दिव्यांशु पटेल

जबलपुर एक्सप्रेस के उस वातानुकूलित कोच में लगी पारम्परिक वेशभूषा में एक भील युवती की तस्वीर की तरफ बरबस ही ध्यान खिंचा जा रहा था, साथ बैठे अधेड़ उम्र के अफसरनुमा व्यक्तित्व वाले सहयात्री ने भी तस्वीर की तारीफ की तो बातचीत शुरू हो गयी जो धीरे धीरे आदिवासियों की हालत से निकल कर राजनैतिक परिदृश्य पर आकर टिक गयी। मैं मध्य प्रदेश से नहीं हूँ और मेरी सामाजिक पृष्ठभूमि से आश्वस्त हो लेने के बाद उन सज्जन ने बेहद सतही अंदाज में कहा- "देखो भाई घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो कैसे चलेगा, विकास चाहिए तो जंगल साफ़ करना ही पड़ेगा !" मेरे यह दिलाने पर कि आदिवासी और उनके अधिकारों का घोड़े या घास से कोई साम्य नहीं है बल्कि वह तो उन्हें बाकायदा संविधान के तहत प्राप्त हैं और बदलते निजामों के साथ संवैधानिक अधिकार तो नहीं बदल जाते, उन महोदय के मुंह का स्वाद कुछ कसैला जान पड़ा।

उन्होंने तपाक से कहा - "आपके हिसाब से तो फिर कोई काम होना ही नहीं चाहिए, ऐसे तो हो गया विकास, आपके लिए तो सरदार पटेल की मूर्ति भी नहीं बननी चाहिए होगी, क्यूँ ?" तब तक उन्हें बातों-बातों में मेरे उपनाम का पता चल चुका था इसलिए निशाना काफी सोच समझ कर तजुर्बे से लगाया गया था। यह सवाल मेरे लिए नया नहीं था, तकरीबन साल भर पहले इसी महीने में चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की मूर्ति स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी की तर्ज पर बनवाने की घोषणा की थी। यह किसी व्यक्ति की विरासत और विचारों को हड़पने का क्लासिक उदाहरण था जिसे राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबो कर मोदी पूरे देश में परोस रहे थे। जिन आदर्शों के साथ वल्लभभाई पटेल पूरे जीवन किसानों और अंतिम छोर पर खड़े आदमी के अधिकारों के लिए संघर्षशील रहे, उन्हीं की मूर्ति के लिए सैकड़ों आदिवासियों को विस्थापित कर देने में उनकी महानता किस तरह से बढ़ जाएगी अथवा जो व्यक्ति संविधान सभा में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और मूल अधिकार सम्बन्धी समितियों का अध्यक्ष रहते हुए अल्पसंख्यकों के हितो के लिए डटा रहा हो उसे तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करके हिंदुत्व समर्थक नेता के रूप में प्रस्तुत करना उनके व्यक्तित्व को किस तरह से सम्मान देगा,समझ से परे था। यहाँ यह सवाल बरबस ही उठता है कि संघ द्वारा तथ्यों की गलत व्याख्या का उद्देश्य केवल साम्प्रदायिकता बढ़ाना होता है ?

इसके जवाब के लिए हमें संघ द्वारा चुने जाने वाले व्यक्तित्वों की जातीय पृष्ठभूमि को जानना बहुत जरूरी हो जाता है। जातियों के साम्प्रदायिकरण करने के संघ की कोशिश के मिसाल के तौर पर सरदार पटेल और शिवाजी को देखा जा सकता है, दोनों ही कुर्मी/कुणबी जाति से ताल्लुक रखते हैं, जिसका महाराष्ट्र,गुजरात,मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड जैसे राज्यों में बड़ा वोट बैंक है। संघ के चिंतन में बस यही वोट बैंक होता है, जिसको हथियाने के लिए संघ अलग-अलग समुदायों के नायकों को हिन्दू रक्षक के रूप में पेश कर उनकी अपनी अलग पहचान को ख़त्म करने के प्रयास में सतत प्रयत्नशील रहता है। चुनाव के दौरान कुर्मी बाहुल्य क्षेत्रों में सरदार पटेल की मूर्ति को भावनात्मक रूप से वोट हासिल करने का जरिया बनाया गया, यह कदम इस लिहाज से भी जरूरी था क्यूंकि खुद नरेंद्र मोदी जिस वाराणसी सीट से चुनाव लड़ रहे थे वहां जीत हार तय करने में कुर्मी वोट निर्णायक संख्या में हैं। विकास की राजनीति का ढिंढोरा पीटने वालों के इस जातीय चरित्र और तिकड़म की व्याख्या को सुनकर निःसंदेह उन सज्जन को अच्छा तो नहीं लगा, मगर चाह कर भी वह तथ्यों को नकार न सके और एक अन्मयस्कता वाली चुप्पी साध ली। मगर यह किसी एक व्यक्ति की चुप्पी का सवाल नहीं है, इतिहास की जिस गलत व्याख्या के आधार पर समाज में जहर घोलने का काम देश में खुद को सांस्कृतिक कहने वाले संगठन और उसकी राजनीतिक इकाई के द्वारा लगातार किया जा रहा है, वह वाकई में चिंताजनक है।

आज देश में एक पूरी खेप तैयार हो चुकी है ऐसे लोगों कि जो यह मानते हैं कि सरदार पटेल कट्टर हिंदूवादी थे और मुसलमान विरोधी थे, यह धारणा कुछ वैसी ही है जैसे डॉ आंबेडकर को लगातार महज दलित नेता और मुसलमान विरोधी बता कर उनके व्यक्तित्व को सीमित करने का कुचक्र संघ द्वारा रचा गया। जिस दौर में लगातार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले बढ़ रहे हैं, संस्कृति के नाम पर तानाशाही थोपी जा रही है, ऐतिहासिक तथ्यों को साम्प्रदायिकता का मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है, आदिवासी हितों की अनदेखी करते हुए धड़ाधड़ प्रोजेक्ट पास हो रहे हैं, ऐसे नाजुक वक़्त में सरदार पटेल और उनके विचारों की जरूरत बढ़ जाती है, इस देश की एकता विविधता और असहमति के अधिकार में निहित है, जिसे सरदार पटेल ने जिंदगी भर संरक्षण दिया। ऐसे में यह मौजूदा दौर के बुद्धिजीवियों की भी अग्निपरीक्षा है कि वो अपनी आपस की लड़ाई में कहीं बैठे बिठाये गलत इतिहास बताने वालो के हाथो में पटेल,शिवाजी या आंबेडकर को सौंप तो नहीं रहे हैं ! क्यूंकि असल खतरा राजनैतिक सत्ता में कट्टरतावादियों के आने से नहीं, विचारों में जनमानस के कट्टर हो जाने से है।