सीबीआई का विरोधियों को निपटाने के लिए उसके बेजा इस्तेमाल पर सवाल उठ रहा है। तो अरविंद केजरीवाल भी कई सवालों के घेरे में हैं। राजेंद्र कुमार के भ्रष्टाचार के बारे में जानने के बावजूद उनका प्रधान सचिव बनाया जाना कितना जरूरी था? अगर आप सचमुच में ईमानदार हैं तो आपकी टीम भी ईमानदारों की ही होगी। आप चाहते हैं कि केंद्रीय मंत्रियों और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की जांच का अधिकार आपको मिल जाए। जैसा कि आपने अपने लोकपाल बिल में पारित कराया है। लेकिन सीबीआई आपके अफसरों की जांच न करे। दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकती हैं।
मोदी के काम करने का रवैया बेहद तानाशाहीपूर्ण है। सीबीआई के तोते के इस्तेमाल का रवैया उन्हें कांग्रेस से रत्ती भर भी अलग खड़ा नहीं करता। सहकारी संघवाद का नारा देने वाले मोदी संघीय ढांचे की न्यूनतम नैतिकता का भी पालन नहीं कर रहे हैं। यह आने वाले दिनों में भारत के संविधान और उसके संघीय ढांचे और राष्ट्र की एकता के लिहाज से बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। और तात्कालिक तौर पर मोदी जी को भले इससे कुछ लाभ मिल जाए। लेकिन लंबे समय में यह उनके लिए घातक साबित होगा। क्योंकि इससे विपक्ष बंटने की जगह और एकजुट होगा। और आने वाले दिनों में यह एकजुटता मोदी पर भारी पड़ सकती है।
महेंद्र मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार हैं।