अशोक सेकसरिया नही रहे। यूं तो 'दिनमान' के दौर से ही उन्हें जानता था, लेकिन उनसे पहली मुलाकात कोलकाता के लार्ड सिन्हा रोड के उनके पैतृक निवास पर हुई थी। मेरे लिए सचमुच यह अकल्पनीय था कि उस विशालकाय रिहायशी हवेली के एक बरसातीनुमा कमरे में भौतिक सुख- सुविधाओं से दूर किसी सन्यासी की तरह वे रह रहे होंगें। यह बात वर्ष 2002 की फरवरी की है। पारिवारिक कारणों से उन दिनों मेरा कई कई हफ़्तों के लिए कोलकाता आने-जाने का सिलसिला था। संयोग से लार्ड सिन्हा रोड के निकट ही 'लैंडमार्क' का शोरूम था, किताबें आदि देखने-खरीदने के सिलसिले में प्रायः वहां जाना होता था। आते जाते मेरी निगाह एक-दो बार उनके घनी दाढ़ी वाले कुछ अलग से दीखते चेहरे पर टिकी भी थी लेकिन मैं उन्हें पहचानता न था।
मित्र कवि विनोद दास भी उन दिनों कोलकाता में ही थे। मेरी और उनकी रिहाईश पास पास थी। एक दिन अशोक सेकसरिया से मिलवाने वे मुझे उनके कमरे पर ले गए। पहली मुलाकात में ही वे इतने आत्मीय, सहृदय और सुपरिचित लगे कि किसी तरह की औपचारिकता की कोई गुन्जाइश ही न रही। अरुंधती रॉय, अलका सरावगी से लेकर जाने कितनी चर्चा हुयी। वे सचमुच अत्यंत अध्ययनशील और अद्यतन थे। अलका सरावगी के तो एक तरह से वे 'मेंटर' सरीखे ही थे।
उनके कमरे में न कोई टेलीविजन था न टेलीफोन। बस एक तखत था और टिन की एक कुर्सी, नीचे एक दरी बिछी रहती थी और किताबों की अलमारियां। संपर्क के लिए उस विशालकाय भवन के दूसरे हिस्से में सन्देश देना पड़ता था। उनका एक तरुण सहायक था जिसे वे पढ़ाते थे और वो मालिकाना रौब के साथ उनका ख्याल रखता था। और हम जैसे आगंतुकों के लिए स्टोव पर चाय-बिस्कुट की भी व्यवस्था करता था।
एक वैभवशाली हवेली में सचमुच वे सादगी की विरल प्रतिमूर्ति थे। गांधीवादी उद्योगपति हिन्दी-समाजसेवी पद्मभूषण सीताराम सेकसरिया के बेटे अशोक सेकसरिया इतने नैतिक और सैद्धांतिक थे कि अपने ही परिवार की संस्था भारतीय भाषा परिषद् के विरुद्ध कर्मचारियों के आन्दोलन के समर्थन में वे धरने पर भी बैठे थे और विरोधपत्र पर हस्ताक्षर भी किये थे। वे समाजवादी ही नहीं थे बल्कि समाजवाद जीते भी थे। सचमुच अशोक सेकसरिया अपने ढंग के अकेले बुद्दिजीवी थे, उन्हें अंतिम प्रणाम।
O- वीरेंद्र यादव
वीरेंद्र यादव, लेखक प्रख्यात आलोचक हैं।