राजीव नयन बहुगुणा

राहुल गांधी के लिए अपने पिता से अच्छा प्रेरक उदाहरण और कौन हो सकता है, जिनकी आज जयंती है। राजीव गांधी भी राजनीति में नौ सिखुआ थे, लेकिन शनैः शनैः उन्होंने स्वयं को रूपांतरित किया और भारतीय राजनीति एवं समाज के लिए अनेक श्लाघनीय उपक्रम किये।

चूंकि वह एक दुर्घटना के फलस्वरूप राजनीति में आये थे, अथवा लाये गए थे, अतः उनका पूर्वान्ह हास्यास्पद रहा। हम लोग शुरू में उनकी हरकतों पर हंसते थे। आत्म विश्वास की कमी और असुरक्षा बोध के कारण वह प्रारम्भ में अनुभवी राजनेताओं से कन्नी काटते थे, और उनके इर्द गिर्द मार तमाम हवाई जहाज़ के ड्राइवरों का जमघट लगा रहता था।

वह दून स्कूल के भूतपूर्व मूर्ख लड़कों से घिरे रहते थे, जिनमे से कईयों ने उन्हें कालांतर में धोका भी दिया। वैसे दून स्कूल या उस जैसे स्कूलों के ज़्यादातर लड़के मूर्ख ही होते हैं, क्योंकि वह समाज के जंगम विद्या पीठ से विलग, चहार दिवारी में कैद रहते हैं। लेकिन समय बीतते न बीतते राजीव गांधी ने स्वयं को सिद्ध किया। कभी "आ जाओ, आ जाओ, दो सीट बंगलोर, दो सीट बंगलूर", कहने वाला एक हवाई जहाज़ का ड्राइवर हमें कम्प्यूटर की सौगात दे गया, जो अपने युग से काफी आगे की बात थी।

उन्हें निबिड़ विनम्रता और एक पत्नी व्रत के लिए भी याद किया जाएगा। वह सोनिया माता के प्रति एक निष्ठ रहे। अन्यथा वह कामदेव की तरह सुंदर थे। सुबह दिल्ली तो शाम पेरिस में गुज़ारने वाले अर्द्ध शिक्षित ड्राइवर - कंडक्टरों की संगत वैसे भी बुरी होती है। उन्हें बिगड़ते देर नहीं लगती। मैं उन्हें जब भी याद करता हूँ, तो ईमानदारी से करता हूँ।

राजीव नयन बहुगुणा की फेसबुक टाइमलाइन से साभार