केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद यहां पॉस्को विरोधी आंदोलन से भाजपा ने अपने आप को अलग कर लिया।
देश में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनते ही कारपोरेट-राज की स्थापना और तेज हो गयी। सत्ता में आते ही भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए देश का दरवाजा खोल दिया। बीमा क्षेत्र, रक्षा, रेलवे में 100 प्रतिशत एफडीआई लागू कर प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया का नारा दिया। विदेशी कंपनियों द्वारा पूर्व की कांग्रेस सरकार में जहां एमओयू पर दस्तखत हो चुके, उसे मोदी ने सत्ता में आते ही प्रोजेक्ट लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ मदद देने का उन कंपनियों को भरोसा दिया।
पिछले दिनों ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के ढिंकिया गाँव जाना हुआ। इस इलाके में दक्षिण कोरिया की पॉस्को कंपनी स्टील प्रोजेक्ट लगाने वाली है। इसके लिए 4004 एकड़ भूमि की जरूरत कंपनी को है। पॉस्को प्रोजेक्ट से सात गांव ढकिया, गोविंदपुर, नुआगांव, नुडियासाई, पोलांग, मुडिया पाडा, बायानड कंधा के 22 हजार ग्रामवासी प्रभावित हो रहे हैं। प्रोजेक्ट के लिए कुल मिलाकर 4004 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना था। लगातार जनआंदोलन के बाद पॉस्को के प्रबंधकों ने माना कि उन्हें केवल 2700 एकड़ की आवश्यकता है। जहां पॉस्को का प्रोजेक्ट लगना है वहां के लोगों का मुख्य पेशा पान, धान और काजु की खेती है। इसी खेती से इनकी जीविका चलती है। त्रासदी यह है कि पान की खेती जिन किसानों की है जमीन उनकी नहीं है। समुद्र किनारे की ये जमीन सरकारी है जिस पर लोग पान की खेती करते हैं।
गांव घूमने के दौरान देखा कि हर घर में एक दो काजू का पेड़ था। इससे भी इनकी जीविका चलती है। जिन लोगों के पास अपनी जमीन है, वहां धान की दो फसल वे उगाते हैं। पान की खेती से कम से कम एक परिवार को माह में दस हजार रूपये की आमदनी है। किसान आरती दास बताती हैं कि 100 फिट की जमीन में पान की खेती से माह में पचास हजार आमदनी होती है। यहां का पान मुंबई में लोगों के ओठ लाल करता है।
बताते चले कि जून 22, 2005 को सरकार नें पॉस्कों के साथ समझौता किया था। 11 जुलाई 2005 को पॉस्को विरोधी आंदोलन की नीव पड़ी, भुवनेश्वर में सभा हुई, गिरफ्तारियां भी हुईं। अब तक 2005 से 2014 के बीच 1565 लोगों पर 230 से अधिक मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं। लेकिन चालान पेश होने के बावजूद कोई भी ममाले में ट्रायल न्यायालय में शुरू नहीं हुया है। केवल आंदोलन के मुखिया पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के अध्यक्ष अभय साहू पर हत्या का फर्जी मुकदमा चलाया जा रहा है। अब तक अभय साहू पर 37 मुकदमे दर्ज हुए हैं। लगातार उनकी गिरफ्तारिया भी होती रही हैं। एक बार 12 अक्टूबर 2009 से 21 अगस्त 2010 तक 37 प्रकरणों मे जेल में रखा गया। 25 नवबंर 2011 से मार्च 2012 तक 14 प्रकरणों में जेल में रहे। 10 प्रकरणों में 12 मई 2013 से 30 नवंबर 2013 तक अभय साहू जेल मे रहे। पॉस्को विरोधी आंदोलन की खासियत यह है कि इस आंदोलन को उड़ीसा कीे सत्तारूढ बीजूजनता दल के अलावा सभी पार्टियों का समर्थन प्राप्त है।
यूँ तो अभय साहू कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय परिसद के सदस्य हैं। उनका बेटा भी ऑल इंडिया स्टुडेन्ट फेडरेशन का राज्य का सचिव है। सी.पी.आई. के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव एवं वरिष्ठ नेता ए.बी. वर्धन सदा आंदोलन क्षेत्र में आते रहे हैं। कामरेड डी. राजा तथा एनी राजा भी लगातार पॉस्को क्षेत्र का दौरा करती रही हैं। परन्तु आंदोलन को सभी दलो का सतत् समर्थन प्राप्त होता रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद यहां पॉस्को विरोधी आंदोलन से भाजपा ने अपने आप को अलग कर लिया।
आंदोलन के लोग बताते हैं कि केन्द्र में सत्ता में आने से पूर्व भाजपा की ओडि़सा इकाई आंदोलन का समर्थन करती रही है। अभी वर्तमान में ओडि़सा से केन्द्रीय मंत्री जुबेल ओराम ने मंत्री बनने के बाद भी आंदोलन का समर्थन किया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद पीएम ने कहा कि ओडि़सा में प्रस्तावित स्थल पर पॉस्को प्रोजेक्ट किसी भी कीमत पर लगेगा। इसके बाद ओडि़सा भाजपा के नेताओं के सुर बदल गये।
प्रोजेक्ट का भविष्य केवल भूमि अधिग्रहण पर निर्भर नही है, प्रोजेक्ट के लिए यदि खदानें नहीं मिल पाती तथा पारादीप पोर्ट के पास नया पोर्ट नहीं बन पाता तो प्रोजेक्ट कामयाब नही हो सकता है। वस्तुस्थिति यह है कि कई गांव के लोग मिलकर पारादीप के नजदिक पॉस्को पोर्ट बनाने का भी विरोध कर रहे है। पॉस्को आंदोलन की खासियत यह है कि यहां जिस जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है वह निजी जमीन नहीं है। वह शासकीय जमीन है जिस पर लंबे अरसे से ग्रामीण खेती करते आ रहे हैं। जो लोग आंदोलन को नहीं जानते उन्हें यह गलत फहमी है कि यह आंदोलन आदिवासियों की जमीन से संबंधित है। जबकि वास्तविकता यह है कि जहां ज्यादातर ग्रामीण पिछडी जातियों- खण्डाईत, चैसा, मछुआरा समाज, नुडिया जाति के हैं।
पॉस्को का भविष्य इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि खण्डाधार में प्रोजेक्ट को खदानें मिल पाती हैं कि नहीं। फिलहाल तो उम्मीद दिखती है कि खदान मिलना मुश्किल है लेकिन यदि मिल जाती है तब स्थिति अत्यंत गंभीर हो सकती है। पॉस्को पोर्ट का निर्माण होना भी कठिन दिखलाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में आंदोलन के चलते मित्तल कंपनी को भागना पड़ा, उसी तरह यदि कोरिया की कंपनी को भागना पड़ जाए तो कोई आश्चर्य नही होगा।
पॉस्को विरोधी आंदोलन को बल देने के लिए देश भर के 100 से ज्यादा संगठन विगत 29-30 नवंबर को ओडि़सा के जगतसिंहपुर जिले के ढि़किया के पटना गांव में जुटे। जल, जंगल, जमीन और जीविका के हक के लिए लोकतंत्र की रक्षा में जनआंदोलन का राष्ट्रीय सम्मलेन यहां हुआ। चार सौ से अधिक संघर्षशील लोगों ने विगत वर्षों के अनुभव, सरकारी दमन की स्थिति और खास तौर पर नई सरकार की कारपोरेट-हितैषी नीतियों के सन्दर्भ में भविष्य के रास्ते पर गहन विचार-विमर्श किया। पिछले दस सालों से चल रहे ऐतिहासिक पोस्को-विरोधी आंदोलन की कर्मभूमि ढिंकिया में हुए इस आयोजन का राजनैतिक महत्व यह है कि इस मौके पर सभी जमीनी आन्दोलनों ने राजनैतिक चेतना विकसित करने और परस्पर सामंजस्य पर बल दिया। इस अवसर पर एक साझा ढिंकिया संकल्प-पत्र का मसौदा पारित किया गया। जिसे और अधिक व्यापक स्तर चर्चा के लिए जारी किया गया है। पॉस्को के लिए सुन्दरगढ़ जिले के खंडाधार पर्वत से लौह अयस्क खुदाई के लिए अनुमति देने के बाद उस क्षेत्र में खंडाधार सुरक्षा समिति के नेतृत्व में स्थानीय आदिवासियों ने आंदोलन का बिगुल बजा दिया है। सबसे ज्यादा विदेशी पूंजी निवेश आकर्षित करने का नारा देकर केंद्र व राज्य सरकारो के द्वारा पॉस्को प्रोजेक्ट की स्थापना के खिलाफ जारी इस ऐतिहासिक संघर्ष को सम्मलेन ने पूर्ण समर्थन का ऐलान किया। ढिंकिया इलाके में जारी पोस्को प्लांट विरोधी संघर्ष एवं खंडाधार पर्वत क्षेत्र में शुरू खदान विरोधी आंदोलन की आवाज़ को भुवनेश्वर और दिल्ली के स्तर पर बुलंद करने का संकल्प सम्मलेन में लिया गया।
पास्को प्रोजेक्ट को क्रियान्वित करने के लिए जिस तरह पूर्व सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कंपनी दबाव बनाती थी उसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री के कोरिया दौरे के दौरान पोस्को कंपनी द्वारा दबाव बनाया गया। भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा यह ऐलान करना कि पोस्को प्रोजेक्ट के लिए सारे अवरोध खत्म किये जाएंगे। विगत दो दशकों से उदारीकरण के नाम पर देश के खनन क्षेत्रों में देशी-विदेशी कंपनियों को इजाजत देने के बाद देश भर के जनांदोलन इन गलत नीतियों के परिणाम स्वरूप प्राकृतिक संपदाओं की बेलगाम लूट का सवाल उठाते रहे हैं।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त शाह आयोग के द्वारा ओडिशा के अलावा दूसरे राज्यों में जारी खनन की व्यापक जांच के बाद इन्हें गैर-कानूनी पुष्ट किया तथा सी बी आई की जांच की सिफारिश भी की। इसी तरह सेन्ट्रल एमपावर्ड कमिटी (सी ई सी) ने भी गैर-कानूनी खदान का पुष्टिकरण करते हुए ठोस कारवाई करने का सुझाव दिया है. लेकिन चुनाव के समय भ्रष्टाचार के खिलाफ चिल्लाने वाली भाजपा की केंद्र सरकार शाह कमीशन की स्पष्ट सिफारिश के बावजूद सी बी आई जांच को लेकर चुप्पी साधे हुए है।
ओडिशा के जगतसिंहपुर के ढिंकिया से लौट कर विद्या सागर
विद्या सागर, पटना स्थित युवा पत्रकार हैं।