विश्व हिंदी सम्मेलन- आग लगाने वाले दीप नहीं जलाते
विश्व हिंदी सम्मेलन- आग लगाने वाले दीप नहीं जलाते
विश्व हिंदी सम्मेलन विवादों में
खुद मोदी ने ' अटल बिहारी' की जगह बिहार को ज्यादा याद किया।
भोपाल। विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच से इस आयोजन को लेकर जिस तरह तारीफ के कसीदे पढ़े जा रहे थे, क्या यह आयोजन इस स्टार का था, यह सवाल खड़ा हो रहा है। जिस तरह इस सम्मेलन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, वह इससे पहले किसी भी सम्मेलन में नहीं हुए हैं। यह भाषा का आयोजन है, इसे शालीनता के साथ भी किया जा सकता था, जिससे कुछ गंभीर निचोड़ निकालकर सामने आता, पर यहां भव्यता पर ध्यान देने की कोशिश की गई, न कि गंभीरता पर, ऊपर से विचारधारा को भी थोपने का प्रयास किया गया, क्योंकि संघ हिंदी को अपने बपौती मानता है। ऐसे में यह पूरा आयोजन विवाद का केंद्र बनकर रह गया।
कैसे हुई विवाद की शुरुआत
विवाद की शुरुआत साहित्यकारों को यहाँ आमंत्रित न करने के साथ हुई। भोपाल और मध्य प्रदेश में हिंदी काफी समृद्ध है, कई बड़े साहित्यकार और पत्रकार यहाँ से हुए हैं, जिनकी पहचान और देश-विदेश में है, पर उनमें से अधिकांश को यहाँ आमंत्रित नहीं किया गया, क्योंकि उनकी विचारधारा अलग थी। इनमें से कई साहित्यकार तो पिछले हिंदी सम्मेलनों में भारत सरकार के आग्रह पर ही शिरकत भी कर चुके हैं। विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह ने शराब की टिप्पणी भी शायद इन्हीं साहित्यकारों पर की होगी, क्योंकि भाजपा के एक बड़े नेता मुख़्तार अब्बास नकवी ने कहा था, कि भाजपा तो गंगा है, जहाँ सभी पापियों के पाप धुल जाते हैं। यह बात उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनाव के समय कही थी, जब बाबूलाल कुशवाहा को भाजपा में शामिल करने पर विवाद शुरू हुआ था। हालाँकि ये गंगाधर आज जेल में है, पर इस लिहाज़ से संघ को गंगोत्री माना जा सकता है, जिसमें किसी प्रकार की कोई गंदगी नहीं है।
तो कुल मिलकर यह साफ हो गया, कि सिंह की टिप्पणी संघ या भाजपा से जुड़े विद्वानों के लिए नहीं थी। यह अलग बात है, जितने साहित्यकारों को यहाँ याद किया गया है, या जिनके स्थलों को जिनका नाम दिया गया है, उनमे से कोई भी शायद ही संघ से जुड़ा हो, यहाँ तक भाजपा के एक मात्र साहित्यकार अटल बिहारी बाजपाई तक उपेक्षा का शिकार नज़र आये। खुद मोदी ने 'बिहारी' की जगह बिहार को ज्यादा याद किया।
साफ हुआ सरकार साहित्कारों को भाषाविद तो नहीं मानती है
बहरहाल आयोजकों का साफ कहना था, कि आयोजन भाषा का है, साहित्य का नहीं। साफ है इसीलिए साहित्य को लेकर यहाँ कोई सत्र भी नहीं रखा गया है। ऐसे में साफ हुआ सरकार साहित्कारों को भाषाविद तो नहीं मानती है, पर अगले ही पल यह सवाल भी खड़ा हो गया तो फिर किसको मानती है, शायद माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के उन छात्रों को, या भाजपा के उन कार्यकर्ताओं को जिन्हे उन सत्रों में बैठाया गया, जहाँ पत्रकारों का जाना प्रतिबंधित था, या शायद उन हिंदी के शिक्षकों को, जिन्हे हर जिले से ढोकर लाने का ठेका जिला कलेक्टरों को दिया गया था। इन शिक्षकों के रुकने तक की कोई व्यवस्था आयोजकों ने नहीं की थी। हालत यह है, कि तीन दिन के लिए लाय गए ये शिक्षक भाषाविद पहले दिन ही भाग खड़े हुए।
अब सवाल यह भी है, कि क्या किसी भाषा के आयोजन के लिए इतनी भव्यता जरूरी थी, यह आयोजन गंभीर चिंतन के लिए था या दिखावे के लिए। असल में सब दिखावा था, व्यापमं में फंसे शिवराज सिंह अपनी आयोजन की ताकत दिखाना चाहते थे, इसीलिए आयोजन में मध्य प्रदेश की विकास गाथा की प्रदर्शनी भी लगाई गई है, जिसका भाषा से कोई लेना देना नहीं है, खुद शिवराज सिंह से अपने स्वागत भाषण में प्रदेश के विकास का गुणगान किया।
यह भी मज़ेदार है, कि आयोजन विदेश विभाग का है, उसके अधिकारी खुद यहाँ मेहमान बनकर आये, मध्य प्रदेश के जनसम्पर्क विभाग के पास पास बाँटने का काम था। पूरा आयोजन बीजेपी की प्रदेश इकाई ने किया। यहाँ तक कि मीडिया को जानकारी देने के लिए भी भाजपा के एक नेता को प्रभारी बना दिया गया, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं की बैठक लेकर उन्हें निर्देश दिए। विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी सभी जानकारी के लिए भाजपा नेताओं पर निर्भर थे। हालत यहाँ तक रही जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से पत्रकारों ने यहाँ की अव्यवस्थाओं के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, वे आयोजकों से पूछकर बताएँगे।
प्रधानमंत्री मोदी जो यहाँ हिंदी को विश्व की भाषा बनाने की बात कर रहे थे, उन्होंने भी इंग्लिश के कई शब्दों का प्रयोग किया। उद्धाटन के मंच पर मृदुला सिन्हा को छोड़कर किसी भी हिंदी के विद्वान को स्थान नहीं मिला, मृदुला सिन्हा को भी यह स्थान गोवा की राज्यपाल होने के कारण मिला। इन विद्वानों को मंच से बोलने का मौका भी नहीं मिला। प्रधानमंत्री के पिछले कार्यक्रमों में विभाग के सचिव को आभार प्रदर्शन का मौका तो मिल जाता था, यहाँ तो वह भी नहीं हुआ, आभार प्रदर्शन का काम वी के सिंह को दिया गया।
कुल मिलकर यह आयोजन गंभीर हो सकता था, पर मज़ाक बनकर रह गया। यह भी मज़ेदार है, कि वामपंथ या प्रगतिशीलता से पीछा छुड़ाने की कोशिश की गई, उसने आखिर तक पीछा नहीं छोड़ा। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से होने थी, उसके बाद वेद मन्त्रों का उच्चारण होना था, ये दोनों ही कार्यक्रम नहीं हुए. इसे भाजपा की प्रगतिशीलता की निशानी माना जाना चाहिए। हालाँकि हमारे एक मित्र साहित्यकार ने इस काफी तीखी टिप्पणी की है ' आग लगाने वाले दीप नहीं जलाते '.
भारत शर्मा


