कार्यक्रम के लिए नमभूमि को नुकसान पहुंचाया गया
जलीय पौधों और वनस्पतियों को भी मिटा दिया गया
नई दिल्ली। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा यमुना के खादर क्षेत्र में आयोजित विश्व संस्कृति उत्सव के कारण हुए पारिस्थितिकीय नुकसान का जायजा लेने के लिए गठित चार सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस क्षेत्र को मूल स्वरूप में लाने के लिए कम से कम 120 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इस कार्यक्रम का आयोजन श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग ने किया है।
प्रतिष्ठित समाचारपत्र देशबन्धु में प्रकाशित एक समाचार में बताया गया है कि समिति ने 21 फरवरी को एनजीटी में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में कहा है कि इस आयोजन के लिए यमुना खादर क्षेत्र के सभी प्राकृतिक वनस्पतियों को नष्ट कर दिया गया और इसका असर लंबे समय तक रहेगा। इस रिपोर्ट में कहा गया है,
"इस क्षेत्र से सभी प्राकृतिक वनस्पतियों को साफ कर दिया गया। वहां स्टील की छड़ों से मंच का निर्माण करने के लिए बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनों का प्रयोग किया गया और ढेर सारा मलबा यमुना नदी में डाल दिया गया।"

अब जमीन के अंदर नहीं जा पाएगा बारिश का पानी
इस विशेषज्ञ समिति का नेतृत्व जल संसाधन सचिव शशीम शेखर ने किया और उनके साथ आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर ए. के. गोसैन तथा प्रोफेशर सी. आर बाबू और प्रोफेसर बृज गोपाल ने स्थिति का जायजा लिया।
देशबन्धु में प्रकाशित एक समाचार के मुताबिक प्रो. बाबू ने बताया,

"वहां जमीन को समतल बनाने के लिए उसे दबा दिया गया। इसके कारण अब बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाएगा। इस कार्यक्रम के लिए नमभूमि को नुकसान पहुंचाया गया। साथ ही जलीय पौधों और वनस्पतियों को भी मिटा दिया गया।"

बाबू के मुताबिक अब इस क्षेत्र को पहले जैसी स्थिति में लाने के लिए कम से कम 120 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। उन्होंने कहा कि नियमों के मुताबिक जलमार्ग के समीप के 100 मीटर के क्षेत्र में किसी प्रकार की गतिविधि नहीं होनी चाहिए।
बाबू ने आगे कहा,

"चूंकि नुकसान हो चुका था इसलिए अंतिम समय को आयोजन को रोकने का कोई फायदा नहीं था। इसलिए हमने एनजीटी से कम से कम 120 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने की सिफारिश की थी।"