सलाम इन्तिज़ार हुसैन साहिब
सलाम इन्तिज़ार हुसैन साहिब
प्रख्यात उर्दू कथाकार इन्तिज़ार हुसैन का इन्तिकाल
पाकिस्तान के अदब का बड़ा हिस्सा अपनी जमीन से उखड़ा हुआ रहा है। कहने को उसके मुल्क का नाम पाकिस्तान रहा, और ये लोग सिद्दत से इस कोशिश में भी रहे कि लाख बदहाली हो लेकिन अपने मुल्क पाकिस्तान को इन लोगों ने बेहुर्मत कभी नहीं किया, न ही बाहर किसी दूसरे के सामने जाकर यह भी नहीं कहे कि - हम शर्मिन्दा हैं कि इस मुल्क में जी रहे हैं, लेकिन इन्हें अपने वतन भारत ने कभी नहीं छोड़ा। तमीज़, तहज़ीब, अदब, रवायत में चलते-चलते इन्हें अपना मुल्क याद आ जाता, जिसे पड़ोस के लोग विदेश कहते पाये जाते।
एक सियासत और सियायत के बंटवारे के फैसले के अलावा दूसरी कोई वजह नहीं मिलती कि हम दो हैं।
कमबख्त जब इतिहास ही हमें गच्चा दे रहा हो तो और कौन बचा सकता है या साबित कर सकता है कि तुम दो हो, सिवाय तीन के- लन्दन का चर्चिल, सावरकर के लोग गुरु जी, और लियाकत के खेल का मोहरा जिन्ना। वरना एक का इतिहास मुअन जोदाड़ो और तक्षशिला से चलता है जो आज दूसरे मुल्क पाकिस्तान में है। सुना है इन दिनों एक साहब नमूदार हुए हैं वे बता रहे हैं कि तक्षशिला बिहार में आ गया है। और जब वे अपने तवारीख की तारीख बटोरने बैठते हैं तो उन्हें लालकिला, जामा मस्जिद, आगरा किला आना ही पड़ता है। कैसे कह दें कि यह उनके इतिहास से बाहर है। यह दोनों मुल्कों की जद्दो जेहद में जारी है।
पाकिस्तान की पाबंदिया कुछ ज्यादा ही कड़ी रहीं, इसके बावजूद वहाँ के अदब वाले, फनकार और कई सियासतदाँ भारत को अपने मन और मिजाज से खारिज नहीं कर पाये।
आज एक मजबूत पाया टूट गया। मन बहुत उदास है। आज उनका इंतकाल हुआ है। भाई अनिल जनविजय की पोस्ट से मालूम हुआ। इंतिजार हुसैन का इन्तिकाल।
इन्तिज़ार हुसैन हमारे पसंदीदा लेखक रहे हैं। फैज, मंटो, इब्ने इंशा और इन्तिज़ार हुसैन साहिब।
हमारा बहुत मन था उनकी किसी किताब का चित्रांकन करूँ। एक दिन मुराद पूरी हो गयी। उनकी एक किताब, ‘आगे समंदर है' के हिंदी तर्जुमा में छपी किताब की कवर डिजाइन हमने बनाया। आज के पाकिस्तान को जानना हो तो इस किताब को पढ़ना जरूरी होगा।
एक दिन पता चला कि इन्तिज़ार हुसैन को जवाहर लाल नेहरु फेलोशिप मिला है और वे दिल्ली में हैं। खोजते-खाजते मिल ही गए, फोन पर बात हुयी। जब हमने उन्हें यह बताया कि आपकी जो किताब आगे समंदर है, हिंदी में आयी है उसकी कवर डिजाइन हमने बनायी है। उधर से एक लंबी चुप्पी।
हमने सोचा फोन कट गया, हमने हैल्लो कहा। उधर से आवाज आयी - तुम्हारे बारे में पता किया, तुम चित्रकार बाद में हो गांधी को पसंद करते हो, समाजवादी हो, तुम्हारे चित्र ने हमे मुरीद बना दिया है। हम तुमसे मिलेंगे, आज तो हम बुलंद शहर के अपने गांव डिबाई को जा रहे हैं। लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पायी, जब वे दिल्ली लौटे तब हम सिलचर विश्वविद्यालय के इर्द गिर्द रहे और वहीं पर राज्यसभा चैनल पर भाई इरफ़ान के साथ इन्तिज़ार हुसैन साहिब को सुना। बेहद और बेबाक बातचीत।
आज उस इंतिजार का इन्तिकाल उदास कर गया। आमीन।
सलाम इन्तिज़ार हुसैन साहिब


