यह वाकई बिहार का अपमान है
यह वाकई बिहार का अपमान है
मेरे एक मित्र हैं जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है। उनकी राजनीतिक समझ टीवी समाचारों से बनती है। घर पर टाइम्स आफ इंडिया और जागरण मंगाते हैं। मुझे शक है कि इन्हें वह पढ़ते हैं भी नहीं ,जब भी उनके घर पर जाता हूं तो, ये अखबार ऐसे ही दिखते हैं, जैसे किसी ने पलट कर देखा भी नहीं। जाति से वह बाबू साहब हैं और काम से कारोबारी। उन्हें इस बात से तकलीफ है कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से समझौता कर जंगल राज में शामिल हो गए हैं। मेरे मित्र जंगल राज का मतलब नहीं समझते, फिर भी उन्होंने कहा कि इस बार नीतीश को जिताना चाहिए।
मैं चौंक गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में वह नरेंद्र मोदी के समर्थक थे। अब नीतीश के समर्थक हो गए।
बिहार के लोग भयंकर प्रोटोकोलवादी हैं। उनकी शिकाय़त है कि आरा के सरकारी आयोजन में बिहार के मुख्यमंत्री को मौजूद होना चाहिए था। उन्हें कौन समझाए कि अनेक मुख्यमंत्री अनेक प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में नहीं जाते। कहने को तो यह पथ निर्माण का कार्य़क्रम था। बिहार के पथनिर्माण मंत्री से अनेक लोगों को शिकायत है – मेरी भी है। पर आरा के समारोह में बिहार के पथ निर्माण मंत्री को मंच के बजाय, अखबारों के मुताबिक दूसरी या तीसरी कतार में जगह दे कर बिहार का अपमान ही किया गया।
बाकी सबको पता है कि नरेंद्र मोदी, बहैसियत प्रधानमंत्री हर प्रकार का प्रोटोकाल तोड़ते है। मेरी शुभकामना, अपने देश के असत्याचार्य के साथ है, पर मेरे अराजनीतिक मित्र में क्यों ख्याल आया कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए?
जुगनू शारदेय


