शेष नारायण सिंह
अमरीका सहित अन्य यूरोपीय देशों की सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश एक नए और खतरनाक दौर में पहुँच गयी है। 25 मई को हेज़बोल्ला संगठन के मुखिया हसन नसरुल्ला ने ऐलान किया कि बशर अल-असद को राष्ट्रपति पद से हटाने की कोशिश को सफल नहीं होने दिया जायेगा। टेलिविज़न पर दिया गया हसन नसरुल्ला का यह भाषण पूरे लेबनान में देखा गया जिसमें उन्होंने कहा कि, “यह हमारी लड़ाई है और हम इसमें फतेह्याब होंगे। उन्होंने कहा कि अब युद्ध एक नए दौर में पहुँच गया है।” उधर यूरोपीय यूनियन ने सीरिया पर लागू हथियारों की पाबन्दी को हटा लिया है। हालाँकि सीरिया के ऊपर लगी हथियारों की पाबन्दी को हटाने का यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों नें विरोध किया लेकिन ब्रिटेन और नीदरलैंड्स जैसे देशों ने पाबन्दी को हटाने की जोरदार माँग की। इसका मतलब यह हुआ कि अब अमरीका के मित्र देश सीरिया के राष्ट्रपति को हटाने की मुहिम में लगी अधिकाँशतः सुन्नी लड़ाकुओं की जमात को जमकर हथियार देंगे। यूरोपीय यूनियन के मेम्बर कई देशों ने तो कहा कि इस बात की पूरी सम्भावना है कि अगर सीरियाई विद्रोहियों को हथियार दिये गये तो वे अल-कायदा के हाथों में पहुँच जायेंगे और उनका इस्तेमाल यूरोप और अमरीका के हितों के खिलाफ होगा लेकिन दमिश्क में अफगानिस्तान या इराक जैसी वफादार हुकूमत करने की जल्दी में अमरीका कुछ भी करने को तैयार नज़र आ रहा है। ब्रसेल्स में हुयी यूरोपीय यूनियन की बैठक में एक मुकाम पर तो यह तर्क दिया गया कि अगर पाबन्दी हटा ली गयी तो रूस और इरान सीरिया के राष्ट्रपति को खुले आम हथियार मुहैया करवाने लगेंगे लेकिन बात आयी गयी हो गयी क्योंकि स्वीडन के विदेशमन्त्री ने कहा कि यह दोनों देशों बशर अल असद को खूब हथियार दे चुके हैं। अब और अधिक हथियार देकर उनकी लड़ाई की ताक़त को नहीं बढ़ाया जा सकता, उससे उनका हथियारों का ज़खीरा ही मज़बूत होगा। हॉलैण्ड के विदेशमन्त्री फ़्रांस टिमरमैंस ने कहा कि हथियारों के निर्यात पर लगी पाबन्दी हटा ली गयी है। उन्होंने इस बात पर खुशी ज़ाहिर की कि बाकी आर्थिक पाबन्दियाँ बरकारार हैं। इसका मतलब यह नहीं कि यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश तुरन्त ही सीरिया के बागियों के लिये हथियार भेजना शुरू कर देंगे लेकिन यह बात मुकम्मल तौर पर सही है कि अब सीरिया पर कब्जे की लड़ाई में हथियारों की कमी नहीं रह जायेगी। आस्ट्रिया, चेक रिपब्लिक और स्वीडन ने सीरिया को हथियार भेजने का ज़बरदस्त विरोध किया। उनका कहना था कि सीरिया में जो विरोधी ताक़तें हैं उनके अलकायदा वालों से अच्छे सम्बन्ध हैं और जो हथियार बशर अल-असद के खिलाफ इस्तेमाल होने के लिये भेजे जायेंगे, वे धार्मिक आतंकवादियों के हाथों भी लग सकते हैं।

हेज़बोल्ला का सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होना और यूरोपीय यूनियन की हथियारों की सप्लाई के मद्देनज़र यह बात तय है कि यह लड़ाई अब बढ़ जायेगी। हेज़बोल्ला के शामिल होने के मतलब यह हैं कि लेबनान तो अब लड़ाई में शामिल ही हो गया है क्योंकि हेज़बोल्ला का मुख्यालय लेबनान में ही है और उस पर अभी इसी हफ्ते रॉकेट से हमला हो चुका है। हेज़बोल्ला और इरान में जो सम्बन्ध हैं उसके चलते इरान पूरी तरह से सीरिया की लड़ाई में शामिल है ही। क्योंकि अल्वी सम्प्रदाय के शिया बशर अल-असद को सीरिया के बहुमत वाले सुन्नी अवाम पर हुकूमत का अवसर उपलब्ध कराते रहना इरान की नीति का एक प्रमुख हिस्सा है। हेज़बोल्ला का खुले आम सीरिया की सरकार की मदद में आ जाना इस लड़ाई के लिये बहुत ही खतरनाक संकेत हैं। हालाँकि अभी भी हेज़बोल्ला के लड़ाके सीरिया की फौज के साथ बागियों के खिलाफ लड़ाई में शामिल हैं लेकिन औपचारिक रूप से इसका ऐलान नहीं किया जा रहा था। अब हसन नसरुल्ला के ऐलान के बाद तस्वीर बदल जायेगी। हसन नसरुल्ला के लिये बशर अल-असद की सत्ता को कायम रखना उनके अपने अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है। लेबनान में रहकर अपना अभियान चलाने वाले हेज़बोल्ला के लिये इरान के साथ सड़क मार्ग से सम्पर्क रखने का रास्ता सीरिया के अन्दर से ही है। अगर सीरिया पर किसी ऐसी सत्ता का कब्ज़ा हो गया जो अमरीका या अन्य यूरोपीय यूनियन सदस्यों के प्रति वफादार हुयी तो हेज़बोल्ला के लिये बहुत मुश्किल पेश आयेगी, उसका अपने सबसे बड़े समर्थक से सम्पर्क खत्म हो जायेगा। ऐसी हालत में असद के लिये तो दमिश्क की सत्ता पर काबिज रहना बहुत ही अहम है ही, हेज़बोल्ला के लिये भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

उधर अमरीका अपनी तिकड़म की विदेश नीति को लागू करने की योजना पर भी लगातार काम कर रहा है। पेरिस में अमरीकी विदेश मन्त्री जॉन केरी और रूस के विदेश मन्त्री सर्जेई लेवरोव के बीच एक मुलाक़ात हुयी है जिसमें अगले महीने जिनेवा में प्रस्तावित अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सम्मलेन के लिये समर्थन जुटाने की योजना पर बात हुयी है। इस सम्मलेन का एजेण्डा ही यह है कि बशर अल-असद को हटाकर किसी कठपुतली हुकूमत को सीरिया में कैसे बैठाया जाये। इस बातचीत में शामिल होने के लिये असद की सरकार तैयार है लेकिन सुन्नी प्रमुखता वाले विपक्ष के नेता अभी सलाह मशविरा कर रहे हैं।

सीरिया की आन्तरिक लड़ाई मार्च 2011 में शुरू हुयी थी और अब तक सत्तर हज़ार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं लेकिन अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है कि लड़ाई खत्म होने वाली है। कोई भी पक्ष अपनी पोजीशन से पीछे हटने को तैयार नहीं है। ताज़ा स्थिति यह है कि दमिश्क से समुद्र की तरफ जाने वाली सड़क के शहर कुसैर पर कब्जे के लिये घमासान युद्ध चल रहा है। सरकारी फौजों ने हेज़बोल्ला के लड़ाकों की मदद से हमीदिया कस्बे पर कब्जा कर लिया है और कुसैर की घेराबन्दी को मज़बूत कर लिया है। ऐसे माहौल में सीरिया की सरकारी फौजों के साथ हेज़बोल्ला का ऐलानियाँ शामिल होना इस युद्ध को एक क्षेत्रीय युद्ध बना सकता है। अभी सीरिया की लड़ाई मूल रूप से देश के बहुसंख्य सुन्नी और शासक शिया के बीच हक की लड़ाई है। दोनों पक्ष खिलाफ पार्टी की ताक़तों को बेझिझक क़त्ल कर रहे हैं। हेज़बोल्ला के शामिल होने के बाद सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का पलड़ा बहुत भारी हो जायेगा। लगता है कि इसी समर्थन के असर को कमज़ोर करने के उद्देश्य से यूरोपीय देशों ने अब सीरियाई बागियों को हथियार देने का फैसला किया है।

सीरिया के गृहयुद्ध का असर बाकी दुनिया पर तो कूटनीति के स्तर पर पड़ेगा लेकिन लेबनान में इस लड़ाई का सीधा असर पड़ने वाला है। लेबनान 1975 के बाद से अपने ही गृह युद्ध की आग में झुलस चुका है। 1990 के बाद से वहाँ थोड़ी शान्ति हुयी है। वहाँ की शिया, सुन्नी और ईसाई आबादी के बीच मौजूद बहुत ही नाज़ुक रिश्तों की बुनियाद पर टिकी लेबनान की शान्ति में हेज़बोल्ला के शिया शासक के पक्ष में ऐलानियाँ उतर जाने के बाद निश्चित रूप से बदलाव आयेगा। डर यह है कि यह बदलाव लेबनान में ही शिया-सुन्नी संघर्ष में न तब्दील हो जाये। वहाँ हेज़बोल्ला कहने को तो एक राजनीतिक जमात है लेकिन उसके पास फौज भी है और वह फौज लेबनान की सेना से भी भारी है। इसलिये हेज़बोल्ला का खुले आम सीरिया में शिया शासक के साथ शामिल होना लेबनान के अन्दर के शिया सुन्नी रिश्तों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। पश्चिम एशिया की राजनीति के जानकारों को मालूम है कि हेज़बोल्ला को लेबनान में कोई भी नहीं धमका सकता है। इसलिये जानकार आशँका जता रहे हैं कि अभी तक जो सीरिया के युद्धस्थल हैं वह आगे चल कर सीरिया और लेबनान का संयुक्त मैदान न बन जायें। लेबनान के सुन्नी लोग भी गुपचुप तरीके से सीरिया में बागियों की मदद में जाते रहे हैं। सीरिया के बागियों ने भी बार-बार हेज़बोल्ला को चेताया है कि अगर वह सीरिया में सुन्नियों के खिलाफ मोर्चे में शामिल होता है तो लड़ाई से फारिग होकर हेज़बोल्ला को भी निशाना बनाया जायेगा। इस सारी स्थिति का मतलब यह है कि इस क्षेत्र में जारी खूंखार युद्ध के भौगोलिक दायरे में वृद्धि के संकेत साफ नज़र आ रहे हैं। अभी मार्च में लेबनान के सुन्नी राजनेता और प्रधानमन्त्री नजीब मिकाती ने इस्तीफा दे दिया था। सबको मालूम है कि हेज़बोल्ला की मर्जी के खिलाफ जाकर लेबनान में किसी भी प्रधानमन्त्री का सत्ता में बने रहना असम्भव होता है खासकर तब जब कि सीमा के उस पार हेज़बोल्ला के लड़ाके सुन्नियों को चुन चुन कर मार रहे हों।

सीरिया में बगावत शुरू हुये दो साल हो गये हैं। अमरीका का दावा है कि उसने बागियों को हथियार नहीं दिया है। लेकिन अमरीकी नीति निर्धारक भी स्वीकार करते हैं उन्होंने सीरियाई बागियों को अन्य तरह से मदद दी है। इसका मतलब यह हुआ कि सीरिया के बागियों के पास जो हथियार हैं उसमें अमरीकी धन की भूमिका है। वैसे भी पूरे पश्चिम एशिया में अमरीका के मदद से बहुत सारे हथियार फैले पड़े हैं और वे हथियार सीरियाई बागियों के पास पहुँच रहे हैं। राष्ट्रपति ओबामा ने प्रकट रूप से अपने आपको अभी सीरिया के मामले से अलग रखा हुआ है। वे कहते हैं कि सरिया की लड़ाई में बहुत सारी पेचीदगियाँ हैं और उनमें फँसना खतरे से खाली नहीं। ओबामा का यह तर्क अब तक तो चल रहा था लेकिन अब खेल बदल चुका है। हेज़बोल्ला के ऐलानियाँ शामिल हो जाने के बाद सीरिया की लड़ाई को पश्चिम एशिया के अन्य देशों में जाने से कोई रोक नहीं सकता। ऐसी हालात में अमरीका का इस से बिलकुल बाहर रह पाना सम्भव नहीं रह जायेगा और अमरीका के शामिल होने के मतलब अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग सन्दर्भों में देखा जायेगा लेकिन एक बात तय है कि अमरीकी राजनीति और विदेश नीति को एक बार फिर बहुत ही भयानक परीक्षा के दौर से गुज़रना पड़ेगा।