रोहित वेमुला का विवेकानंद और बाबा साहेब
बाबा विजयेंद्र
रोहित वेमुला पर बहस जारी है। मैं दिन भर इन्ही प्रहारों और प्रतिकारों में लगा रहा। संघ के सवर्ण स्वयंसेवक वेमुला की मौत पर दुबक सा गए थे। सामने आकर बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अपने किये अपराध को ढकने का उपाय खोजने में इन्होंने दो दिन खर्च किये। पीएम को थोडा अवश्य वक्त लग गया ? पीएम को प्याज खोजने में पांच दिन लग गए और बाद में किसी तरह रोना आया।

यह उनके लिए राष्ट्र-द्रोह होगा, क्योंकि इनका राष्ट्रवाद यही है
पर उन्होंने रोहित वेमुला की जन्म कुंडली, जात और जजवात सब खोज निकाला है। रोहित वेमुला दलित नहीं, पिछड़ा है, नक्सली और देशद्रोही है। याकूब का हितैषी है? रोहित वेमुला विवेकानंद से बाबा साहेब तक क्यों पहुंचा? । इसी तरह का बकबास हो रहा है। इसी बकबास के कारण हिन्दू- द्रोह घटित हो रहा है। स्वाभाविक है यह उनके लिए राष्ट्र-द्रोह होगा, क्योंकि इनका राष्ट्रवाद यही है।

ब्राह्मणवाद एक अभिशाप है इस धरती का
रोहित वेमुला शायद शुरुआती दिनों में विवेकानंद जैसे 'कन्फ्यूज्ड' बौद्धिक बाबा से जुड़े रहे होंगें? वैसे मैं भी तो कभी संघी था। इसका क्या मतलब? जब जागो तभी सवेरा! ‘ब्राह्मणवाद एक अभिशाप है इस धरती का', आज इस समझ के साथ खड़ा हूँ।
रोहित वेमुला की मौत के असली कारण बाबा साहेब हैं ? रोहित को डर था कि उनके बाबा साहेब को कोई सियासी बहेलिया हड़प नहीं ले। छात्रावास से बेदखली के वक्त केवल बाबा साहेब ही साथ थे। वह वेमुला का भावुक दृश्य था।
याकूब मेमन का मामला तो मजाक भर है। मुस्लिम- दलित का गठजोड़ पंडितों को बहुत डराता है। रोहित इनके भविष्य का भय था। क्योंकि वह ब्राह्मणवाद का प्राण कहाँ बसता है उस केंद्र को पहचानने लगा था। और वह अभिमन्यु की तरह षड्यंत्र का शिकार हो गया।
दलित को नक्सली और मुसलमान को आतंकवादी घोषित और साबित करने का सिलसिला फिर शुरू हो गया है।
दलित कभी मुस्लमान बनेंगे और आज के मुसलमान कल के दलित नहीं सवर्ण हिन्दू ही थे। मजबूत दलित मुस्लिम आक्रमणों को झेल लिया, जो नहीं झेल सका वह मुसलमान हो गए। इस्लाम स्वीकार करने में सवर्ण ही आगे रहे।
मुगलों के दरबार में बहन-बेटियां भेजने का काम कभी शूद्रों ने नहीं किया है और आज भी नहीं कर रहे हैं।

मुस्लिमों से 'लव' भी इनका और 'लव-जिहाद' भी इनका ?
दलित-अस्मिता में नकवी और शाहनवाज को दामाद नहीं बनाया जा सकता है।
पाखंडी अपने पाखण्ड को बखूबी समझता है।
दलितों और अल्पसंख्यकों का दर्द एक है। संभव है कि इन पसमांदा की पसंद एक हो।
मुझे भी इस राष्ट्र से बेपनाह मोहब्बत है। और इस देश को खोखला करने वालों के प्रति सख्त नफरत। चाहे वह सगा ही क्यों नहीं हो। झूठ, पाखंड, स्वर्ग-मोक्ष, मंदिर-मस्जिद, पंडित और मुल्ले, तावीज-तिजौरियां, अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता सब राष्ट्र-विघातक हैं।
मुझे कभी कभी अफ़सोस होता है जब विज्ञान पढ़ने वाला ब्राह्मण भी कुंडली और ताबीज बेचने में लग जाते हैं। ताबीज के बजाय तरकारी बेचते तो एक सन्देश भी जाता?
इस परजीविता में जीने वाला वर्ग ही राष्ट्र का दुश्मन है। दलित नेशन की बात ही नेशनलिज्म है। अभी भी आचरण आक्रांता वाला ही है तो इतिहासबोध भला क्यों नहीं हो। हिन्दू नेशन और दलित-नेशन तो क्रिया और प्रतिक्रिया है। आक्रांता अगर भारत में बस गए हैं

रोहित वेमुला जिन्दा है, जब तक सवाल जिन्दा है।
रोहित वेमुला जिन्दा है, जब तक सवाल जिन्दा है। विषमता जबतक और जहाँ जहाँ रहेगी वेमुला की मौजूदगी बनी रहेगी। रोहित वेमुला को विस्मृत करना आसान नहीं। रोहित वेमुला हर वाल पर हेडलाईन बना रहेगा।