राहुल और मोदी : दोनों की पूंछ एक दूसरे के पैरों के नीचे दब गयी है
महेंद्र मिश्र
ये डील खुलेआम हुई है। पूरे देश की जनता के सामने हुई है। जनता की भावनाओं और उसके विश्वास के खिलाफ हुई है। ये डील देश पर सबसे ज्यादा दिनों तक शासन करने वाले दो मुख्य दलों और उनके मुखियाओं के बीच हुई है। ये एक ऐसे मौके पर हुई है जब संसद उसकी गौरव, गरिमा और साख दांव पर थी।

पूरे देश की निगाहें संसद, मोदी और राहुल पर टिकी थीं। एक तरफ संसद और जनता थी दूसरी तरफ सत्ता का अहंकार।
राहुल गांधी ने दूसरा रास्ता चुना और सदन चलने से ठीक पहले प्रधानमंत्री से मुलाकात कर समर्पण कर दिया। जनता और संसद ठगी की ठगी रह गयी। इसके साथ ही राहुल अपना भूचाल बम भूल गए।
क्या ये मुलाकात संसद चलाने के लिए नहीं हो सकती थी? क्या ये मुलाकात नोटबंदी और उससे आयी परेशानी पर बहस के लिए नहीं हो सकती थी? क्या ये मुलाकात तमाम समस्याओं से जूझ रही जनता के मुद्दों पर बातचीत के लिए नहीं हो सकती थी? लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष ने तब मिलना जरूरी नहीं समझा। पूरे सत्र के दौरान विपक्ष और संसद को ठेंगे पर रखने वाले मोदी जी को भी जब लगा कि अब उनकी कलई खुलने वाली है। और सालों-साल से ईमानदारी के ओढ़े झूठ के मुलम्मे का पर्दाफाश हो जाएगा, तब उन्होंने आनन-फानन में सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले राहुल से बैठक तय कर ली।
किसी को भी लग सकता है कि ये किसानों के मुद्दे पर बैठक थी लेकिन ये एक मासूम सोच से ज्यादा नहीं है।

कड़वा सच यही है कि इसकी आड़ में दोनों पक्षों के बीच देश के विश्वास का सौदा हुआ है।
इस बात की पूरी संभावना है कि राहुल ने 10 जनपथ के खिलाफ भविष्य में किसी मामले में किसी भी तरह की कार्रवाई न करने का भरोसा लिया हो। और उसके एवज में भूचाल बम न फोड़ने की समझ बनी हो।

वैसे भी अगर मोदीजी को पता चल गया कि सचमुच में इस तरह का कोई ‘विस्फोटक पदार्थ’ युवराज के पास है तो भविष्य में दस जनपथ के खिलाफ जाने के लिए उन्हें दस बार सोचना पड़ेगा।
दूसरे शब्दों में कहें तो दोनों की पूंछ एक दूसरे के पैरों के नीचे दब गयी है।
बहरहाल इससे राहुल गांधी ने भले ही अपने परिवार को संकट से उबार लिया हो, लेकिन ये उनके राजनीतिक नुकसान की कीमत पर हुआ है। इसकी भरपायी कर पाना बहुत मुश्किल है। उन्होंने विपक्षी एकता को एक ऐसे मौके पर चोट पहुंचायी है जब देश को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। लेकिन ये जनता के साथ विश्वासघात है।
वैसे भी भ्रष्टाचार को छुपाना अपने आप में बड़ा अपराध है और राहुल अगर देश के प्रधानमंत्री से जुड़े किसी भ्रष्टाचार को छुपा रहे हैं तो इसका मतलब है कि वो लोकतंत्र और देश की जनता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
सत्ता के हमले से जनता का बचाव करना विपक्ष की बुनियादी जिम्मेदारी होती है। लेकिन राहुल ने न सिर्फ जनता को पीठ दिखाने का काम किया बल्कि उल्टे सरकार के साथ खड़े हो गए।

राहुल को देश से माफी मांगनी चाहिए। क्योंकि उन्होंने पूरे देश के सामने इसका एक बार नहीं दो-दो बार ऐलान किया था।
दूसरी बार तो बाकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर किया था। मोदी ने केवल कांग्रेस को ही नहीं खुश किया। दूसरे विपक्ष दलों के लिए भी रियायतों का खजाना खोल दिया। उनके खातों में पुराने नोटों की शक्ल में जमा चंदे की जांच से छूट देकर उन्हें भी मालामाल कर दिया।
इसके साथ ही नोटबंदी से उनके ऊपर आए एक बड़े संकट से निजात मिल गई। अब देश के सारे कारपोरेट घरानों के पास ये मौका है कि वो अपनी पूरी काली कमाई इन राजनीतिक दलों के खातों में डाल दें। कारपोरेट भी खुश और राजनीतिक दल भी खुश।
कहां तो कहा जा रहा था कि नोटबंदी यूपी चुनाव में बीएसपी और एसपी की कमर तोड़ने के लिए की गई है। अब सरकार के इस फैसले से सबसे ज्यादा उन्हें ही लाभ होने जा रहा है। ऐसा लगता है कि संसद सत्र न चलने देने का सरकार ने विपक्षी पार्टियों को पुरस्कार दिया है।

विपक्षी दल भी एक दूसरे से इस तरह से अलग हो गए जैसे अब न लड़ाई रही और न ही उसकी जरूरत।
दूसरी मुलाकात जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। वो ममता बनर्जी और आरबीआई गर्वनर उर्जित पटेल के बीच की है। उसके बाद से मोदी की राजनीति को समाप्त कर देने का दिल्ली से लेकर पटना और कोलकाता की सड़कों पर दावा करने वाली दीदी के एक बोल नहीं फूटे हैं। उन्होंने बिल्कुल चुप्पी साध ली। आखिरकार उनके बीच क्या बात हुई। देश को इसको जानने का हक है।
ये मामला उतना आसान नहीं है।
ऊपर आप खेल करते रहिए और जनता हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी। नोटबंदी ने पूरे देश को अनिश्चित कालीन कतार में खड़ा कर दिया। 100 से ज्यादा जिंदगियां इसकी शिकार हो गयीं। हजारों शादियों को लोगों को रद्द करना पड़ा। इस फैसले से किस बड़े धन्नासेठ का दिल का दौरा पड़ा? किस बड़े आदमी के बेटी की शादी रूकी? सरकार ने जनता की एक-एक पाई का हिसाब लिया है। लोगों ने अपने बच्चों के गुल्लकों को तोड़कर बैंकों में पैसे डाला है महिलाओं को परिवार की इज्जत और सम्मान के मौके के लिए बचा कर रखे गए अपने पैसों को सार्वजनिक करना पड़ा है।

इसलिए हर पार्टी को अपने खातों में जमा पैसे को बताना होगा।
उनकी भी एक-एक पाई का हिसाब जानने का जनता का हक है। और अगर ये पार्टियां जनता के लिए बनी हैं तब तो यह जवाबदेही और बढ़ जाती है। बावजूद इसके अगर ये दल नहीं मानते हैं तो जनता को उनके बायकाट का नारा देना चाहिए।