#सवालबोलताहै - सांप्रदायिक अखिलेश सरकार का विरोध क्यों न करें हम
#सवालबोलताहै - सांप्रदायिक अखिलेश सरकार का विरोध क्यों न करें हम
मसीहुद्दीन संजरी
अगर सत्ता के काले कारनामों के खिलाफ सवाल उठाना पक्षपात होता है तो हमें ऐसे पक्षपात करने चाहिए।
भोपाल जेल से मुस्लिम नवजवानों को निकाल कर फर्जी मुठभेड़ में मारने के सवाल पर अगर रिहाई मंच के लखनऊ में विरोध प्रदर्शन पर पुलिस अंधाधुंध लाठियां भांजती है और राजीव यादव व शकील अहमद को टार्गेट कर के घेर कर मारती है तो अखिलेश सरकार और उसकी नीयत पर सवाल उठाना हमारी ज़िम्मेदारी बनती है।
उम्र में छोटे और भाई की तरह प्रिय, लेकिन काम में मुझसे बड़े राजीव यादव को अधमरा कर देने वाले पुलिस अधिकारियों को इस विरोध प्रदर्शन से दिक्कत थी या उनके राजनीतिक आकाओं को यही पसंद था। सरकार की चुप्पी से क्या मतलब समझा जाए?
अलीगढ़ मु०वि० के छात्र जे०एन०यू० से ग़ायब कर दिए गए छात्र नजीब को ढूंढने की मांग करने के लिए प्रदर्शन करते हैं, तो उन्हें घेर पर निर्ममता से पीटा जाता है।
एबीवीपी पर आरोप है कि नजीब को उसने गायब किया है तो उत्तर प्रदेश की पुलिस को इतनी झुंझलाहट क्यों थी कि उसने प्रदर्शकारियों को तितर–बितर करने के बजाए घेर कर लाठियां बरसाईं।
एक पूर्व छात्र और न्याय प्रिय नागरिक होने की हैसियत से मेरा मत है कि समाजवादियों से इसका जवाब मांगा ही जाना चाहिए। उन से भी जो टोपी–शेरवानी में अखिलेश की उपलब्धियां गिनवाते फिर रहे हैं।
अखलाक के हत्यारों को बचाने के लिए महीनों बाद उनके बेटे और घर की महिलाओं पर गो हत्या का मुकदमा सरकार की मर्जी के बिना कायम नहीं हो सकता था। इस सरकार में यह कारनामा भी हुआ लेकिन सपा के मित्र यह चाहते हैं कि इस घटना को चुनाव के समय याद न किया जाए, मगर क्यों?
हम यह मानने के लिए तैयार हैं इन सब में सरकार या समाजवादी पार्टी की कोई भूमिका नहीं थी, बस सरकार या पार्टी के किसी भी ज़िम्मेदार का एक बयान कोई दिखा दे जो इन क्रूर, एकतरफा और साम्प्रदायिक कारवाइयों के खिलाफ दिया गया हो।


