संघ-भाजपा की फासीवादी राजनीति से ‘संघ मुक्त भारत‘ जैसे नीतीश के नारों से नहीं निपटा जा सकता
संघ-भाजपा की फासीवादी राजनीति से ‘संघ मुक्त भारत‘ जैसे नीतीश के नारों से नहीं निपटा जा सकता
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
आइपीएफ विभिन्न आंदोलनों, संगठनों व समूहों का जहां एक तरफ जन राजनीतिक मोर्चा है वहीं यह अपने में भी एक संगठन है।
आइपीएफ को संयोजन से अधिक काम उन क्षेत्रों में केंद्रित करते हुए करना होगा जहां बदलाव की राजनीति बहुत कम प्रभावशाली है।
भारतवर्ष में कोई भी बदलाव किसानों के बड़े तबके को क्रांतिकारी राजनीतिक धारा में लाए बगैर संभव नहीं है। आइपीएफ को किसानों, बड़ी पूंजी की मार झेलने वाले छोटे मझोले व्यापारियों, गंभीर रोजगार का संकट झेलने वाले नौजवानों को अपने पक्ष में जीतना होगा।
दरअसल आइपीएफ को एक जन क्रांतिकारी पार्टी की भूमिका का निर्वहन करना बेहद जरूरी है। जो मोर्चे केवल विभिन्न दलों, व्यक्तियों, संगठनों के संयोजन के समूह हैं वह किसी बृहत्तर संयोजन में समाहित हो जायेंगे। लेकिन जिस अवधारणा पर आइपीएफ (रेडिकल) को खड़ा किया जा रहा है उसकी स्वतंत्र भूमिका बनी रहेगी और राजनीति और समाज के मुकम्मल लोकतंत्रीकरण तक की इसकी यात्रा जारी रहेगी।
हाल में हुए पांच राज्यों के चुनाव पर यह नोट किया गया कि अगर भारतीय जनता पार्टी जोड़-तोड़ कर असम में कांग्रेस से सत्ता छीन कर सरकार बना भी ले तो भी मोदी सरकार की साख में जो गिरावट हो रही है उसे भाजपा रोक पाने में सफल नहीं होगी।
केन्द्र सरकार की नीतियों के खिलाफ विक्षोभ और बढ़ेगा और इससे निपटने के लिए सरकार के पास कोई सकारात्मक कार्यक्रम नही हैं।
संघ के उन्मादी अभियान को सरकार अपने ढंग से समर्थन जारी रखेगी
इसलिए संघ के उन्मादी अभियान को सरकार अपने ढंग से समर्थन जारी रखेगी। कांग्रेस असम में अगर अपनी सरकार बरकरार रखती है तो कांग्रेसी अपने ढंग से राहुल का गुणगान करेंगे लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस जनता के ऊपर नया प्रभाव बनाने में सफल नहीं हो पा रही है। सब मिला जुला कर व्यवस्था का संकट लोगों के सामने खुल कर आ रहा है और इससे निपटने की क्षमता इन दलों में लोगों को नहीं दिखती है। इस चुनाव में बहस में वामपंथी खास तौर पर सीपीएम है और एक आम धारणा है कि वाम मोर्चा केरल में सरकार बनायेगा और पश्चिम बंगाल में भी उसका प्रदर्शन बेहतर होगा। सीपीएम-सीपीआई ने तमिलनाडु में भी प्रमुख द्रविड़ पार्टियों से हट कर छोटी ताकतों के साथ जो पीपुल्स वेलफेयर फ्रंट (जन कल्याण मोर्चा) बनाया है और विजयकांत की डीएमडीके व तमिला मनीला कांग्रेस ने उसके साथ जो महागठबंधन किया है, उसने तमिलनाडु की राजनीति में खास हलचल पैदा कर दी है। पश्चिम बंगाल में जरूर वाम मोर्चे ने जो कांग्रेस के साथ चुनावी समझदारी कायम की है और जिस तरह राहुल गांधी व बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक साथ मंच साझा किया है, जिसकी वामपंथियों के एक हिस्से में गहरी आलोचना व विरोध है। कुछ का कहना है कि सीपीएम सीपीआई की मूल स्थिति पर लौट आयेगी और कांग्रेस के साथ मोर्चाबद्ध हो जायेगी। सीपीएम अपनी 21 वीं पार्टी कांग्रेस (महाधिवेशन) की वाम दिशा को नकारेगी, इसकी कोई खास वजह नहीं दिखती है।
बहरहाल संघ-भाजपा की बहुसंख्यक आधारित फासीवादी राजनीति का जो खतरा है, वह गहरा है जिससे ‘संघ मुक्त भारत‘ जैसे नीतीश के नारों से नहीं निपटा जा सकता है। क्यांेकि जब तक इस देश में चल रही मौजूदा आर्थिक नीतियों की दिशा को नहीं पलटा
जाता, जैसे-तैसे अवसरवादी राजनीतिक समीकरण बना कर उसका मुकाबला करना संभव नहीं है। संघ की राजनीति और संस्कृति को परास्त करने के लिए बेहद जरूरी है कि किसानों को अपने पक्ष में जीता जाये। किसान, छोटे-मझोले व्यापारी और बेरोजगार-अर्द्ध बेरोजगार युवाओं की फौज से भाजपा की राजनीति को ताकत मिलती है और जब तक इन तबकों को बदलाव की राजनीति से नहीं जोड़ा जाता, भाजपा की बहुसंख्यक फासीवादी राजनीति को परास्त करना मुश्किल होगा। साथ ही ऊपर से थोपी जाने वाली संकीर्ण और विभाजनकारी संघ की यूरोपीय देशभक्ति की अवधारणा का जवाब बहुआयामी, जनता की मजबूत एकता पर आधारित 1857 का राष्ट्रवाद है। उसका बड़े स्तर पर प्रचार करने की जरूरत है।
युवाओं के रोजगार के सवाल को और मजबूती से उठाने की जरूरत है। इस संदर्भ में इलाहाबाद में चल रहे रोजगार अधिकार अभियान को आगे बढाने, बदायूं-सम्भल में चल रहे किसान आंदोलन खासकर किसानों की फसलों की गांव में खरीद, संरक्षण और वितरण के लिए कोआपरेटिव खड़ा करने और सोनभद्र के ओबरा में ठेका मजदूरों के नियमितीकरण और आदिवासियों समेत आम जनता के लिए सूखे से निपटने के लिए पानी, मनरेगा में काम, वन भूमि और उनके अधिकार जैसे मुद्दों को और गहरा करने की जरूरत है।
प्रदेश के अन्य जिलों में भी कामकाज को विस्तारित करने की जरूरत है। जून में पुणे में हो रही आइपीएफ केन्द्रीय वर्किंग कमेटी की बैठक में उत्तर प्रदेश के वर्किंग कमेटी सदस्यों को शरीक होना है।
(उत्तर प्रदेश के कुछ साथियों के साथ आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह की बातचीत)


